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बांग्लादेश की राजनीति में भारतीय साड़ियों पर मचा घमासान, क्या है जामदानी साड़ी, जिसका लेनदेन होता रहा?

बांग्लादेश की राजनीति में भारतीय साड़ी को लेकर भूचाल आया हुआ है. मालदीव की तर्ज पर बांग्लादेश के विपक्ष ने भी कथित इंडिया आउट मुहिम छेड़ दी. वे भारतीय सामान के बहिष्कार की बात करने लगे. इसपर वहां की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने कहा कि जब विपक्ष के लोग अपने पास मौजूद भारतीय साड़ियां जलाएंगे, तब ही उनके इरादों का पता चलेगा. वैसे दोनों देशों को साड़ियां भी जोड़ती आई हैं.

बांग्लादेश में जामदानी साड़ी का खूब चलन है. (Photo- AP) बांग्लादेश में जामदानी साड़ी का खूब चलन है. (Photo- AP)
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 02 अप्रैल 2024,
  • अपडेटेड 11:55 AM IST

साल की शुरुआत में बांग्लादेश में आम चुनाव हुए, जिसमें शेख हसीना ने एक बार फिर जीत हासिल की. तब से ही इसपर विवाद भी शुरू हो गया. विपक्षियों का आरोप है कि अवामी लीग पार्टी ने दूसरी पार्टियों को दबाया और हेरफेर से जीत पाई अब सवाल ये है कि भारतीय उत्पादों के बहिष्कार की बात यहां कैसे आई? तो हुआ ये कि जीत पर हसीना को भारत ने भी बधाई दी. इससे विपक्ष भड़क उठा. उसने आरोप लगाया कि हसीना की जीत में भारत की भी मिलीभगत है क्योंकि उसकी पॉलिसीज भारत के पक्ष में हैं. 

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विपक्ष और कुछ इन्फ्लुएंसरों ने मिलकर कथित तौर पर इंडिया आउट कैंपेन का बिगुल बजा दिया. ये घटना जनवरी के मध्य की है. वे लोगों से अपील करने लगे कि भारत में बने सामान न खरीदे जाएं. इसमें बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) सबसे आगे हिस्सा ले रही है. 

लगभग ढाई महीने बाद इसी कैंपेन पर पीएम हसीना ने चुप्पी तोड़ते हुए तहलका मचाने वाला बयान दे दिया. उन्होंने कहा कि विपक्षी नेताओं की पत्नियों के पास कितनी भारतीय साड़ियां हैं? जब वे लोग पार्टी ऑफिस के सामने अपनी पत्नियों की साड़ियां जलाएंगे, तभी साबित होगा कि वे इंडिया में बने उत्पादों का बायकॉट कर रहे हैं. बता दें कि जो विपक्षी दल बीएनपी इंडियन प्रोडक्ट्स को बाहर निकालने में सबसे आगे है, हसीना ने उसे ही घेर लिया. 

वे याद करती हैं कि जब बीएनपी के पास सत्ता थी, जब उनके मंत्रियों की पत्नियां भारत जाया करती थीं. वे वहां साड़ियां खरीदती और यहां-वहां घूमती थीं. वे एक सूटकेस के साथ जातीं और छह-सात के साथ लौटती थीं. द टेलीग्राफ में हसीना के इस बयान का जिक्र है. पीएम ने हालांकि भारत से इंपोर्ट होने वाले मसालों को लेकर भी सवाल किया, लेकिन साड़ी का मुद्दा उछल गया. 

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भारत और बांग्लादेश के बीच साड़ी डिप्लोमेसी की बात पहले भी होती आई. देश की पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज जब इस पद के साथ पहली बार बांग्लादेश गईं तो पीएम हसीना खुद उनके स्वागत के लिए मौजूद थीं. शुरुआती बातचीत के बाद स्वराज ने उन्हें हल्के सफेद-भूरे रंग की साड़ी दी, जो जामदानी पैटर्न की थी. बदले में हसीना ने भी उन्हें जामदानी साड़ी दी. इसे साड़ी डिप्लोमेसी कहा जाने लगा, जो भारत की शॉल डिप्लोमेसी की टक्कर का था.

बता दें कि भारतीय नेता अक्सर देशी से लेकर विदेशी नेताओं को शॉल तोहफे में देते रहे. पीएम नरेंद्र मोदी ने भी पाकिस्तान के पूर्व पीएम नवाज शरीफ को शॉल दी थी जबकि शरीफ ने पीएम की माताजी के लिए साड़ी गिफ्ट की. लेकिन जब भारत और बांग्लादेश की बात करें तो साड़ी डिप्लोमेसी अलग ही स्तर की है, खासकर जामदानी साड़ी. 

