
इस गर्मी आपसे घूमने को कहा जाए तो कहां जाना चाहेंगे? देश के हिल स्टेशन या ज्यादा से ज्यादा विदेशों की ठंडी जगहें आपकी लिस्ट में होंगी. लेकिन क्या आप दक्षिणी ध्रुव पर भी जाने का सोचेंगे! आप सोचें या न सोंचे, लेकिन एडवेंचर के शौकीन दुनिया का ये हिस्सा भी नाप रहे हैं. हर साल टूरिस्ट्स की लिस्ट बढ़ रही है, जो यहां जाना चाहते हैं. चूंकि ये हिस्सा किसी देश के अधीन नहीं आता, न ही यहां कोई रहता है, ऐसे में इसे बचाने की वकालत करने के लिए भी लोग कम ही हैं.
कैसे हुई अंटार्कटिका में टूरिज्म की शुरुआत
पचास के दशक में चिली और अर्जेंटिना के वैज्ञानिकों ने नीचे की तरफ अपना बेस कैंप बनाया था ताकि रिसर्च की जा सके. इसके बाद भी सेना और वैज्ञानिक इसके किनारों की तरफ जाते-आते रहे, लेकिन इससे ज्यादा कुछ नहीं. नब्बे के दशक में सोवियत संघ के टूटकर रूस बनने के तुरंत बाद रूसी टूर ऑपरेटरों ने कुछ नया करने की ठानी. वे घूमने-फिरने के शौकीन रईसों को अंटार्कटिका ले जाने लगे.
टूरिज्म के लिए बन गया एसोसिएशन
साल 1991 में बड़ी ट्रैवल कंपनियों ने मिलकर एक एसोसिएशन बनाई, जिसे नाम दिया, इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ अंटार्किटका टूर ऑपरेटर्स (IAATO). इन्होंने दावा किया कि ये पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना लोगों को महाद्वीप तक ले जाएंगे. शुरुआत में कुछ देशों के राजदूत यात्रा पर गए और लौटकर पर्यावरण, पेंग्विन की रक्षा जैसी बातें कीं. इसके बाद से वहां जाने वाले लोग बढ़ते ही चले गए.
कैसा होता ये सफर
हर साल कम से कम 10 हजार पर्यटक यहां जा रहे हैं. कोविड से पहले ये आंकड़ा 74 हजार को पार कर चुका था. ज्यादातर लोग एडवेंचर ट्रैवलर होते हैं, जिन्हें दुनिया की मुश्किल जगहों को देखने का शौक होता है. इन्हें एक्सपेडिशन स्टाइल में छोटी यात्रा के लिए ले जाया जाता है. ये एक शिप में होते हैं जो अंटार्कटिका की सीमा के पास रुकती है.
माइनस तापमान पर डुबकी भी लगा सकते हैं
यहां से छोटी बोट के जरिए लोगों को बर्फ के पहाड़, पेंग्विन और सील को करीब से देखने के लिए ले जाया जाता है. अंदर की तरफ का ये सफर एक खास तरह की बोट पर होता है, जिसमें माइनस से नीचे तापमान पर जिंदा रहने के इंतजाम होते हैं. अगर कोई एडवेंचर का शौकीन सबजीरो तापमान पर डुबकी लगाना चाहे तो कुछ सेकंड्स के लिए ये भी किया जा सकता है.
अंटार्कटिका में होटल बनाने की परमिशन नहीं
ज्यादातर टूरिस्ट बॉर्डर पर पहुंचकर शिप से नीचे नहीं उतर पाते. यहीं पर उनके रहने-खाने का पूरा बंदोबस्त होता है. शिप से नीचे की तरफ टेंपररी कैंप बना दिया जाता है ताकि लोगों को अंटार्कटिका पर रहने का पूरा फील आए. यहां पर कोई होटल नहीं है. अंटार्कटिका ट्रीटी के तहत इसकी इजाजत भी नहीं है.
