
महाराष्ट की सरकार अर्बल नक्सलियों से पार पाने के लिए नया कानून ला सकती है. स्पेशल पब्लिक सिक्योरिटी एक्ट 2024 नाम से यह बिल हाल में महाराष्ट्र विधानसभा में पेश किया गया. इससे पहले जुलाई में भी यह प्रस्ताव दिया गया था, जो खारिज हो गया. अब सीएम देवेंद्र फडणवीस का कहना है कि बात न बनने पर वे इसे वापस मानसून सत्र में लाएंगे. जानें, क्या है वो बिल, जिसका बार-बार हो रहा है विरोध, और क्या है अर्बन नक्सलिज्म, जिसे खत्म करने की कोशिश में है महाराष्ट्र सरकार.
क्या है ये विधेयक और कैसे काम करेगा
यह बिल सरकार को किसी भी संदिग्ध संगठन को गैरकानूनी घोषित करने का अधिकार देता है. इसमें चार तरह के अपराधों के लिए किसी को सजा हो सकती है
गैरकानूनी संगठन का सदस्य होना.
सदस्य न होते हुए भी उस संगठन के लिए पैसे इकट्ठा करना.
गैरकानूनी संगठन का प्रबंधन या उसकी मदद करना.
गैरकानूनी गतिविधि में लिप्त रहना.
इन चार अपराधों के लिए दो से सात साल तक सजा और दो से पांच लाख रुपए तक का जुर्माना भी हो सकता है. यह कानून इतना कड़ा होग कि इन अपराधों के लिए बिना वारंट के गिरफ्तारी हो सकेगी, और जमानत भी नहीं मिल सकेगी.
गरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (UAPA) से कैसे अलग है विधेयक
यूएपीए आतंकवाद-रोधी कानून है, जिसे नक्सलवाद से जुड़े मामलों में भी इस्तेमाल किया जाता है. यह भी सरकार को किसी संगठन को गैरकानूनी घोषित करने का अधिकार देता है. महाराष्ट्र के विधेयक और यूएपीए में फर्क यह है कि यूएपीए राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद से जुड़े मामलों पर ध्यान देता है, वहीं यह बिल राज्य स्तर पर सार्वजनिक सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए बना है. सरकार का कहना है कि गैरकानूनी संगठन नक्सलियों को हथियार और फंडिंग मुहैया कराने में मदद करते हैं और मौजूदा कानून इससे निपटने में सक्षम नहीं.
बिल के मुताबिक नक्सल प्रभावित चार राज्यों- छत्तीसगढ़, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और ओडिशा में भी पब्लिक सिक्योरिटी एक्ट है और यहां कई ऐसे संगठनों पर पाबंदी लग चुकी.
प्रस्तावित बिल में इन कामों को गैरकानूनी गतिविधि माना गया
- अगर कोई सार्वजनिक व्यवस्था और शांति के लिए खतरा बनता है.
- अगर कोई सार्वजनिक व्यवस्था को बनाए रखने में अड़ंगा डालता है या अड़ंगा डालने की कोशिश करता है. - अगर कोई व्यक्ति कानून, संस्थानों और कर्मचारियों के कामकाज में दखलंदाजी करता है या करने की कोशिश करता है.
- हिंसा, तोड़फोड़ या जनता में डर पैदा करने वाले कामों में शामिल होना या विस्फोटक और अन्य उपकरणों का इस्तेमाल करना या रेल, सड़क, हवा और पानी के संचार को बाधित करना या ऐसा करने की कोशिश करना गैरकानूनी गतिविधि में शामिल.
- कानून और सरकार की संस्थाओं की प्रति आज्ञा का उल्लंघन करना या ऐसा करने के लिए जनता को प्रोत्साहित करना.
- इस तरह के सारे काम करने के लिए पैसा और सामान जुटाना भी गैरकानूनी गतिविधि मानी जाएगी.
