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सालों तक कच्चा वीगन फूड खाने पर रूसी इन्फ्लुएंसर की मौत, एक्सट्रीम डाइट से शरीर में होते हैं ये खौफनाक बदलाव

20वीं सदी में लोग अपने वजन को लेकर काफी सोचने लगे थे. इस दौरान मार्केट में एक से बढ़कर एक एक्सट्रीम डाइट आईं. कुछ डॉक्टर खाने के बीच सिरगेट पीने की सलाह देते थे ताकि भूख कम लगे. तभी एक डाइट ने तहलका मचा दिया. ये टेपवार्म डाइट थी, जिसमें पतले रहने की जिद में पेट के कीड़े तक खाने लगे. यहां तक कि अखबारों में इसके एड आने लगे.

एक्सट्रीम डाइट लेने का चलन कई सदियों से रहा. सांकेतिक फोटो (Unsplash) एक्सट्रीम डाइट लेने का चलन कई सदियों से रहा. सांकेतिक फोटो (Unsplash)
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 03 अगस्त 2023,
  • अपडेटेड 11:35 AM IST

एक्सट्रीम डाइट का चलन हाल का नहीं, बल्कि सदियों से ऐसा हो रहा है. खासकर विक्टोरियन काल में महिलाओं के लिए ऐसे कपड़े बने थे, जो बेहद पतली कमर में ही फिट हो सकें. इसके लिए तरह-तरह की डाइट आ निकली. इसमें से एक थी- टेपवार्म डाइट. लोग कैप्सूल में भरे हुए कीड़ों के अंडे खरीदते और पानी से उसे निगल लेते थे. इसके बाद वे चाहे जो खाएं, वजन कम ही रहता. होता यह था किये कीड़े न्यूट्रिशन सोख जाते और लोग दुबले-पतले बने रहते. 

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जल्द ही इसका साइड-इफेक्ट दिखा. कैप्सूल से भीतर पहुंच ये कीड़े बढ़ते हुए ब्रेन तक पहुंचने लगे. इनके अंडों की वजह से लोगों को मिर्गी के दौरे पड़ने लगे. कईयों की आंखें खराब हो गईं. डायरिया की वजह से मौतें होने लगीं. 

बाद में विक्योरियन इंग्लैंड में टेपवार्म कैप्सूल पर पूरी तरह से रोक लग गई. अब भी इंटरनेट पर खोजें तो इस पर लंबे लेख मिलते हैं. हाल ही में अपने यहां एक्सट्रीम डाइट पर जोर को देखते हुए यूएस फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने इस पर आधिकारिक बैन लगा दिया. 

रूसी महिला की मौत ने खड़े किए सवाल

एक्सट्रीम डाइट की वजह से हाल ही में एक रूसी सोशल मीडिया इंफ्यूएंसर की मौत हो गई. ज्हाना सैमसोनोवा सालों से सिर्फ कच्चा शाकाहारी फूड खा रही थीं. यहां तक कि उनकी दोस्त का कहना था कि वे लंबे समय से कच्चा कटहल खाकर जिंदा थीं. काफी लंबे समय तक वीगन रॉ फूड डाइट पर रहने के चलते ज्हाना में पोषण की इतनी कमी हो गई कि बीमार होने लगीं और इसी हालत में उनकी मौत हो गई.

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रूसी सोशल मीडिया इंफ्यूएंसर 

क्या है वीगन डाइट 

इसमें पशुओं या उनके जरिए तैयार किए गए उत्पाद जैसे- डेयरी प्रोडक्ट, दूध, शहद, पनीर, मक्खन, अंडे और मांस का सेवन नहीं किया जाता. इस डाइट में केवल फलीदार पौधे, अनाज, बीज, फल, सब्जियां, और ड्राई  फ्रूट्स शामिल होते हैं. ये वेजिटेरिटयन डाइट से अलग है जिसमें डेयरी प्रोडक्ट खाने पर मनाही नहीं होती. वीगन डाइट के बारे में बार-बार कहा जाता है कि ये लंबे वक्त के लिए सही नहीं क्योंकि इससे शरीर को पूरा पोषण नहीं मिल पाता. इसके बाद भी इसका चलन काफी बढ़ निकला है. 

तीन-चौथाई महिलाएं वीगन डाइट को फॉलो कर रहीं

वर्ल्ड एनिमल फाउंडेशन के मुताबिक ये फिलहाल दुनिया में 88 मिलियन लोग वीगन हैं. इसमें भी तीन-चौथाई महिलाएं हैं. हालांकि वीगन खाने के लाख प्रचार के बाद भी ये माना जा रहा है कि ये एक तरह की एक्सट्रीम डाइट है, जिसे बहुत संभलकर, डॉक्टरों की सलाह के बाद ही अपनाए तो ठीक. 

