
सुप्रीम कोर्ट ने महिला अपराध से जुड़े दो कानूनों पर बड़ी टिप्पणी की है. सुप्रीम कोर्ट ने आईपीसी की धारा 498A और घरेलू हिंसा कानून को सबसे ज्यादा 'दुरुपयोग' किए जाने वाले कानूनों में से एक बताया है. जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने गुजारा भत्ता से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान ये टिप्पणी की.
जस्टिस गवई ने इस दौरान ऐसे ही एक पुराने मामले का जिक्र करते हुए कहा कि इस तरह के मामलों में छुटकारा मिलना सबसे सही चीज है.
जस्टिस गवई ने कहा, 'नागपुर में मैंने एक ऐसा मामला देखा था, जिसमें एक लड़का अमेरिका गया था और उसे शादी किए बिना ही 50 लाख रुपये देने पड़े थे. वो एक दिन भी साथ नहीं रहा था. मैं खुले तौर पर कहता हूं कि घरेलू हिंसा और धारा 498A का सबसे ज्यादा दुरुपयोग किया जाता है.'
आईपीसी की धारा 498A पर अक्सर सवाल उठते रहे हैं. माना जाता है कि इस धारा का इस्तेमाल महिलाएं अपने पति और ससुराल वालों को आपराधिक मामलों में फंसाने के लिए करती हैं.
इसी साल मई में ऐसे ही एक मामले की सुनवाई के दौरान भी सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से मौजूदा कानून में संशोधन करने को कहा था. तब आईपीसी की जगह लेने वाली भारतीय न्याय संहिता (BNS) लागू नहीं हुई थी. आईपीसी की धारा 498A महिलाओं को पति और उसके रिश्तेदारों की तरफ से होने वाली क्रूरता से बचाती है. भारतीय न्याय संहिता की धारा 85 और 86 में इसका प्रावधान किया गया है.
498A पर पहले भी उठ चुके हैं सवाल
हालांकि, ये पहली बार नहीं है जब अदालत ने 498A के दुरुपयोग पर सवाल उठाए हैं. पिछले महीने ही बॉम्बे हाईकोर्ट ने 498A के दुरुपयोग पर चिंता जाहिर करते हुए कहा था कि दादा-दादी और बिस्तर पर पड़े लोगों को भी फंसाया जा रहा है. वहीं, मई में केरल हाईकोर्ट ने कहा था कि पत्नियां अक्सर बदला लेने के लिए पति और उसके परिवार के सदस्यों के खिलाफ ऐसे मामले दर्ज करवा देती हैं.
सुप्रीम कोर्ट भी कई बार 498A के दुरुपयोग पर चिंता जाहिर कर चुका है. जुलाई 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने 498A का दुरुपयोग रोकने के लिए तुरंत गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी. तब सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि जांच-पड़ताल के बाद ही पुलिस गिरफ्तारी की कार्रवाई कर सकती है.
2022 में भी सुप्रीम कोर्ट ने इसे लेकर कुछ निर्देश जारी किए थे. तब सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, अगर किसी महिला के साथ क्रूरता हुई है तो उसे क्रूरता करने वाले व्यक्तियों के बारे में भी बताना होगा. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि पीड़ित महिला को साफ बताना होगा कि किस समय और किस दिन उसके साथ पति और उसके ससुराल वालों ने किस तरह की क्रूरता की है. केवल ये कह देने से कि उसके साथ क्रूरता हुई है, इससे धारा 498A का मामला नहीं बनता है.
पिछले साल जुलाई में झारखंड हाईकोर्ट ने कहा था कि धारा 498A को शादीशुदा महिलाओं को उनके पति और ससुराल वालों की क्रूरता से बचाने के लिए लाया गया था, लेकिन अब इसका दुरुपयोग किया जा रहा है.
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आखिर क्या हैं ये दोनों कानून?
- धारा 498A, अब BNS की धारा 85 और 86
1 जुलाई से आईपीसी की जगह बीएनएस लागू हो गई है. आईपीसी की धारा 498A की जगह बीएनएस में धारा 85 और 86 ने ले ली है. हालांकि, इसके प्रावधानों में कोई बदलाव नहीं हुआ है.
अगर किसी शादीशुदा महिला पर उसके पति या उसके ससुराल वालों की ओर से किसी तरह की 'क्रूरता' की जा रही है तो बीएनएस की धारा 85 के तहत ये अपराध होगा.
