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अपने ही देश में जंग पर चर्चा से बाहर यूक्रेन, क्यों बड़ी ताकतें बिना 'कंसेंट' फैसला सुना देती हैं?

जल्द ही डोनाल्ड ट्रंप और व्लादिमीर पुतिन मिलने वाले हैं. ये भेंट रूस और यूक्रेन की लड़ाई रोकने को लेकर होगी, लेकिन इसमें यूक्रेन के नेता ही पिक्चर से गायब हैं. इस 'पीस टॉक' पर वहां के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की एतराज जता चुके. वैसे ये पहला मौका नहीं, जब किसी देश के फैसले में वही शामिल नहीं, जबकि ताकतवर मुल्क आपस में उसकी किस्मत तय कर रहे हैं.

यूक्रेन के नेता वोलोडिमिर जेलेंस्की प्रस्तावित शांति वार्ता पर नाराज हैं. (Photo- Reuters) यूक्रेन के नेता वोलोडिमिर जेलेंस्की प्रस्तावित शांति वार्ता पर नाराज हैं. (Photo- Reuters)
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 19 फरवरी 2025,
  • अपडेटेड 12:55 PM IST

पिछले तीन सालों से चला आ रहा रूस-यूक्रेन युद्ध एक बार फिर चर्चा में है. इस बार वजह अजीबोगरीब है. जंग को रोकने की अपील तो कई देश कर रहे थे, लेकिन अब अमेरिकी सत्तापलट के साथ शांति वार्ता की गुंजाइश बढ़ चुकी. डोनाल्ड ट्रंप दावा कर रहे हैं कि वे दोनों देशों के बीच लड़ाई रोककर रहेंगे. हालांकि इस सारी तस्वीर में अमेरिका के साथ रूस तो है, लेकिन जिस देश में जंग चल रही है, यानी यूक्रेन, वही वार्ता के लिए आमंत्रित नहीं. 

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मतलब कीव के भविष्य का फैसला तो होगा, लेकिन वहां के लीडर या लोगों की रजामंदी के बगैर. इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं, जहां देश बिल्कुल यूक्रेन जैसे हालत में फंसे. 

अफ्रीका की हुई थी बंदरबांट

19वीं सदी के आखिर-आखिर में तत्कालीन जर्मन नेता ओटो वॉन बिस्मार्क ने यूरोपियन देशों को अपने यहां न्यौता दिया. इस बैठक में ये तय किया गया कि अफ्रीकी महाद्वीप को कितने हिस्सों में बांटा जाए और किसके पास कितने भाग आएंगे. फैसला अफ्रीका का था, लेकिन उसके किसी नेता को कॉफ्रेंस में शामिल नहीं किया गया. इस बंटवारे के बाद उसे अमल में लाते हुए भारी कत्लेआम मचा, जिसकी वजह अफ्रीकी असंतोष था. इसी दौरान जर्मनी ने एक और देश बनाया, जिसे नाम दिया- जर्मन साउथ वेस्ट अफ्रीका (अब नामिबिया). इसे भी बनाने के समय वहां के मूल निवासियों पर जर्मन्स ने भारी हिंसा की. इसे 20वीं सदी का पहला नरसंहार भी कहा जाता है. 

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कई द्वीप देशों के बंटवारे भी महाशक्तियों ने ऐसे ही किए

साल 1899 में जर्मनी और यूएस ने एक बैठक कर प्रशांत महासागर स्थित द्वीप समोआ को आपस में बांट लिया. ये तब था, जबकि समोआ ने खुद आजाद देश की मांग की थी. ब्रिटेन भी ताकतवर था. इस बंटवारे में उसे तो कुछ नहीं मिला. लिहाजा उसे मनाने के लिए टोंगा द्वीप दे दिया गया. जर्मनी के कब्जे वाला समोआ पहले वर्ल्ड वॉर के बाद न्यूजीलैंड के पास चला गया और साठ के दशक तक उसी के पास रहा. वहीं अमेरिका के हिस्से आया द्वीप का टुकड़ा अब भी अमेरिकी कब्जे में है. 

