
पांच राज्यों के नतीजे आने के बाद EVM पर फिर सवाल खड़े होने शुरू हो गए हैं. तीन राज्यों- मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में बीजेपी की जीत के बाद कांग्रेस ने EVM में गड़बड़ी होने का आरोप लगाया है.
कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने दावा किया कि जिस भी मशीन में चिप होती है, उसे हैक किया जा सकता है. छत्तीसगढ़ के पूर्व सीएम भूपेश बघेल ने कहा कि जब EVM पर बात होती है तो इसमें बीजेपी को बुरा क्यों लग जाता है? कांग्रेस नेता उदित राज ने आरोप लगाते हुए कहा कि EVM के साथ छेड़छाड़ की गई, तभी ऐसे नतीजे आए.
एमपी के पूर्व सीएम कमलनाथ के मीडिया एडवाइजर पीयूष बबेले ने सोशल मीडिया पर तो EVM हैकिंग को लेकर कई दावे किए हैं. पीयूष बबेले ने दावा किया कि पोस्टल बैलेट में कांग्रेस को बहुमत मिल रहा था, लेकिन EVM खुलते ही सीटें कम हो गईं.
वहीं, बीजेपी ने इन आरोपों पर कांग्रेस और विपक्ष को घेर लिया है. केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा कि इसमें कुछ नया नहीं है. जब वो जीत जाते हैं तो EVM ठीक है, लेकिन जब हार जाते हैं तो EVM को दोष मढ़ देते हैं.
एक और बीजेपी नेता एसपी सिंह बघेल ने कहा, इसी EVM के साथ आम आदमी पार्टी दिल्ली में तीन बार और पंजाब में एक बार जीती है. समाजवादी पार्टी को 2012 में यूपी में पूर्ण बहुमत मिला था. बहुजन समाज पार्टी ने 2007 में पूर्ण बहुमत हासिल किया था. और तेलंगाना में भी कांग्रेस जीती है.
पिछले कुछ सालों से चुनावों से पहले और नतीजों के बाद EVM पर सवाल उठाए जाते रहे हैं. हारने वाली पार्टी EVM हैकिंग का दावा करती है. हालांकि, चुनाव आयोग का कहना है कि EVM पूरी तरह सुरक्षित है और इसे हैक नहीं किया जा सकता.
क्यों हैक नहीं की जा सकती EVM?
- EVM हैकिंग और छेड़छाड़ के आरोपों की जांच के लिए एक कमेटी बनाई गई थी. ये कमेटी चुनाव आयोग ने बनाई थी. इस कमेटी ने मई 2019 में अपनी रिपोर्ट दी थी. इस रिपोर्ट में EVM की हैकिंग या उससे छेड़छाड़ क्यों नहीं हो सकती, इसके दो तर्क दिए गए थे-
पहला तर्क : चुनाव आयोग जिस EVM का इस्तेमाल करता है, वो स्टैंड अलोन मशीनें होती हैं. उसे न तो किसी कम्प्यूटर से कंट्रोल किया जाता है और न ही इंटरनेट या किसी नेटवर्क से कनेक्ट किया जाता है, ऐसे में उसे हैक करना नामुमकिन है. इसके अलावा EVM में जो सॉफ्टवेयर इस्तेमाल होता है, उसे रक्षा मंत्रालय और परमाणु ऊर्जा मंत्रालय से जुड़ी सरकारी कंपनियों के इंजीनियर बनाते हैं. इस सॉफ्टवेयर के सोर्स कोड को किसी से भी साझा नहीं किया जाता है.
दूसरा तर्क : भारत में इस्तेमाल होने EVM मशीन में दो यूनिट होती है. एक कंट्रोलिंग यूनिट (CU) और दूसरी बैलेटिंग यूनिट (BU). ये दोनों अलग-अलग यूनिट होती हैं और इन्हें चुनावों के दौरान अलग-अलग ही बांटा जाता है. अगर किसी भी एक यूनिट के साथ कोई छेड़छाड़ होती है तो मशीन काम नहीं करेगी. इसलिए कमेटी का कहना था कि EVM से छेड़छाड़ करना या हैक करने की गुंजाइश न के बराबर है.