बांग्लादेश नेशलिस्ट पार्टी की लीडर खालिदा जिया ने भी सुषमा स्वराज को दो जामदानी साड़ियां दी थीं. तीन दिन वहां बिताने के बाद भूतपूर्व विदेश मंत्री ने यात्रा को काफी सफल और फायदेमंद बताया था. वहीं हसीना ने नई दिल्ली को ढाका का सच्चा मित्र कहा था. इसके अलावा अक्सर दुर्गा पूजा के मौके पर वहां से पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी के लिए साड़ियां आती रहीं. साल 2020 में एक साथ चार साड़ियां भेजी गई थीं. 

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क्या है जामदानी साड़ी, जिसका लेनदेन होता रहा

जामदानी बुनाई परंपरा बंगाली मूल की है. इसका सेंटर बांग्लादेश का नारायणगंज है. लंबे समय तक इसे कपास और सोने के धागों को मिलाकर बुना जाता रहा. अब भी सोने का काफी थोड़ी मात्रा में इस्तेमाल होता है. जामदानी को ढाकाई भी कहते हैं, जो ढाका के नाम पर है.

जामदानी की बुनाई बेहद कुशल कारीगरों के हाथ में ही होती है. बुनने से पहले उनके दिमाग में एक पूरा पैटर्न होता है कि वे क्या बनाएंगे. पहले फूल उकेरे जाते थे. अब साड़ियों को विदेशों में भेजते हुए और भी कई बातें ध्यान में रखी जाती हैं. इसमें जियोमेट्रिकल पैटर्न या लैंडस्केप भी दिखने लगे हैं. ऊपर डिजाइन के लिए जो कपड़ा लिया जाता है, वो महीन सूती या फिर सोने के धागे भी हो सकते हैं. 

सोने के काम और बहुत बारीकी के चलते इसपर समय भी काफी लगता है इसलिए ये साड़ियां काफी महंगी होती है. ये 10 हजार से लेकर काफी ऊपर तक जा सकती हैं. पहले रॉयल परिवार या फिर काफी अमीर लोग ही इसे अफोर्ड कर सकते थे. यहां तक कि एक समय पर इसका उपयोग मुद्रा के तौर पर भी होने लगा था. 

अब जामदानी काम के स्कार्फ भी बनने लगे हैं. कुछ साल पहले ही यूनेस्को ने बुनाई के इस पैटर्न को सांस्कृतिक विरासत घोषित किया. 

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शेख हसीना आमतौर पर जामदानी साड़ियां पहनती हैं, लेकिन इसी साल फरवरी में जर्मनी में एक कॉफ्रेंस के दौरान उन्होंने तंगेल साड़ी पहनी थी. साथ में साफ किया था कि वे तंगेल साड़ियां पहन रही हैं ताकि दुनिया को बता सकें कि बांग्लादेश के पास कैसी सुंदर सांस्कृतिक चीजें हैं. 

इससे ठीक पहले ही पश्चिम बंगाल को तंगेल साड़ियों के लिए जीआई टैग मिला था. पूर्व बर्धमान और नदिया जिलों में बुनी जाने वाली इस साड़ी पर पश्चिम बंगाल भी अपना हक जताता है, और बांग्लादेश भी. बांग्लादेश मानता है कि जीआई टैग लेकर भारत ने उसके साथ गलत किया है. इस टैग के मिलने की घोषणा के बाद बांग्लादेशी सोशल मीडिया पर काफी हो-हल्ला भी हुआ था. इसी के बाद पीएम हसीना ने तंगेल साड़ी पहनी थी. 

ये एक तरह से बिना कहे ही राजनैतिक इशारा था कि तंगेल पहले उनका है. यहां बता दें कि जीआई टैग उन उत्पादों को दिया जाता है, जो किसी खास जगह से होते हैं. तब उसके नाम का इस्तेमाल कोई दूसरा न कर सके, इसके लिए टैग दे दिया जाता है. जामदानी साड़ी का जीआई टैग साल 2016 में ही बांग्लादेश को मिल चुका है. 

कितनी साड़ियां आती हैं भारत 

फाइनेंशियल एक्सप्रेस की एक खबर के मुताबिक बांग्लादेश से हर हफ्ते 50 हजार साड़ियां भारत आती हैं. लेकिन इसका सोर्स या दूसरी किन साड़ियों का आयात भारत ढाका से करता है, ये आंकड़ा कहीं नहीं दिखता. वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन की साल 2018 में जारी एक रिपोर्ट ये भी कहती है कि जामदानी साड़ियों समेत कई चीजों की ब्लैक मार्केटिंग भी काफी होती है. ऐसे में ये डेटा निकालना मुश्किल ही है कि हर कुछ समय में कितनी साड़ियां या कितने उत्पाद यहां से वहां होते हैं. 

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साड़ियां के अलावा भी बांग्लादेश और भारत में कई तरह का लेनदेन है. जैसे पड़ोसी देश हमसे रोजमर्रा में काम आने वाली चीजें लेता है. इसमें तेल, सब्जियां, फल, कपड़े, कपास जैसी चीजें शामिल हैं.

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