क्रूरता, शारीरिक और मानसिक दोनों तरह की हो सकती है. शारीरिक क्रूरता में महिला से मारपीट करना शामिल है. वहीं, मानसिक क्रूरता में उसे प्रताड़ित करना, ताने मारना, तंग करना जैसे बर्ताव शामिल हैं. अगर जानबूझकर कोई ऐसा काम किया जाता है, जो पत्नी को आत्महत्या के लिए उकसाए, उसे भी क्रूरता माना जाता है. इसके अलावा पत्नी या उससे जुड़े किसी व्यक्ति से गैरकानूनी तरीके से किसी संपत्ति की मांग करना भी क्रूरता मानी जाती है.
इस धारा के तहत, दोषी पाए जाने पर तीन साल तक की जेल हो सकती है. इसके साथ ही दोषियों पर जुर्माना भी लगाया जा सकता है.
- घरेलू हिंसा कानून
एक महिला को घर के भीतर होने वाली हिंसा से बचाने के लिए 2005 में ये कानून लाया गया था. इस कानून के दायरे में वो सभी महिलाएं आती हैं, जो किसी साझे घर में मां, बहन, पत्नी, बेटी या विधवा हो सकती है. लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं को भी इसमें शामिल किया गया है.
कानून के तहत साझे घर में रहने वाली महिला के स्वास्थ्य, सुरक्षा, जीवन, शरीर के अंग या मानसिक स्थिति को नुकसान नहीं पहुंचाया जा सकता. इस कानून में शारीरिक, मानसिक, मौखिक, भावनात्मक, आर्थिक और यौन हिंसा को शामिल किया गया है. आर्थिक रूप से परेशान करने का मतलब है कि अगर कोई पति या बेटा खर्च के लिए अपनी पत्नी या मां से जबरदस्ती पैसे या कोई चीज मांगता है तो वो महिला घरेलू हिंसा कानून के तहत केस दर्ज करवा सकती है.
इतना ही नहीं, एक शादीशुदा महिला को दहेज के लिए भी प्रताड़ित नहीं किया जा सकता है. साथ ही महिला या उनसे संबंध रखने वाले लोगों के साथ गाली-गलौच नहीं की जा सकती और न ही उन्हें डराया या धमकाया जा सकता है.
इस कानून के तहत एक महिला ही शिकायत कर सकती है. इस कानून की धारा 2(A) में एक महिला को ही 'पीड़ित व्यक्ति' माना गया है. यानी, कोई भी पुरुष इस कानून के तहत किसी महिला के खिलाफ शिकायत नहीं कर सकता.
इस कानून के तहत एक पुरुष के पुरुष और महिला, दोनों ही रिश्तेदार शामिल होते हैं. इसे ऐसे समझिए कि अगर कोई महिला ससुराल में घरेलू हिंसा का शिकार हो रही है तो वो अपने पति के साथ-साथ सास-ससुर, पति की बहन के खिलाफ भी शिकायत करवा सकती है.
इस कानून के तहत मजिस्ट्रेट कोर्ट आदेश जारी करते हैं. इसमें कई तरह के आदेश होते हैं. मजिस्ट्रेट पीड़ित महिला को आश्रय, निवास और चिकित्सा सुविधा देने का आदेश दे सकते हैं.
क्यों उठते हैं सवाल?
इन दोनों कानूनों के दुरुपयोग पर निचली अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक सवाल उठा चुका है. वो इसलिए क्योंकि अक्सर महिलाएं पति या उसके रिश्तेदारों पर दबाव बनाने के लिए इन कानूनों का सहारा लेती हैं.
इसी साल मई में तलाक से जुड़े एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पति के खिलाफ दर्ज 498A के केस को निरस्त करने का आदेश दिया था. दरअसल, पति ने पत्नी से तलाक की अर्जी दाखिल की थी. इसके बाद पत्नी ने पति के खिलाफ धारा 498A समेत कई धाराओं के तहत केस दर्ज करवा दिया था. हाईकोर्ट ने धारा 498A के तहत दर्ज केस को रद्द करने से मना कर दिया था. इसके बाद ये मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था.
इसी तरह घरेलू हिंसा कानून पर भी इसलिए सवाल उठते हैं, क्योंकि ये सिर्फ महिलाओं पर लागू होता है, पुरुषों पर नहीं. इस कानून के तहत आरोपी सिर्फ किसी पुरुष को ही बनाया जा सकता है. पिछले साल फरवरी में एक मामले में सुनवाई करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने साफ किया था कि इस कानून के तहत परिवार का पुरुष खासकर पति संरक्षण के दायरे में नहीं आता.