जिसने मशीन बनाई, क्या वो नहीं कर सकता छेड़छाड़?
- भारत में इस्तेमाल होने वाली EVM को दो सरकारी कंपनियां बनाती हैं. पहली कंपनी है बेंगलुरु स्थित भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड और दूसरी है हैदराबाद स्थित इलेक्ट्रॉनिक कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड.
- चुनाव आयोग ने 2017 में एक FAQ जारी किया था. इसमें बताया था कि EVM पहले राज्य और फिर वहां से जिलों में जाती है. मैनुफैक्चरर्स को नहीं पता होता कि कौन सी मशीन कहां जाएगी, इसलिए नहीं पता होता कि उम्मीदवार कौन होगा. इसलिए छेड़छाड़ नहीं हो सकती.
- इसके अलावा हर EVM का एक अलग सीरियल नंबर होता है. चुनाव आयोग एक ट्रैकिंग सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करता है, जिससे पता चलता है कि कौन सी मशीन कहां है, तो उससे छेड़छाड़ करना संभव नहीं है.
क्या चिप के जरिए हो सकती है छेड़छाड़?
- EVM की CU में एक माइक्रो चिप लगी होती है. इसी चिप में उम्मीदवार का डेटा रहता है. कई बार ऐसे सवाल उठाए जाते हैं कि इस माइक्रो चिप में मालवेयर के जरिए छेड़छाड़ की जा सकती है. हालांकि, चुनाव आयोग इस बात को खारिज करता है.
- चुनाव आयोग के मुताबिक, एक वोटर एक बार में एक ही बटन दबा सकता है. एक बार बटन दबाने के बाद मशीन बंद हो जाती है और फिर वोटर चाहकर भी दूसरा बटन नहीं दबा सकता. इसलिए चिप के जरिए कोई छेड़छाड़ करना संभव नहीं है.
ब्रिटेन-अमेरिका में बैलेट पेपर से होते हैं चुनाव
- भारत समेत दुनिया के दो दर्जन देशों में इलेक्टॉनिक वोटिंग मशीन के जरिए ही वोट डाले जाते हैं. इनमें नामीबिया, नेपाल, आर्मेनिया, बांग्लादेश, भूटान, ऑस्ट्रेलिया, बेल्जियम, बुल्गारिया, इटली, स्विट्जरलैंड, कनाडा, मेक्सिको, अर्जेंटिनाब, ब्राजील, चिली, पेरू और वेनेजुएला शामिल हैं.
- अमेरिका के कुछ राज्यों में वोट-रिकॉर्डिंग मशीन का इस्तेमाल होता है तो कुछ राज्यों में पेपर ऑडिट ट्रेल मशीन यूज होती है. ये वही अमेरिका है जहां EVM पहली बार बनी थी.
- भारत में इस्तेमाल होने वाली EVM स्टैंड-अलोन मशीन होती है, जबकि अमेरिका में इस्तेमाल होने वाली मशीन सर्वर से कनेक्ट होती है और इसे इंटरनेट के जरिए ऑपरेट किया जाता है. इसे आसानी से हैक किया जा सकता है. 2016 के राष्ट्रपति चुनाव में हैकिंग के आरोप लगने के बाद अमेरिकी संसद ने 38 करोड़ डॉलर खर्च कर सर्वर और सिस्टम को सिक्योर किया था.
- वहीं, ब्रिटेन जिसे लोकतंत्र की जननी कहा जाता है, वहां हाउस ऑफ कॉमन्स यानी निचले सदन के लिए सभी 650 सांसद पेपर बैलेट के जरिए ही चुने जाते हैं.
