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बंगाल में 77 जातियों को आरक्षण देने का मामला क्या है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने ममता सरकार से मांगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने ममता सरकार से पूछा है कि OBC की लिस्ट में 77 जातियों को शामिल करने का आधार क्या था? कोर्ट ने एक हफ्ते में सरकार से जवाब दाखिल करने को कहा है. इसी साल मई में कलकत्ता हाईकोर्ट ने इन 77 जातियों को जारी OBC सर्टिफिकेट रद्द करने का फैसला सुनाया था.

प्रतीकात्मक तस्वीर प्रतीकात्मक तस्वीर
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 06 अगस्त 2024,
  • अपडेटेड 10:17 PM IST

पश्चिम बंगाल में मुस्लिमों को आरक्षण देने का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है. सुप्रीम कोर्ट ने ममता सरकार से पूछा है कि उन्होंने किस आधार पर 77 जातियों (ज्यादा मुस्लिम) को OBC का दर्जा दे दिया था? सुप्रीम कोर्ट ने ममता सरकार से इस पर एक हफ्ते में जवाब मांगा है.

77 जातियों को OBC लिस्ट में शामिल करने के फैसले को कलकत्ता हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया था. इसके बाद ममता सरकार ने कलकत्ता हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी.

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सुप्रीम कोर्ट ने क्या पूछा?

सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल सरकार को नोटिस जारी कर दो सवाल पूछे हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक हलफनामा दायर कर सरकार 77 जातियों को OBC की लिस्ट में शामिल करने की प्रक्रिया को समझाएगी.

सुप्रीम कोर्ट ने पहला सवाल किया है कि क्या OBC की लिस्ट में 77 जातियों को शामिल करने से पहले पिछड़ा आयोग के साथ सलाह नहीं ली गई थी? और दूसरा सवाल ये किया है कि क्या OBC का सब-क्लासिफिकेशन करने से पहले सरकार ने कोई सलाह-मशविरा किया था?

चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने ये भी बताया जाए कि 77 जातियों को OBC की लिस्ट में किस आधार पर शामिल किया गया था?

सुप्रीम कोर्ट ने ममता सरकार को एक हफ्ते में हलफनामा दायर करने को कहा है. इस मामले में अब अगली सुनवाई 16 अगस्त को होगी.

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सरकार ने क्या रखी थी दलील?

ममता सरकार की ओर से सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह ने दलीलें रखी थीं. इंदिरा जयसिंह ने कलकत्ता हाईकोर्ट के फैसले का जिक्र करते हुए कहा था कि क्या अदालत राज्य चलाना चाहती है?

इंदिरा जयसिंह ने सुप्रीम कोर्ट में दलील रखते हुए कहा कि ये सब क्यों हो रहा है? क्योंकि ये सब मुस्लिम हैं? हमारे पास एक के बाद एक रिपोर्ट्स हैं, जो दिखाती हैं कि इन सब पर विचार किया गया था. मंडल आयोग के मापदंडों का पालन किया गया था. राज्य सरकार राज्य चलाना चाहती है, लेकिन अगर अदालत इसे चलाना चाहती है तो उसे चलाने दें.

इंदिरा जयसिंह ने दावा किया कि अब पश्चिम बंगाल में OBC के लिए कोई आरक्षण नहीं है. हम ऐसे हालातों में नहीं रह सकते, जहां OBC के लिए कोई आरक्षण नहीं है, जबकि राज्य में इनकी आबादी 39% है.

वहीं, सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी ने उनकी दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि इन जातियों को OBC लिस्ट में शामिल करना 'धोखाधड़ी' है. उन्होंने कहा कि ये बेहद गंभीर मामला है, जहां बिना किसी स्टडी के कोटा का फायदा दिया गया.

इस पर सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने पूछा कि क्या OBC लिस्ट में शामिल करने से पहले इन जातियों के सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन पर कोई डेटा था? कोर्ट ने ये भी पूछा कि क्या लिस्ट में शामिल करने से पहले सरकारी नौकरियों में इन जातियों के अपर्याप्त प्रतिनिधित्व को लेकर स्टडी की गई थी?

