
काबुल पर तालिबान का राज आने के बाद से वहां की स्थिति खराब होती जा रही है. फिलहाल 90% से ज्यादा अफगानी गरीबी से जूझ रहे हैं. इस्लामिक कानून के चलते महिलाएं घरों पर रहने को मजबूर हैं. तालिबान सरकार खुद कम परेशानी में नहीं. चरमपंथ की वजह से उसे कोई भी देश काबुल की आधिकारिक सरकार मानने को राजी नहीं. लेकिन क्या इससे कोई फर्क पड़ता है!
क्या है तालिबान
पश्तो में स्टूडेंट्स को तालिबान कहते हैं. नब्बे के दशक में जब रूस अफगानिस्तान से अपने सैनिकों को लौटा रहा था, तब ये संगठन आकार लेने लगा. इसकी शुरुआत धार्मिक संस्थानों में हुई. इसके तहत कट्टर मान्यताओं का प्रचार होने लगा. जल्द ही इसका असर बढ़ा और साल 1996 में इस संगठन ने अफगानिस्तान की राजधानी काबुल पर कब्जा कर लिया. यहां से देश पर चमरपंथी ताकतें राज करने लगीं. वे महिलाओं को बुरके में रहने और पुरुषों के बगैर घर से न निकलने को कहतीं. इस्लामिक कानून इतनी कट्टरता से लागू हुए कि संगीत पर भी बैन लग गया.
तालिबान 1.0 को इन्होंने था अपनाया
कट्टरता के इसी दौर में तालिबान को देशों ने आतंकी संगठन का दर्जा देना शुरू कर दिया क्योंकि वे दूसरे देशों की सीमाओं तक भी अपनी कट्टरता पहुंचा रहे थे. अफगानिस्तान पर तालिबानी राज के दौर में केवल तीन देशों ने उसे मान्यता दी थी- सऊदी अरब, यूएई और पाकिस्तान. ये तीनों ही मुस्लिम बहुल देश हैं.
अक्टूबर, 2001 से लेकर दिसंबर के बीच अमेरिकी सेनाओं ने तालिबान को लगभग खत्म कर दिया था, लेकिन भीतर ही भीतर चिंगारी फैलती रही. नतीजा ये हुआ कि ठीक बीस साल बाद इस टैरर गुट ने एक बार फिर काबुल में वापसी की. इस बार उसने चुनी हुई सरकार को गिरा दिया. इस महीने तालिबानी राज को तीन साल हो चुके लेकिन देश इस संगठन को राजनैतिक मान्यता देने को राजी नहीं.
मान्यता न मिलने का क्या हो रहा असर
मानवाधिकार, खासकर महिलाओं और बच्चियों पर हिंसा के बढ़ते मामलों के बीच आनन-फानन सारे देशों ने अफगानिस्तान में अपनी एंबेसी बंद कर दी. साथ ही तालिबान को देश के नेचुरल रूलर के तौर पर मान्यता देने से भी मना कर दिया. लेकिन क्या नुकसान हैं इसके?
तालिबान को मान्यता न मिलने का खामियाजा उसे ही नहीं, बल्कि पूरे देश को भुगतना पड़ रहा है. उसे वर्ल्ड बैंक और इंटरनेशनल मॉनिटरी फंड (आईएमएफ) से तब तक कोई मदद नहीं मिलेगी, जब तक कि आधिकारिक दर्जा नहीं मिल जाए. आईएमएफ ने देश के लिए तय हुए सारे फंड निरस्त कर दिए. अमेरिका समेत कई पश्चिमी देश अफगानिस्तान को सबसे ज्यादा लोन दे रहे थे. उसपर भी रोक लगा दी गई.
