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स्पेशल मैरिज एक्ट: वो कानून, जिसके तहत अपनी शादी रजिस्टर करने की मांग कर रहे थे समलैंगिक

Same Sex Marriage Verdict: सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने से इनकार कर दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालत कानून नहीं बना सकती, सिर्फ इसकी व्याख्या कर सकती है. समलैंगिकों ने मांग की थी कि उनकी शादी स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत रजिस्टर की जाए. ऐसे में जानते हैं कि ये स्पेशल मैरिज एक्ट क्या है?

दो अलग-अलग धर्मों के लोग शादी कर सकें, इसलिए स्पेशल मैरिज एक्ट आया था. दो अलग-अलग धर्मों के लोग शादी कर सकें, इसलिए स्पेशल मैरिज एक्ट आया था.
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 17 अक्टूबर 2023,
  • अपडेटेड 1:58 PM IST

Same Sex Marriage Verdict: सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकों की शादी को कानूनी मान्यता देने पर फैसला सुना दिया है. अदालत ने साफ कर दिया कि समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने का अधिकार संसद और राज्यों की विधानसभाओं को है.

सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संवैधानिक बेंच ने इस पर फैसला दिया. चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली बेंच में जस्टिस संजय किशन कौल, जस्टिस एस. रविंद्र भट, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस हिमा कोहली शामिल थीं.

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समलैंगिकों की शादी को कानूनी मान्यता देने की मांग को लेकर 21 याचिकाएं दायर हुई थीं. 18 अप्रैल से सुप्रीम कोर्ट ने इनपर सुनवाई शुरू की. लगातार दस दिन तक सुनवाई के बाद 11 मई को कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया था.

मंगलवार को फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालत कानून नहीं बना सकती. सिर्फ इसकी व्याख्या कर सकती है. स्पेशल मैरिज एक्ट में बदलाव संसद ही कर सकती है.

दरअसल, समलैंगिकों की ओर से मांग की गई थी कि उनकी शादी स्पेशल मैरिज एक्ट (Special Marriage Act) के तहत रजिस्टर्ड हो. साथ ही इस कानून को जेंडर न्यूट्रल बनाया जाए. मांग की गई थी कि स्पेशल मैरिज एक्ट में 'पुरुष और महिला की शादी' की बात कही गई है. इसमें 'पुरुष' और 'महिला' की जगह 'व्यक्ति' लिखा जाना चाहिए.

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पर ये स्पेशल मैरिज एक्ट क्या है?

दो अलग-अलग धर्म या जाति के लोग शादी कर सकें, इसके लिए 1954 में स्पेशल मैरिज एक्ट बना था. 

भारत में शादी के बाद उसका रजिस्ट्रेशन भी करवाना होता है. अलग-अलग धर्मों के अपने पर्सनल लॉ हैं, जो सिर्फ उन धर्मों को मानने वालों पर लागू होते हैं. मसलन, हिंदू पर्सनल लॉ सिर्फ हिंदुओं पर लागू होता है. इसके लिए पति और पत्नी, दोनों का हिंदू होना जरूरी है.

लेकिन स्पेशल मैरिज एक्ट सभी धर्मों पर लागू होता है. फिर चाहे वो हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, बौध या किसी भी धर्म का हो. इस कानून के तहत शादी रजिस्टर करवाने के लिए धर्म बदलने की जरूरत नहीं है.

इस कानून के जरिए भारत के हर नागरिक को ये संवैधानिक अधिकार दिया गया है कि वो जिस धर्म या जाति में चाहे, वहां शादी कर सकता है. इसके लिए लड़की की उम्र 21 साल और लड़की की 18 साल से ज्यादा होना चाहिए.

इसके तहत शादी कौन कर सकता है?

कोई भी. फिर चाहे उसकी धर्म या जाति कुछ भी हो. बस लड़के की उम्र 21 साल और लड़की की उम्र 18 साल या उससे ज्यादा होनी चाहिए.

स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत शादी रजिस्टर करवाने की धर्म बदलने की जरूरत नहीं है. लड़का और लड़की दोनों अलग-अलग धर्म या जाति के हों, तो भी इस कानून के तहत शादी रजिस्टर करवा सकते हैं.

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क्या है शादी की प्रक्रिया?

कानून की धारा 5, 6 और 7 के तहत कपल को शादी से 30 दिन पहले मैरिज रजिस्ट्रार को नोटिस देकर बताना होता है कि वो शादी करने वाले हैं.

इसके बाद मैरिज रजिस्ट्रार दोनों पक्षों को नोटिस जारी करता है. अगर किसी को इस शादी से आपत्ति है तो वो 30 दिन के भीतर रजिस्ट्रार के पास दर्ज करा सकता है. अगर आपत्ति सही पाई जाती है तो रजिस्ट्रार शादी से मना कर सकता है.

अगर आपत्ति नहीं है तो फिर शादी की प्रक्रिया शुरू हो जाती है. शादी मैरिज रजिस्ट्रार के ऑफिस में ही होती है. इसके लिए तीन गवाहों की जरूरत होती है.

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