कभी बीजेपी ने EVM हैकिंग पर लॉन्च की थी किताब
- जो पार्टी चुनाव हारती है, उसे EVM पर शक होने लगता है. 2009 में बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी ने महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से पहले चुनाव बैलेट पेपर से कराने की मांग की.
- 2009 में बीजेपी ने बकायदा एक किताब 'डेमोक्रेसी एट रिस्क! कैन वी ट्रस्ट अवर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन?' लॉन्च की थी. इस किताब को बीजेपी नेता जीवीएल नरसिम्हा राव ने लिखा था.
- साल 2009 में ही बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने आरोप लगाया था कि कांग्रेस ने 90 ऐसी सीटों पर जीत हासिल की है, जो असंभव है. स्वामी ने दावा किया था कि EVM के जरिए वोटों का 'होलसेल फ्रॉड' संभव है.
भारत में कैसे आई EVM?
- भारत में पहली बार चुनाव आयोग ने 1977 में सरकारी कंपनी इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (ECIL) को EVM बनाने का टास्क दिया. 1979 में ECIL ने EVM का प्रोटोटाइप पेश किया, जिसे 6 अगस्त 1980 को चुनाव आयोग ने राजनीतिक पार्टियों को दिखाया.
- मई 1982 में पहली बार केरल में विधानसभा चुनाव EVM से कराए गए. उस समय EVM से चुनाव कराने का कानून नहीं था. 1989 में रिप्रेंजेंटेटिव्स ऑफ पीपुल्स एक्ट, 1951 में संशोधन किया गया और EVM से चुनाव कराने की बात जोड़ी गई.
- हालांकि, कानून बनने के बाद भी कई सालों तक EVM का इस्तेमाल नहीं हो सका. 1998 में मध्य प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली की 25 विधानसभा सीटों पर EVM से चुनाव कराए गए. 1999 में 45 लोकसभा सीटों पर भी EVM से वोट डाले गए. फरवरी 2000 में हरियाणा के चुनावों में भी 45 सीटों पर EVM का इस्तेमाल हुआ.
- मई 2001 में पहली बार तमिलनाडु, केरल, पुडुचेरी और पश्चिम बंगाल की सभी विधानसभा सीटों पर EVM से वोट डाले गए. 2004 के लोकसभा चुनाव में सभी 543 सीटों पर EVM से वोट पड़े. तब से ही हर चुनाव में सभी सीटों पर EVM से वोट डाले जा रहे हैं.
अब VVPAT से भी होता है मिलान
- वोटिंग प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने के मकसद से VVPAT को लाया गया था. ये एक तरह की मशीन रहती है जो EVM से कनेक्ट होती है. वोट डालने के बाद एक पर्ची निकलती है जिस पर कैंडिडेट का नाम और चुनाव चिन्ह होता है. ये पर्ची 7 सेकंड तक दिखाई देती है और फिर गिर जाती है.
- सुप्रीम कोर्ट में विपक्षी दलों ने अर्जी दी कि हर निर्वाचन क्षेत्र में 50% EVM और VVPAT के वोटों को मैच किया जाए. लेकिन चुनाव आयोग ने कहा कि ऐसा किया तो कम से कम 5 दिन लग जाएंगे. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने हर निर्वाचन क्षेत्र में 5 EVM और VVPAT में डले वोटों को मैच करने का आदेश दिया.
जब EVM हैकिंग का किया गया दावा?
- मई 2010 में अमेरिका की मिशिगन यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने एक डिवाइस को मशीन से जोड़कर दिखाया था और दावा किया था कि मोबाइल से मैसेज भेजकर नतीजों को बदला जा सकता है.
- मई 2017 में आम आदमी पार्टी के विधायक ने दिल्ली विधानसभा में EVM को से छेड़छाड़ किए जाने का डेमो दिया था. हालांकि, चुनाव आयोग ने इसे खारिज कर दिया था और कहा था कि ये वो EVM नहीं है, जिसका इस्तेमाल होता है.