दूसरे विश्व युद्ध की शुरुआत से पहले तत्कालीन ब्रिटिश पीएम नेविल चेंबरलेन, फ्रेंच और इटली के लीडरों ने मिलकर एक दल बनाया और जर्मनी के नाजी लीडर अडोल्फ हिटलर से मिले. ये म्यूनिख एग्रीमेंट था, जिसका एजेंडा हिटलर को शांत रखना था. इसके तहत चेकोस्लोवाकिया के सुडेटेनलैंड इलाके को जर्मनी को दे दिया गया ताकि वो ज्यादा हंगामा न करे. दरअसल हिटलर का कहना था कि चूंकि इस क्षेत्र में जर्मन भाषी रहते हैं, लिहाजा वो जर्मनी का हिस्सा होना चाहिए. इस डील में भी चेकोस्लोवाकिया का कोई लीडर न तो बुलाया गया, न ही उससे चर्चा की गई. 

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यूके और यूरोप ने दूसरा वर्ल्ड वॉर टालने के लिए ये समझौता किया था, लेकिन लड़ाई होकर रही. इसे आज भी म्यूनिख बेट्रेअल के नाम से जाना जाता है. 

जर्मन नेता के तुष्टिकरण के लिए किया काम

इसी टाइम पीरियड में यानी दूसरी लड़ाई शुरू होने से ठीक पहले 32 देशों ने फ्रांस में मुलाकात की. इसमें वे जर्मनी से भाग रहे यहूदियों पर डिस्कस करने जा रहे थे. कॉफ्रेंस शुरू होने के पहले ही ब्रिटेन और अमेरिका ने तय किया कि वे इस मामले में यहूदियों को लेकर चुप रहेंगे और कम से कम उन्हें अपने यहां शरण तो नहीं ही देंगे. इस कॉन्फ्रेंस में यहूदी लीडर को बुलाया तो गया लेकिन वे केवल ऑब्जर्वर थे, जिन्हें डील में कुछ बोलने की इजाजत नहीं थी. 



ये बैठक एक बड़ी असफलता रही क्योंकि आखिर तक तय नहीं हो सका कि जर्मनी में बसे ज्यूइश लोगों को आखिर कहां रखा जाए. मीटिंग के कुछ वक्त बाद ही नाजी शासन में उनपर हिंसा शुरू हो गई, जिसमें लाखों लोग मारे गए. 

रूस और जर्मनी ने यूरोप में शुरू किया विस्तार

जर्मनी में हिटलर की ताकत बढ़ने के साथ ये साफ हो गया कि वो यूरोप में अपनी सीमाएं बढ़ाएगा. सोवियत यूनियन (अब रूस) बड़ी रुकावट हो सकता था. वहीं रूस को भी डर था कि जर्मनी से टकराव उसे कमजोर कर सकता है. ऐसे में दोनों देशों ने आपस में मिलकर तय कर लिया कि वे एक-दूसरे के रास्ते में नहीं आएंगे. इसके तुरंत बाद हिटलर ने पोलैंड पर हमला किया, लेकिन समझौते के तहत रूस चुप्पी साधे रहा. दूसरी तरफ रूस भी रोमानिया और बाल्टिक देशों की तरफ विस्तार करने लगा, जिसपर जर्मन्स चुप रहे. यूरोप तब रूस और जर्मनी के लिए खेल का मैदान हो चुका था, जिसके बारे में वे कुछ भी तय कर लें.

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ट्रंप क्या कह चुके यूक्रेन को लेकर 

तीन सालों से चली आ रही लड़ाई में अमेरिका कीव को लेकर काफी संवेदनशील था. उसने इस छोटे देश को लगातार सैन्य सप्लाई दी ताकि वो रूस से जंग में पैर पीछे न कर ले. पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति ने मॉस्को पर कई पाबंदियां भी लगाईं ताकि वो कमजोर हो जाए. हालांकि ट्रंप के वाइट हाउस आते ही कई चीजें बदलीं.

ट्रंप मॉस्को के फेवर में न केवल दिख रहे हैं, बल्कि वे यूक्रेन के खिलाफ भी बोल रहे हैं. जैसे लड़ाई रोकने के लिए प्रस्तावित शांति वार्ता में यूक्रेन को ही नहीं बुलाया जा रहा. यहां तक कि ट्रंप ने यूक्रेनियन लीडर जेलेंस्की का मजाक उड़ाते हुए ये तक बोल दिया कि अब इनविटेशन की उम्मीद क्यों की जा रही है, जब तीन सालों में जंग रोकी नहीं जा सकी. कुल मिलाकर, अमेरिकी सुर फिलहाल रूस की भाषा बोल रहे हैं. 

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