और किस तरह की एक्सट्रीम डाइट का चलन

ज्यादातर लोग वजन कम करने के लिए खाने के नए-नए तौर-तरीके अपना रहे हैं. इनमें से सबसे ज्यादा प्रचलित मैथड्स में से एक है जूस डाइट. इसमें सब्जियों और फलों का जूस ही खाना होता है. किसी खास कंडीशन में सुधार के लिए ये 3 से 5 दिनों तक लिया जाता है, लेकिन बहुत से लोग वजन घटाने के लिए लगातार लंबे समय तक इसे फॉलो करते रहते हैं. ये बहुत खतरनाक है. इससे सोडियम, कैल्शियम से लेकर प्रोटीन और कार्ब्स सबकी कमी हो जाती है. थकान इस कमी का पहला लक्षण है. इसके बाद हालात गंभीर होते चले जाते हैं. 

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टेपवार्म डाइट में कैप्सूल में भरे कीड़े खाए जाते थे. सांकेतिक फोटो (Unsplash)

रॉ पैलियो डाइट में कच्चा खाना खाया जाता है

इसे रॉ पैलियोलिथिक डाइट भी कहते हैं. कुछ आहार विशेषज्ञ ये दलील देते हैं कि ऐसा खाना प्राचीन काल में हमारे पुरखे खाते थे और काफी मजबूत हुआ करते थे. तो कुल मिलाकर ये खाना बिना आग के प्रिपेयर होता है. हालांकि इसके काफी सारे नुकसान हैं जैसे कच्चा मीट या कच्ची सब्जियां कई बार जर्म्स लेकर आती हैं. कोई भी जानवरों से फैलने वाली बीमारी इस खाने के शौकीनों तक आसानी से पहुंच जाएगी. 

क्या बदलता है शरीर के भीतर

न्यूयॉर्क सिटी में वेल कॉर्नेल मेडिसिन के एक्सपर्ट्स ने यह देखना चाहा कि किसी भी तरह की एक्सट्रीम डाइट, जो लो-कार्ब्स होती है, से शरीर में क्या होता है. इससे शरीर में फैट से भी पहले ग्लाइकोजन खत्म होने लगता है. ये लिवर और मसल्स में जमा होता है. इसमें ज्यादा मात्रा पानी की होती है. तो जैसे ही ग्लाइकोजन सूखता है, पानी भी सूखने लगता है. इससे 3 दिनों के भीतर ही इतना डीहाइड्रेशन हो जाता है कि कई बार अस्पताल जाने की नौबत आ जाती है. 

जब भी हम धीरे-धीरे वजन कम करते हैं,  तो शरीर से 75 प्रतिशत फैट, जबकि 25 प्रतिशत पानी और मसल लॉस होता है. वहीं एक्सट्रीम डाइट में इसका उल्टा होता है. यहां तक कि कई बार हार्ट अटैक का खतरा रहता है. 

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मसल लॉस के कारण मेटाबॉलिज्म स्लो हो जाता है. इसका सीधा असर आपके मकसद पर पड़ता है. यानी हम जितना भी चलें-फिरें-दौड़ें, कैलोरी बर्न होना घट जाता है. इसके बाद जब हम नॉर्मल खाने पर आते हैं, ब्रेन स्लो हो चुके मेटाबॉलिज्म को तेज करने के लिए ज्यादा से ज्यादा कार्ब्स लेने को उकसाता है. नतीजा ये होता है कि जो भी वजन घटा हो, उससे कहीं ज्यादा बढ़ जाता है. 

इतिहास में एक्सट्रीम डाइट

- सिगरेट डाइट के तहत लोग खाने के बीच में स्मोकिंग किया करते ताकि भूख मर जाए. 

- कॉटन बॉल डाइट को मानने वाले पानी में भिगोए हुए कॉटन बॉल मुंह में रखे रहते. इसका नतीजा काफी भयानक रहा. जल्द ही ये तरीका बंद हो गया. 

- ड्रिंकिंग मैन्स डाइट के खोजकर्ता ने बाकायदा पर्चे छपवाकर एक-एक डॉलर में बेचे और भारी  मुनाफा कमाया. इसमें लोगों को जमकर शराब पीने की नसीहत दी गई थी. 

- एक तरीके में लोगों को चमकने वाला चश्मा पहना दिया जाता. खाने के वक्त ये चश्मा पहनने से थाली का रूप-रंग अजीब हो जाता और खाने की इच्छा ही मर जाती. इसे विजन डाइट कहा गया. 

 

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