
हाल ही में यूक्रेन में रूसी हवाई हमले के दौरान एक महिला की मौत हो गई. घटना बड़ी इसलिए है कि मृतका एक बंकर के बाहर खड़ी थी, जिसपर ताला लगा हुआ था. इसके बाद से यूक्रेन लगातार देश में बने बंकरों को ठोक-बजा रहा है कि वे चालू हालत में हों और एयर स्ट्राइक के समय नागरिक भीतर जा सकें. इस बीच कई देश अपने यहां नए बंकर बना रहे हैं या पुराने बंकरों की हालत सुधार रहे हैं ताकि अगर तीसरे विश्व युद्ध जैसे हालात बनें तो आम लोगों को बचाया जा सके.
अलग-थलग रहने की पॉलिसी बनाई
स्विटजरलैंड इन्हीं में से एक है, लेकिन उसके तरीके काफी अलग हैं, जिसके तार जुड़े हैं उसकी न्यूट्रैलिटी पॉलिसी से, यानी किसी और के मामले में दखल न देने से. अपनी फॉरेन पॉलिसी के तहत ये देश दुनिया में किसी भी देश के अंदरूनी या आपसी झगड़े-फसाद में शामिल नहीं होता है. वो किसी का पक्ष नहीं लेता, फिर चाहे लड़ाई में फंसा देश उसका पड़ोसी या दोस्त देश क्यों न हो. विश्व युद्ध के दौरान भी स्विस मुल्क ने अपनी सेना को तैयार रखा. रिफ्यूजियों की मदद भी की, लेकिन युद्ध का हिस्सा नहीं बना.
लड़ाई के लिए बॉर्डर का भी इस्तेमाल नहीं हो सकता
अलग रहने की नीति का आधिकारिक एलान इस देश ने साल 1815 में किया. इसके तहत स्विट्जरलैंड दो देशों के बीच लड़ाई में किसी तरह का सैन्य सहयोग नहीं करेगा. वो न तो अपने सैनिक देगा, न इस खास मकसद से हथियार ही सप्लाई करेगा. यहां तक कि अगर पड़ोसी देशों के बीच जंग छिड़ी हो और एक देश की आर्मी किसी भी तरह स्विस सीमा का इस्तेमाल करना चाहे तो उसकी भी मनाही है.
अपनी सेफ्टी की पूरी तैयारी
लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि स्विटरजरलैंड अपनी रक्षा भी नहीं करेगा.यहां पर स्विस आर्म्ड फोर्स है जिसके पास सारे मॉडर्न हथियार हैं. यहां तक कि यहां पुरुषों के लिए सैन्य ट्रेनिंग जरूरी है अगर वे हर तरह से फिट हों. स्विस सरकार इसी पॉलिसी के तहत अपने नागरिकों की सुरक्षा का भी जिम्मा लेती है. इसी योजना के तहत देश में हर कोने पर बंकर बनवाए गए ताकि इमरजेंसी में काम आ सकें.
इन देशों से बचाने के लिए बने बंकर
इसकी शुरुआत दूसरे विश्व युद्ध से हुई. स्विस सरकार तब भी तटस्थ थी, लेकिन उसे डर था कि दूसरे देश, खासकर एक्सिस नेशन्स (जर्मनी, जापान और इटली) उसकी सीमाओं का इस्तेमाल कर सकते हैं. अगर वो ऐसा करने देती तो कहीं न कहीं लड़ाई का हिस्सा बन जाती. इसी बात से बचने के लिए उसने सीमा पर सैनिक तैनात कर दिए. साथ ही वो पहाड़ों पर बंकर बनवाने लगी ताकि हमले के हालात में सैनिक वहीं से जवाबी कार्रवाई कर सकें.
कानून बना दिया गया
युद्ध तो खत्म हो गया, लेकिन उसका डर बाकी था. स्विटजरलैंड ने बंकर बनवाना जारी रखा. वे पहाड़ों पर और शहरों-गांवों के बीच हर उस जगह पर बंकर बनाती रही, जहां आबादी हो. बात यहीं खत्म नहीं हुई. साठ के दशक में स्विस कानून आ गया. सिविल प्रोटेक्शन लॉ 1963, ये कहता है कि हर नई बन रही इमारत में एक शेल्टर होना चाहिए, जो हवाई हमलों से सुरक्षा दे सके. ये कानून उन सभी इमारतों पर लागू था, जिनमें 8 या उससे ज्यादा कमरे हों.
बीच में एक बार स्विस सरकार ने इन बंकरों को तोड़कर कुछ नया बनाने का भी सोचा, लेकिन तभी जापान में फुकुशिमा परमाणु हादसा हो गया. स्विटजरलैंड में भी परमाणु पावर प्लांट हैं और उससे सटे यूरोपियन देशों में भी हैं. ऐसे में अगर कोई हादसा हो जाए तो अपने लोगों को बचाने के लिए कुछ तो होना चाहिए. यही देखते हुए देश ने बंकरों को हटाने का इरादा छोड़ दिया.
इस तरह के हैं बंकर
सेना इन बंकरों का रखरखाव करती रहती है. यहां पानी, बिजली और हवा का पूरा इंतजाम है. बंकरों के भीतर आने वाली हवा में कोई जहर न घुला हो, इसके लिए एयर फिल्टर्स लगे हुए हैं. यहां तक कि असेंबल करने वाले बिस्तर भी यहां हैं. बंकर का बाहरी स्ट्रक्चर किसी कैप्सूल की तरह है, इसमें एयरलॉक है, जिससे दरवाजा मजबूती से बंद हो सके. साथ ही इमरजेंसी एंट्री और एग्जिट भी हैं.
पूरी आबादी के लिए हैं शेल्टर्स
हरेक बंकर इतना बड़ा है कि वहां 9 से 12 लोग आराम से रह सकते हैं. फिलहाल स्विटजरलैंड की कुल आबादी करीब पौने 9 लाख है. इसके हिसाब से साढ़े 3 लाख से ज्यादा बंकर पर्याप्त हैं. ये वे शेल्टर हैं, जो रेसिडेंशियल इमारतों के नीचे बने हुए हैं. इसके अलावा बाहर की तरफ भी काफी सारे बंकर बनवाए गए थे.
शरणार्थियों को मिल रहा ठिकाना
अब सेना इन्हें किराए पर दे रही है, जहां चॉकलेट फैक्ट्रियां चलती हैं. शरणार्थियों को भी शुरुआत में बंकरों में रखा जाता है, जब तक बाहर उनके लिए पक्का बंदोबस्त न हो जाए. लेकिन ये वही बंकर हैं, जो मुख्य शहरी इमारतों से अलग बने हुए हैं. इससे रिफ्यूजियों को रखने के लिए अलग से इंतजाम नहीं करना पड़ता, और बंकरों का रखरखाव भी हो जाता है.
हजारों सायरन भी हैं
बंकर तो हैं, लेकिन लोगों को कैसे पता लगेगा कि कब उन्हें वहां छिप जाना चाहिए. इस बात को भी स्विस सरकार ने अनदेखा नहीं किया. वहां के नेशनल इमरजेंसी ऑपरेशन्स सेंटर के पास 7 हजार से ज्यादा सायरन हैं जो पॉसिबल इमरजेंसी के समय चेतावनी दे सकेंगे. हर साल फरवरी में इनकी टेस्टिंग होती है. लोगों को स्कूल से लेकर दफ्तरों में बताया जाता है कि न्यूक्लियर हमला होने पर उन्हें भागकर कहां जाना होगा.