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यह भी पढ़ें: मुसलमानों को कहां, कितना और कैसे मिलता है आरक्षण, क्या कहता है संविधान? सभी सवालों के जवाब

क्या था पूरा मामला?

सितंबर 2010 में बंगाल सरकार ने OBC लिस्ट में 42 जातियों को शामिल किया, जिनमें से 41 मुस्लिमों की थीं. उसी साल सरकार ने OBC लिस्ट का सब-क्लासिफिकेशन कर दिया. इसके बाद सारी जातियों को दो कैटेगरी में बांटा गया. OBC लिस्ट में पहले से ही 66 जातियां थीं. 42 जातियां और जोड़ने के बाद कुल 108 हो गईं. सरकार ने 56 जातियों को OBC-A (अति पिछड़ी) और 52 को OBC-B (पिछड़ी) कैटेगरी में रखा.

2011 में इसे हाईकोर्ट में इस आधार पर चुनौती दी गई कि OBC में जिन 42 जातियों को शामिल किया गया, उसका आधार धर्म था.

मई 2012 में ममता सरकार ने OBC लिस्ट में 35 और जातियों को शामिल किया, जिनमें से 34 मुस्लिमों की थीं. हाईकोर्ट में इसे भी चुनौती दी गई. उसी साल ममता सरकार ने सरकारी नौकरियों में आरक्षण के लिए एक कानून पास किया. इससे OBC लिस्ट में शामिल सभी 77 नई जातियां (42+35) इस कानून के शेड्यूल 1 में शामिल हो गईं और इन्हें आरक्षण मिला. इस कानून को भी हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी.

हाईकोर्ट ने क्यों रद्द किया था ये आरक्षण?

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इसी साल 22 मई को कलकत्ता हाईकोर्ट ने 2010 के बाद से जारी सभी OBC सर्टिफिकेट को रद्द कर दिया था. हाईकोर्ट ने कहा था कि 77 जातियों को पिछड़ा वर्ग में शामिल करने मुस्लिमों का अपमान किया गया. ये सब वोट बैंक और चुनावी फायदे के लिए किया गया.

हाईकोर्ट ने कहा था कि 1993 के पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग आयोग कानून के तहत OBC लिस्ट बनाते समय सरकार पिछड़ा वर्ग आयोग की राय और सलाह लेने के लिए बाध्य है.

अदालत ने 2012 के कानून के उस प्रावधान को भी रद्द कर दिया था, जो सरकार को OBC लिस्ट में बदलाव करने की इजाजत देता था.

हालांकि, कोर्ट ने ये भी साफ कर दिया था कि 2010 से पहले OBC लिस्ट में शामिल की गईं 66 जातियों के मामले में दखल नहीं दिया जाएगा, क्योंकि इसे चुनौती नहीं दी गई थी.

इस फैसले का असर क्या हुआ?

कलकत्ता हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद 2010 से 2024 के बीच जारी OBC सर्टफिकेट रद्द हो गए. अदालत ने ये भी साफ कर दिया था कि इन 77 जातियों को आरक्षण का लाभ देकर सरकारी नौकरी पर नहीं रखा जा सकता.

कोर्ट ने साफ कर दिया था कि इस दौरान जिन लोगों को सरकारी नौकरी पर रखा गया, उनकी नौकरी नहीं जाएगी. जो लोग भर्ती प्रक्रिया में है, उनपर भी इसका कोई असर नहीं पड़ेगा.

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ऐसा अनुमान है कि 2010 से 2024 के बीच राज्य सरकार ने पांच लाख से ज्यादा OBC सर्टिफिकेट जारी किए थे. हाईकोर्ट के फैसले के बाद सरकार इन 77 जातियों को सरकारी नौकरी में आरक्षण नहीं दे सकती. ममता सरकार ने इस फैसले पर अंतरिम रोक लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था. 

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