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Zelensky ने भारत से किस शांति सम्मेलन की मेजबानी को कहा, इंटरनेशनल इवेंट के आयोजन से होस्ट देश को क्या फायदा?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की ने कहा कि अगले शांति सम्मेलन की मेजबानी भारत को करनी चाहिए. इसके बाद से पीस समिट पर चर्चा हो रही है. वैसे जेलेंस्की का प्रस्तावित सम्मेलन 'कस्टमाइज' है, जो सिर्फ रूस-यूक्रेन जंग रोकने की बात करता है. लेकिन इस प्रस्ताव के भी बड़े मायने हैं.

रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच जेलेंस्की ताकतवर देशों से मदद चाह रहे हैं. (Photo- Reuters) रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच जेलेंस्की ताकतवर देशों से मदद चाह रहे हैं. (Photo- Reuters)
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 28 अगस्त 2024,
  • अपडेटेड 2:00 PM IST

हाल में पीएम नरेंद्र मोदी ने यूक्रेन की यात्रा की. इस दौरान दोनों देशों के नेताओं की आत्मीय मुलाकात की कई तस्वीरें वायरल हुईं. यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की ने भारत से अगली पीस समिट की मेजबानी की भी पेशकश की, जो रूस और यूक्रेन युद्ध पर फोकस करती है. जानें, क्या है ये सम्मेलन, और क्यों देश इस तरह के इंटरनेशनल आयोजनों की मेजबानी करना चाहते हैं. 

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कैसे अलग है यूक्रेन की पीस समिट

जेलेंस्की जिस सम्मेलन की बात कर रहे थे, उसका पूरा नाम पीस फॉर्मूला समिट है. ये एकदम नई कोशिश है, जिसका मकसद रूस और यूक्रेन की जंग रोकना है. बता दें कि दोनों देशों की लड़ाई को लगभग ढाई साल हो चुके. साल 2022 नवंबर में खुद यूक्रेनियन राष्ट्रपति जेलेंस्की ने ही पीस फॉर्मूला तैयार किया था. उन्होंने 10 पॉइंट्स बनाए और दुनिया के ज्यादातर देशों से अपने लिए मदद मांगी. इसके तहत यूक्रेन से रूसी सेना को हटाना, तबाह हुए इंफ्रास्ट्रक्चर को दोबारा ठीक करना, युद्ध से आई महंगाई पर कंट्रोल, सैनिकों और उनके परिवारों को हर तरह की मदद देना जैसी बातें शामिल हैं. 

90 देशों ने लिया था हिस्सा

जेलेंस्की की पहल पर पहली पीस फॉर्मूला समिट जून 2024 में स्विटजरलैंड में आयोजित हुई. इसमें 92 देशों के अलावा 8 इंटरनेशनल एनजीओ ने भी हिस्सा लिया था. भारत भी इसमें शामिल हुआ था.

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क्यों स्विटजरलैंड बना पहला होस्ट

पहली समिट के लिए स्विटजरलैंड को काफी सोच-समझकर चुना गया. ये देश दुनिया में सबसे न्यूट्रल देश के तौर पर जाना जाता है, जहां ज्यादातर बायलैटरल संधियां होती रहीं. लगभग सभी बड़े इंटरनेशनल ऑफिसों का हेडक्वार्टर यहां है क्योंकि माना जाता है कि देश तटस्थ रहते हुए किसी की पॉलिसी में दखल नहीं देगा. रूस और यूक्रेन जंग में लगभग सारे ही देश किसी न किसी पक्ष में हैं. ऐसे में स्विटजरलैंड को काफी सावधानी से चुना गया. 

क्या हैं जेलेंस्की के प्रस्ताव के मायने

अब जेलेंस्की अगली समिट के लिए भारत का नाम ले रहे हैं. ये इसलिए भी बड़ी बात है, क्योंकि दुनिया भारत-रूस संबंधों के बारे में जानती है. पुतिन से अच्छे रिश्तों के अलावा भारत का रूस से बढ़िया व्यापारिक संबंध भी रहा. रूस और यूक्रेन जंग पर भारत ने हमेशा शांति का पक्ष लिया, लेकिन जेलेंस्की का ये कहना देश की मजबूत इंटरनेशनल छवि को ही दिखाता है. 

अब बात करें ग्लोबल पीस समिट की तो ये एक इंटरनेशनल पीस बिल्डिंग संस्थान की निजी पहल है, जो साल 2018 से ही शुरू हुई. इसका खास राजनैतिक महत्व नहीं. 

क्यों चाहते हैं देश इंटरनेशनल मेजबानी

भारत हो, अमेरिका या सऊदी अरब, लगभग सारे देश किसी न किसी इंटरनेशनल इवेंट का होस्ट बनना चाहते हैं. ये पॉलिटिकल, इकनॉमिक, कल्चरल या स्पोर्ट भी हो सकता है. खेलों से जुड़े आयोजन की मेजबानी के लिए तो होड़ लगी रहती है. लेकिन मेजबानी अपने-आप में काफी मुश्किल काम है. होस्ट कंट्री को इसपर काफी काम करना होता है. कई तैयारियां होती हैं ताकि मेहमान देशों को कोई तकलीफ न हो.

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इस सारी कवायद में जमकर पैसे खर्च होते हैं. तब आखिर क्यों देश अपने यहां इवेंट करवाने के लिए आतुर रहते हैं. 

इसके कई कारण हैं

- इंटरनेशनल इवेंट की वजह से दुनियाभर के विजिटर आते हैं. इससे टूरिज्म सेक्टर को बड़ा फायदा मिलता है. 

- इवेंट में आते मेहमानों को सुविधा हो, इसके लिए देश इंफ्रास्ट्रक्चर पर पैसे लगाते हैं, जैसे सड़कें, पुल, होटल. इसका फायदा इवेंट खत्म होने के बाद भी मिलता रहता है. 

- मेजबानी की तैयारी के दौरान हजारों नौकरियां पैदा होती हैं. इसका फायदा आम लोगों के साथ देश की जीडीपी पर भी दिखता है. 

- जिस देश में आयोजन हो रहा हो, वहां इंटरनेशनल नेताओं समेत डिप्लोमेट्स भी आते हैं. इससे देश के संबंध बनते हैं. कई डील्स के दरवाजे खुलते हैं. 

इसमें इकनॉमिक बूस्ट और पॉलिटिकल प्रभाव बढ़ना ऐसे फायदे हैं, देश जिसे हासिल करना ही चाहते हैं. यही वजह है कि ओलंपिक से लेकर जी20 के लिए भी सारे देश अपना-अपना नाम आगे बढ़ाते रहे. 

कैसे तय होती है मेजबानी

इसके लिए भी बिडिंग प्रोसेस होती है. जो भी इवेंट ऑर्गेनाइज करते हैं, देश उनके पास अपना नाम भेजते हैं. इसमें खर्च, इंफ्रा, सिक्योरिटी सबका जिक्र रहता है. मसलन, ओलंपिक को ही लें तो इच्छुक देश इंटरनेशनल ओलंपिक कमेटी के पास अपना प्रस्ताव भेजते हैं. इसपर कमेटी वोटिंग करती है, जिसमें एक नाम पर मुहर लगती है. हालांकि इसमें कई और फैक्टर काम करते हैं. जैसे अगर किसी देश का राजनैतिक असर ज्यादा हो और वो आर्थिक तौर पर भी मजबूत हो, तब कमेटी का झुकाव उसकी तरफ रहता है.

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