तो अब कहां से आ रहे हैं पैसे
इसका कोई पक्का स्त्रोत नहीं. अमेरिकी इंटेलिजेंस ने पिछले साल आरोप लगाया था कि तालिबान फेक एनजीओ बना रहा है और उनके जरिए उगाही कर रहा है. यूएस स्पेशल इंस्पेक्टर जनरल ऑफ अफगानिस्तान रीकंस्ट्रक्शन (एसआईजीएआर) ने आरोप लगाया कि तालिबान ने पढ़ाई और मेडिकल मदद के लिए कई एनजीओ खड़े कर रखे हैं. वे इंटरनेशनल मदद तो लेते हैं, लेकिन उसे जरूरतमंदों तक नहीं पहुंचाते.
निजी अमेरिकी कंपनियां दे रहीं दान एसआईजीएआर के मुताबिक खुद अमेरिका ने तालिबान के आने के बाद से अब तक 185 मिलियन डॉलर केवल पढ़ाई के नाम पर उसे डोनेट किए. ये तब हो रहा है, जब कथित तौर पर अमेरिका समेत ज्यादातर देशों ने तालिबान को मान्यता नहीं दी है.
क्या होगा मान्यता मिलने पर
मान्यता या आधिकारिक दर्जा देना वो कंडीशन है, जिसमें दो देश एक-दूसरे को स्वीकार करते हैं. इसके बाद वे आर्थिक और राजनैतिक रिश्ते रख सकते हैं. दोनों के दूतावास होते हैं और वहां तैनात लोगों को डिप्लोमेटिक इम्युनिटी भी मिलती है. इसके बाद ही इंटरनेशनल लोन मिल पाता है.
कौन देता है रिकॉग्निशन
आमतौर पर किसी भी देश का सुप्रीम लीडर अपने साथियों के साथ ये तय करता है. लेकिन यह प्रोसेस आसान नहीं. इसमें देखना होता है कि नई सत्ता हिंसक तो नहीं, या फिर कितने लीगल ढंग से आई है. साथ ही फॉरेन पॉलिसी भी देखनी होती है. मसलन, अगर भारत, तालिबान को स्वीकार ले तो क्या पड़ोसी देश उससे नाराज हो जाएंगे, या फिर क्या उसके राजदूत देश में आकर जासूसी करने लगेंगे. सारे पहलू देखने के बाद ही ये तय होता है.
रूस ने की वकालत
तालिबानी के तमाम चरमपंथ के बावजूद कई देश काबुल से अपने डिप्लोमेटिक रिश्ते बना रहे हैं. रेडियो फ्री यूरोप के मुताबिक इसी साल अप्रैल में रूस ने मॉस्को स्थित अफगान एंबेसी तालिबानियों को सौंप दी. इसके अगले ही महीने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने तालिबान को आतंकी समूहों की लिस्ट से हटाने की बात करते हुए कहा कि मॉस्को को इस गुट से अच्छे संबंध रखने चाहिए.
चीन अटका हां-ना के बीच
इसी साल जनवरी में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने बीजिंग में तैनात तालिबानी अधिकारी को अफगान के राजदूत के तौर पर मान्यता दे दी. इससे चीन की अफगानिस्तान एंबेसी में तालिबानी लोग ही देश के प्रतिनिधि बन गए. हालांकि बीजिंग ने अब तक तालिबान को सार्वजनिक तौर पर अफगानिस्तान की वैध सरकार नहीं कहा है, लेकिन ये जरूर कह दिया कि तालिबान को इंटरनेशनल कम्युनिटी से काटा नहीं जाना चाहिए.
इन देशों में भी स्वीकार्यता
इनके अलावा पाकिस्तान, ईरान, कजाकिस्तान, उजबेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, अजरबैजान और खाड़ी देशों ने भी इसे काफी हद तक स्वीकार कर लिया है. वे इसे आर्थिक मदद भी करते हैं. हालांकि यह साफ नहीं हो सका कि क्या इन सारे देशों ने आधिकारिक तौर पर इससे डिप्लोमेटिक संबंध भी बना रखे हैं. जैसे सऊदी अरब ने तालिबान के आने के बाद काबुल में ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कंट्रीज मिशन की स्थापना की, लेकिन ये स्पष्ट नहीं कि इस तेल-देश में सारे डिप्लोमेटिक मिशन पर ताबिलानी कंट्रोल है.