
रूस की यूक्रेन से तो लड़ाई चल ही रही है, लेकिन उसकी प्लेट में और भी बहुत कुछ है. उसने हाल में सीरिया के एक विद्रोही गुट हयात तहरीर अल शाम पर एयर स्ट्राइक की. मॉस्को का कहना है कि वो सीरियाई आर्मी और अपने मित्र बशर अल-असद की मदद करना चाहता है. इस लड़ाई में तुर्की से लेकर कई और देश भी इनवॉल्व हैं. तो क्या सारे राष्ट्र केवल सीरिया की दोस्ताना सहायता के लिए झगड़ रहे हैं, या वजह कुछ और ही है?
पहले जानते हैं इतिहास
साल 2011 में सीरिया में गृह युद्ध शुरू हुआ. लड़ाई विद्रोही समूहों और असद सरकार के बीच थी. सरकार विरोधी गुटों का कहना था कि वे महंगाई, करप्शन के खिलाफ हैं. पहले सड़कों पर आंदोलन शुरू हुआ, जिसे अरब स्प्रिंग कहा गया. जल्द ही इसमें मिलिटेंट्स शामिल हो गए. इनमें से कुछ मिलिटेंट वो थे, जिन्हें आतंकी समूहों का सपोर्ट था. जैसे हयात तहरीर अल शाम को अल कायदा का समर्थन था. लड़ाई सरकार और जनता के बीच नहीं थी, बल्कि इसमें खासा घालमेल हो चुका था. ईरान और रूस राष्ट्रपति असद की तरफ थे, जबकि विद्रोहियों को तुर्की, यूएई, सऊदी अरब और यहां तक कि यूएस का भी सहयोग मिलने लगा.
कौन-कौन, और क्यों उतरा मैदान में
- सरकार समर्थक गुटों में रूस सबसे ऊपर था, जो राष्ट्रपति असद को सपोर्ट करता है.
- ईरान असद का स्थानीय सहयोगी रहा, जिसकी वजह से हिजबुल्लाह भी लड़ाई में आया.
- तुर्की मिलिटेंट्स के साथ था, उसने उत्तरी सीरिया से सरकार को हटाने के लिए खूब तिकड़में लगाईं.
- सऊदी अरब और कतर असद सरकार को हटाने के लिए विद्रोहियों को हथियार दे रहे थे.
- अमेरिका ने आईएसआईएस को हटाने के नाम पर सैन्य हस्तक्षेप किया.
- इजरायल भी जंग में था, जिसका मकसद हिजबुल्लाह और ईरान के असर को कम करना था.
किस देश का कितना नफा-नुकसान
रूस से लेकर ईरान और तुर्की से लेकर अमेरिका तक सबकी अपनी-अपनी जरूरतें थीं, जिससे वे इस या उस पार खड़े थे. हालांकि इससे हुआ ये कि सीरिया ग्लोबल ताकतों के लिए जोर-आजमाइश का मैदान बन गया. कई सालों बाद शांति आई तो लेकिन मिलिटेंट्स अब भी जमीन पर एक्टिव थे. उन्हें विदेशी साथ भी मिल रहा था. जैसे तुर्की उनका सहयोगी है, जो चाहता है कि इस देश में उसका राजनैतिक असर बढ़े ताकि ईरान या बाकी देश कमजोर हो सकें. एक वजह और भी है. लड़ाई के दौरान लाखों सीरियाई लोगों ने तुर्की में शरण ली. अब वो उन्हें उनके देश वापस भेजना चाहता है जो तभी संभव है, जब सीरिया में सेफ जोन तैयार हो सके.
अब अचानक क्या हुआ
सीरिया में लगभग पंद्रह साल पहले शुरू हुई जंग काफी धीमी पड़ गई, लेकिन अंदर-अंदर खदबदाहट बनी रही. इसी शनिवार को चरमपंथी समूह हयात तहरीर अल शाम (HTS) ने अलेप्पो शहर पर हमला कर दिया. ये शहर सीरियाई वॉर के समय से मुसीबत लाता रहा. साल 2016 में रूस की मदद से असद सरकार इसपर दोबारा कब्जा कर सकी लेकिन अब एक बार फिर यहां विद्रोह दिख रहा है. चारों तरफ से हजारों मिलिटेंट्स आए और सरकारी संसाधनों पर कब्जा शुरू कर दिया. यहां तक कि अलेप्पो एयरपोर्ट पर भी कंट्रोल पा लिया. इसके अलावा इदलिब शहर पर भी विद्रोही काबिज हो चुके.
रूस है बड़ा मददगार
विद्रोह को दबाने के लिए रूस की तरफ से हवाई हमले किए गए. इनका निशाना आतंकियों के ठिकाने और हथियार रखने की जगहें थीं. बता दें कि रूस ने सीरिया में अपने हजारों सैनिक तैनात कर रखे हैं. इसके अलावा भी रूस इस देश की मानवीय मदद करता रहता है. जैसे साल 2022 में रूस के विदेश मंत्रालय ने दावा किया कि वे उसने सीरिया को साढ़े पांच हजार टन खाद्य सप्लाई भेजी.
लेकिन मॉस्को को इससे क्या मिल रहा है
थिंक टैंक कार्नेगी एंडोमेंट के अनुसार रूस का यहां होना उसके लिए अपने-आप में मजबूत जमीन है. दोनों का रिश्ता कोल्ड वॉर के समय से है, जब अमेरिका के पाले में ज्यादातर देश जा चुके थे. सीरिया के जरिए रूस मिडिल ईस्ट में अपनी मौजूदगी मजबूत रखकर अमेरिका को चुनौती दे सकता है. इसके अलावा कई रणनीतिक फायदे भी हैं, जैसे यहां टार्टस और हमेमिम में रूसी सैन्य ठिकाने हैं. इनके जरिए मॉस्को भूमध्य सागर में अपनी उपस्थिति बनाए रख सकता है.
तुर्की के अलग हैं फायदे
सीरिया की घरेलू तनातनी में तुर्की भी बीच में रहा, हालांकि ये सरकार के खिलाफ विद्रोहियों की मदद करता है. इसके कई धार्मिक और राजनैतिक कारण है. मसलन, तुर्की एक सुन्नी बहुल देश है, जबकि असद सरकार अलावी समुदाय से संबंधित है, जो कि शियाओं में है. तुर्की अपनी धार्मिक सोच के मुताबिक मिलिटेंट्स की मदद करता रहा, ताकि सुन्नी समुदाय के हाथ में ताकत आए, और उसे फायदा हो सके. इसके अलावा सीरिया में कुर्द मिलिटेंट्स और पीपुल्स प्रोटेक्शन यूनिट्स के लोग तेजी से बढ़ रहे हैं, जो तुर्की में अलगाववादी काम कर रहे हैं. मतलब, तुर्की के लिए सीरियाई मुद्दा अपनी शांति से भी जुड़ा है.
क्या शांति के लिए कोई योजना बन सकी
हां. साल 2015 में यूनाइटेड नेशन्स सिक्योरिटी काउंसिल ने प्रस्ताव पास किया था जिसका मकसद तनाव कम करना था. इसके तहत एक नए संविधान और नए सिरे से यूएन की देखरेख में इलेक्शन की बात थी, हालांकि ऐसा कभी हो नहीं सका.