इस तरह से बनी ट्रीटी
अंटार्कटिका पर वैसे 19वीं सदी में भारी गहमागहमी रही. इससे सटे हुए सारे देश किसी न किसी तरह से इसपर दावा करने लगे. बर्फ का ये रेगिस्तान दुनिया के लिए अजूबा तो था ही, इसमें खनन या कई दूसरी चीजें भी हो सकती थीं. लड़ाई-भिड़ाई की नौबत आने पर आखिरकार साल 1959 में देशों ने मिलकर अंटार्कटिक ट्रीटी सिस्टम बनाया. इसपर अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, ब्रिटेन, रूस समेत कुल 12 देशों ने दस्तखत किए. वक्त के साथ दूसरे देश, जिनमें भारत भी शामिल था, इसका हिस्सा बनते चले गए.
सबका मकसद एक ही था कि इसके इकोसिस्टम को बचाए रखा जाए. इसके तहत अंटार्कटिका न्यूक्लियर फ्री जोन रहेगा यानी वहां परमाणु हथियारों का इस्तेमाल नहीं होगा. न ही साल 2048 तक वहां कोई माइनिंग होगी. हालांकि शोध के नाम पर माइनिंग की शुरुआत तो हो ही रही है, साथ ही टूरिज्म भी शुरू हो गया.
क्यों जरूरी है अंटार्कटिका का सेफ रहना
अगर ये महाद्वीप न होता, तो धरती पर जीवन शायद मुमकिन न होता. गर्मी इतनी होती कि न तो पेड़-पौधे होते, न ही कोई दूसरा जीव-जंतु. असल में इस महाद्वीप को घेरे हुए दक्षिणी महासागर लगभग 75 प्रतिशत अतिरिक्त गर्मी को सोख लेता है. इसके अलावा समुद्र में पानी का बड़ा हिस्सा भी इसके ग्लेशियर के पिघलने से आता है.
क्या खतरा है बढ़ते टूरिज्म से
जैसे-जैसे यहां टूरिस्ट बढ़ेंगे, ये जगह भी दुनिया के किसी बड़े शहर जैसी हो जाएगी. हो सकता है कि आने वाले एकाध दशक के भीतर ही यहां चिप्स के पैकेट और प्लास्टिक की बोतलें भी मिलने लगें. नेचर कम्युनिकेशन्स जर्नल में छपी एक रिसर्च में 100 से ज्यादा शोध के बाद ये माना गया कि अंटार्कटिका पर जाने वाले हरेक टूरिस्ट की वजह से 83 टन से ज्यादा बर्फ पिघलती है. ऐसे में दसियों हजार टूरिस्ट का वहां पहुंचना कितना खतरनाक हो रहा होगा, इसका अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता.
बर्फ पड़ रही काली
स्टडी के लिए अंटार्कटिका के लगभग 2 हजार किलोमीटर के उस हिस्से और ऐसी 28 लोकेशन्स को लिया गया, जहां सबसे ज्यादा सैलानी जा रहे हैं. इसमें दिखा कि बर्फ न केवल पिघल रही है, बल्कि सफेद बर्फ में ब्लैक कार्बन की मात्रा दिखने लगी है. ये कार्बन जहाजों की वजह से आ रहा है. जहाजों की गर्मी और ऑइल के कारण वहां का इकोसिस्टम भी तेजी से बिगड़ने लगा.
सबसे ज्यादा कार्बन फुटप्रिंट
एक और बात- चूंकि ये जगह दुनिया के कोने में है, ऐसे में यहां पहुंचने वाले हरेक टूरिस्ट का कार्बन फुटप्रिंट दुनिया के किसी भी पर्यटन स्थल से ज्यादा है. इसे ऐसे समझ सकते हैं कि हमें 50 किलोमीटर की सड़क यात्रा करनी हो तो कार्बन फुटप्रिंट कम होगा, वहीं 2 हजार किलोमीटर जाएं, जहां हवाई जहाज के बाद पानी वाला जहाज भी लेना पड़े तो जाहिर है कि हमारी यात्रा ज्यादा पॉल्यूशन फैलाएगी. अंटार्कटिका पर जाने के लिए ट्रैवल के कई मोड इस्तेमाल होते हैं, इसलिए वहां जा रहा हरेक टूरिस्ट सबसे ज्यादा पॉल्यूशन फैला रहा है.