क्या है अर्बन नक्सलवाद
साल 2018 में पुणे पुलिस ने भीमा-कोरेगांव दंगों के मामले में देश के अलग-अलग हिस्सों से कई बुद्धिजीवियों को हिरासत में लिया. इनमें वरवर राव, सुधा भारद्वाज, गौतम नवलखा, स्टेन स्वामी, साई बाबा, वेरनोन गोन्जाल्विस और अरुण परेरा जैसे नाम शामिल थे. पुलिस के मुताबिक, इनके पास से एक पत्र बरामद हुआ, जिसमें कथित तौर पर प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश का जिक्र भी था. इन्हें अर्बन नक्सल कहा गया.
हालांकि ये टर्म दंगों से एक साल पहले ही चर्चा में आ चुका था. फिल्ममेकर विवेक अग्निहोत्री ने मई 2017 में एक इंटरव्यू के दौरान ऐसे लोगों को अर्बन नक्सल कहा था, जो शहरों में रहते हुए सत्ता-विरोधी गतिविधियों को हवा देते हैं. ठीक तुरंत बाद उन्होंने एक किताब लॉन्च की, जिसका शीर्षक ही था- अर्बन नक्सल.
भीमा कोरेगांव केस की ही बात करें तो इसमें जिन्हें पकड़ा गया, उनमें से लगभग सभी बुद्धिजीवी जमात से थे. इस वजह से इंटरनेशनल स्तर पर भी मुद्दा उछला था. एनआईए ने भी तब आरोपियों को अर्बन नक्सल बताया था. जांच में माना गया कि शहरों में रहते इंटेलेक्चुअल हिंसा की जमीन बनाते हैं, जिसे देशविरोधी ताकतें फंड करती हैं. ये लोग कथित तौर पर एक खास मांग के साथ दंगा-फसाद भड़काते हैं.
ये टर्म एकदम हवा-हवाई भी नहीं
साल 2004 में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) का एक दस्तावेज चर्चा में आया था. अर्बन पर्सपेक्टिव नाम से इस डॉक्युमेंट में एक खास रणनीति का जिक्र है. इसमें शहरी लीडरशिप में कोई मुहिम चलाई जाती है, जो सत्ता के विरोध में रहती है. ये पॉलिसी का विरोध भी हो सकता है, या किसी खास पार्टी या नेता का भी. इसके पीछे सोच ये है कि शहरी कनेक्शन होने की वजह से नेता काफी पढ़े-लिखे होंगे, और जरूरत पड़ने पर इंटरनेशनल स्तर पर जाकर भी अपने को सही साबित कर सकेंगे.
स्थानीय लोगों, स्टूडेंट्स से भी पक्का कनेक्शन
कथित अर्बन नक्सल एक और काम करते हैं. वे लोकल स्तर पर भी पैठ रखते हैं. जैसे यूनिवर्सिटी या एनजीओ तक. स्टूडेंट्स या स्थानीय लोगों पर उनका सीधा असर रहता है. ऐसे में वे जो कहेंगे, काफी लोग सपोर्ट में आ जाएंगे. कुल मिलाकर सरकार को गिराने या उससे अपनी बात मनवाने के लिए पक्की रणनीति बनाई जा सकती है, जिसमें लोकल और इंटरनेशनल दोनों स्तर पर सहयोग हो.
आगे क्या हो सकता है
बिल पहले भी मानसून सत्र में आकर खारिज हो चुका. अब ये दोबारा आया है, और जॉइंट कमेटी के पास जा चुका है. कोई बिल इस कमेटी के पास तभी भेजा जाता है, जब उसपर विवाद हो, या फिर जिसका लंबा असर पड़ सकता हो. कमेटी उसे बारीकी से देखेगी, एक्सपर्ट्स से बात करके उनके सुझाव भी मांगेगी. और जरूरी लगे तो उसमें बदलाव भी करेगी. समिति के सदस्य विधेयक की किसी भी धारा में संशोधन का प्रस्ताव रख सकते हैं. सुझावों के आधार पर एक रिपोर्ट तैयार होगी जो मानसून सत्र में विधानसभा में रखी जाएगी.