
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को दहेज उत्पीड़न के मामलों में पति और उसके रिश्तेदारों के खिलाफ मुकदमा चलाने के खिलाफ अदालतों को आगाह किया. सुप्रीम कोर्ट ने घरेलू विवाद में झूठे मुकदमों में फंसाने पर चिंता जताई. कोर्ट ने कहा कि ऐसे झूठे मुकदमों से भले ही वो बरी हो जाएं, लेकिन जो जख्म उन्हें मिलते हैं, वो कभी नहीं भर सकते.
जस्टिस सीटी रविकुमार और जस्टिस राजेश बिंदल की बेंच ने कहा कि वैवाहिक विवादों में इस तरह के आरोप आम हैं, जिससे अक्सर दूर के रिश्तों को भी भुगतना पड़ता है.
कोर्ट ने कहा, 'ऐसे मुकदमों से सभी रिश्तेदारों को भुगतना पड़ता है. यहां तक कि मुकदमे में बरी हो भी जाएं तो भी अपमान के निशान को नहीं मिटाया जा सकता.' सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया कि आईपीसी की धारा 498A में 'रिश्तेदार' की परिभाषा को और सटीक किया जाने की जरूरत है.
आईपीसी की धारा 498A महिलाओं को पति और उसके रिश्तेदारों की क्रूरता से बचाती है. भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 85 और 86 में इसका प्रावधान किया गया है.
पहले भी उठ चुके हैं सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने अभी जो कहा, वो असल में पति के एक दूर के रिश्तेदार के खिलाफ उत्पीड़न के आरोप से जुड़े मामले में कहा है. एक महिला ने अपने पति के चचेरे भाई की पत्नी पर दहेज उत्पीड़न का आरोप लगाया था. जब जांच हुई तो इसके सबूत नहीं मिले. इसके बाद हाईकोर्ट ने कार्यवाही बंद कर दी.
मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सिर्फ आरोपों के आधार मुकदमे का सामना करना अदालती प्रक्रिया के दुरुपयोग के अलावा और कुछ नहीं है.
ये पहली बार नहीं है जब सुप्रीम कोर्ट ने 498A को लेकर इस तरह के सवाल उठाए हैं. इसी साल सितंबर में सुप्रीम कोर्ट ने घरेलू हिंसा कानून और 498A को सबसे ज्यादा 'दुरुपयोग' किए जाने वाले कानूनों में से एक बताया था.
2014 में एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ऐसे मामलों में तुरंत गिरफ्तारी नहीं होनी चाहिए. निर्दोष व्यक्तियों का उत्पीड़न रोकने के लिए पहले गहन जांच की जानी चाहिए.
साल 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने 498A के तहत दर्ज मामलों में पति और ससुराल वालों की तुरंत गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी. कोर्ट ने ऐसे मामलों की जांच के लिए परिवार कल्याण समिति का गठन करने को भी कहा था. हालांकि, अगले ही साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया था कि ऐसे मामलों में समिति की कोई जरूरत नहीं है.
इसी साल अगस्त में बॉम्बे हाईकोर्ट ने 498A के दुरुपयोग पर चिंता जाहिर करते हुए कहा था कि दादा-दादी और बिस्तर पर पड़े लोगों को भी फंसाया जा रहा है. वहीं, मई में केरल हाईकोर्ट ने कहा था कि पत्नियां अक्सर बदला लेने के लिए पति और उसके परिवार के सदस्यों के खिलाफ ऐसे मामले दर्ज करवा देती हैं.
2022 में भी सुप्रीम कोर्ट ने इसे लेकर कुछ निर्देश जारी किए थे. तब सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, अगर किसी महिला के साथ क्रूरता हुई है तो उसे क्रूरता करने वाले व्यक्तियों के बारे में भी बताना होगा. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि पीड़ित महिला को साफ बताना होगा कि किस समय और किस दिन उसके साथ पति और उसके ससुराल वालों ने किस तरह की क्रूरता की है. केवल ये कह देने से कि उसके साथ क्रूरता हुई है, इससे धारा 498A का मामला नहीं बनता है.