अक्सर ये दलील दी जाती है कि पति, पत्नी से मारपीट या हिंसा करे या पत्नी, पति के साथ, दोनों ही मामलों में ये अपराध है, लेकिन घरेलू हिंसा कानून से सुरक्षा सिर्फ पत्नी को है. अगर पत्नी अपने पति के साथ मारपीट या हिंसा या अत्याचार या किसी तरह से प्रताड़ित कर रही है तो वो घरेलू हिंसा नहीं मानी जाती.
इतना ही नहीं, इन कानूनों पर सवाल इसलिए भी उठते हैं क्योंकि इनका कन्विक्शन रेट बहुत कम है. एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक, घरेलू हिंसा कानून और धारा 498A में कन्विक्शन रेट सिर्फ 18% है. यानी, बाकी मामलों में आरोपियों को बरी कर दिया जाता है.
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क्या पति के साथ नहीं होती हिंसा?
जून 2021 में पति-पत्नी के एक मामले में सुनवाई करते हुए मद्रास हाई कोर्ट ने अहम टिप्पणी की थी. हाई कोर्ट ने कहा था कि ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि पति के पास पत्नी के खिलाफ केस शिकायत करने के लिए घरेलू हिंसा जैसा कानून नहीं है.
नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 (NFHS-5) के आंकड़ों के मुताबिक, 18 से 49 साल की उम्र की 10 फीसदी महिलाओं ने कभी न कभी अपने पति पर हाथ उठाया है, वो भी तब जब उनके पति ने उनपर कोई हिंसा नहीं की.
इस सर्वे के दौरान, 11 फीसदी महिलाएं ऐसी भी थीं, जिन्होंने माना था कि बीते एक साल में उन्होंने पति के साथ हिंसा की है.
सर्वे के मुताबिक, उम्र बढ़ने के साथ-साथ पति के साथ हिंसा करने वाली महिलाओं की संख्या भी बढ़ जाती है. 18 से 19 साल की 1 फीसदी से भी कम महिलाओं ने पति के साथ हिंसा की. जबकि, 20 से 24 साल की उम्र की करीब 3 फीसदी महिलाएं ऐसी हैं जिन्होंने पति पर हिंसा की. इसी तरह 25 से 29 साल की 3.4%, 30 से 39 साल की 3.9% और 40 से 49 साल 3.7% महिलाओं ने पति के साथ मारपीट की.
आंकड़े ये भी बताते हैं कि शहरों की बजाय ग्रामीण इलाकों में रहने वाली महिलाएं पति के साथ ज्यादा हिंसा करतीं हैं. शहरी इलाकों में रहने वालीं महिलाएं 3.3% हैं, जबकि ग्रामीण इलाकों में ऐसी 3.7% महिलाएं हैं.
पति क्या कर सकता है?
अगर पत्नी किसी भी तरह से प्रताड़ित कर रही है तो ऐसे मामले में पति हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 13 के तहत तलाक मांग सकता है. ये धारा कहती है कि अर्जी करने वाले के साथ अगर दूसरा पक्ष क्रूरता, शारीरिक या मानसिक हिंसा कर रहा है तो वो तलाक ले सकता है.
इसके अलावा अगर पत्नी बिना कारण के घर छोड़कर चली जाती है और वापस नहीं आती है तो ऐसे मामले में पति हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 9 के तहत जिला अदालत में अर्जी दे सकता है और मांग कर सकता है कि अदालत पत्नी को वापस घर भेजने का आदेश दिया जाए. इस धारा के तहत पत्नी भी ऐसी मांग कर सकती है, अगर उसका पति घर छोड़कर कहीं और चला जाता है.
हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 9 में ये प्रावधान भी है कि ऐसे मामले में घर छोड़कर जाने वाले को अदालत में साबित करना होता है कि उसने घर क्यों छोड़ा.
बीएनएस धारा 227 के तहत भी पति पत्नी पर केस कर सकता है. अगर पति को लगता है कि उसकी पत्नी या कोई भी व्यक्ति उसके खिलाफ अदालत या पुलिस में झूठे सबूत पेश कर रहा है तो वो ये दावा करते हुए केस दर्ज करवा सकता है कि उसके खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए जो सबूत दिए जा रहे हैं वो झूठे हैं.ॉ
अगर पत्नी अपने पति को या उसके परिवार को या उसकी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की धमकी देती है तो बीएनएस की धारा 351 के तहत केस दर्ज करवाया जा सकता है.
इतना ही नहीं, अगर पत्नी दहेज प्रताड़ना का आरोप लगाते हुए आईपीसी की धारा 498A यानी बीएनएस की धारा 85 के तहत झूठा केस करती है, तो पति पत्नी के खिलाफ केस ककर सकता है और दहेज प्रताड़ना के सबूत पेश करने की मांग कर सकता है.