क्या हैं ये कानून?
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े बताते हैं कि हर साल दहेज को लेकर हजारों महिलाओं की मौत हो जाती है. हर साल दहेज हत्या से जुड़े हजारों मामले दर्ज किए जाते हैं.
एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक, 2022 में दहेज हत्या के 6,450 मामले दर्ज किए गए थे. इस हिसाब से दहेज की वजह से हर दिन औसतन 18 महिलाओं की मौत हो जाती है.
दहेज हत्या तब मानी जाती है, जब किसी महिला की मौत उसकी शादी के 7 साल के भीतर किसी चोट, जलन या फिर असमान्य परिस्थितियों में हो जाती है और पता चलता है कि मौत से पहले पति या उसके किसी रिश्तेदार ने उसके साथ कोई क्रूरता या उत्पीड़न किया था. बीएनएस की धारा 80 में इसकी परिभाषा दी गई गई. दहेज हत्या में दोषी पाए जाने पर कम से कम 7 साल की सजा का प्रावधान है, जिसे उम्रकैद तक बढ़ाया जा सकता है.
धारा 498A, जिसे बीएनएस में धारा 85 में जोड़ा गया है, वो महिलाओं को पति या उसके रिश्तेदारों की क्रूरता से बचाती है. क्रूरता, शारीरिक और मानसिक दोनों तरह की हो सकती है. शारीरिक क्रूरता में महिला से मारपीट करना शामिल है.
वहीं, मानसिक क्रूरता में उसे प्रताड़ित करना, ताने मारना, तंग करना जैसे बर्ताव शामिल हैं. अगर जानबूझकर कोई ऐसा काम किया जाता है, जो पत्नी को आत्महत्या के लिए उकसाए, उसे भी क्रूरता माना जाता है. इसके अलावा पत्नी या उससे जुड़े किसी व्यक्ति से गैरकानूनी तरीके से किसी संपत्ति की मांग करना भी क्रूरता मानी जाती है. ऐसे मामले में दोषी पाए जाने पर 3 साल की कैद और जुर्माने की सजा होती है.
इसके अलावा 1961 से दहेज निषेध कानून भी है. ये 498A यानी धारा 85 का ही विस्तृत रूप है. इस कानून के तहत, दोषी पाए जाने वाले व्यक्ति को दो साल तक की कैद और 10 हजार रुपये के जुर्माने की सजा हो सकती है.
सवाल क्यों उठते हैं?
एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि 2020 में दहेज निषेध कानून के तहत 13,479 मामले दर्ज किए गए थे. आंकड़े ये भी बताते हैं कि हर दिन दहेज की वजह से 18 महिलाओं की मौत हो जाती है. इन सबके बावजूद शादीशुदा महिलाओं को उत्पीड़न से बचाने वाले इन कानूनों पर सवाल उठते हैं.
इन दोनों कानूनों के दुरुपयोग पर निचली अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक सवाल उठा चुका है. वो इसलिए क्योंकि अक्सर महिलाएं पति या उसके रिश्तेदारों पर दबाव बनाने के लिए इन कानूनों का सहारा लेती हैं.
इसी साल मई में तलाक से जुड़े एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पति के खिलाफ दर्ज 498A के केस को निरस्त करने का आदेश दिया था. दरअसल, पति ने पत्नी से तलाक की अर्जी दाखिल की थी. इसके बाद पत्नी ने पति के खिलाफ धारा 498A समेत कई धाराओं के तहत केस दर्ज करवा दिया था. हाईकोर्ट ने धारा 498A के तहत दर्ज केस को रद्द करने से मना कर दिया था. इसके बाद ये मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था.
इतना ही नहीं, इन कानूनों पर सवाल इसलिए भी उठते हैं क्योंकि इनका कन्विक्शन रेट बहुत कम है. एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक, धारा 498A में कन्विक्शन रेट सिर्फ 18% है. जबकि, दहेज हत्या से जुड़े 33% मामलों में ही दोष साबित हो पाता है. यानी, बाकी मामलों में आरोपियों को बरी कर दिया जाता है.