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What is waqf: वक्फ का मतलब क्या होता है? भारत में इसकी शुरुआत कब हुई थी, मोहम्मद गोरी और कुतुबुद्दीन ऐबक से जुड़ा है इतिहास

इस्लाम के भारत आने के साथ ही भारत में वक्फ की आमद मानी जा सकती है, हालांकि इतिहास इसे लेकर बहुत क्लियर नहीं है कि वह किस कालखंड में इसकी शुरुआत बताए. ऐसे में यह भी तय करना इतिहास के लिए मुश्किल ही है, वक्फ को औपचारिक रूप से लागू करने वाला 'पहला शासक' कौन रहा होगा. ये सवाल ठीक ऐसा ही है, जैसा कि ये जानने की कोशिश करना की 'दान की परंपरा कैसे शुरू हुई.'

भारत में वक्फ की शुरुआत मोहम्मद गोरी से मानी जा सकती है, कहते हैं कि उसने दो गांवों की जमीन दान की थी भारत में वक्फ की शुरुआत मोहम्मद गोरी से मानी जा सकती है, कहते हैं कि उसने दो गांवों की जमीन दान की थी
विकास पोरवाल
  • नई दिल्ली,
  • 02 अप्रैल 2025,
  • अपडेटेड 12:38 PM IST

तमाम विरोध के बीच संसदीय कार्य एवं अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री किरेन रिजिजू ने वक्फ बोर्ड संशोधन बिल लोकसभा में पेश कर दिया. इससे पहले संसदीय समिति (जेपीसी) में कुल 44 संशोधन पेश किए गए, जिसमें करीब 14 संशोधन जगदंबिका पाल की अगुवाई वाली जेपीसी ने स्वीकार कर लिए. संशोधित बिल को कैबिनेट ने पहले ही मंजूरी दे दी थी. आइए जानते हैं कुछ जरूरी सवालों के जवाब जो वक्फ से जुड़े हैं और जिनके जवाब इसके इतिहास तक का सफर करा सकते हैं.

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वक्फ है क्या?

वक्फ अरबी भाषा से निकला शब्द है, जिसका ओरिजिन 'वकुफा' शब्द से हुआ है. वकुफा का अर्थ होता है ठहरना, रोकना. इसी से बना वक्फ, जिसका अर्थ होता है संरक्षित करना. इस्लाम में वक्फ का अर्थ उस संपत्ति से है, जो जन-कल्याण के लिए हो. यह एक तरीके का 'दान' जैसा ही होता है और इसका दानदाता चल या अचल संपत्ति दान कर सकता है. जन कल्याण के लिए जो भी दान कर दिया जाए, उसे संरक्षित करना ही वक्फ है. अब इसमें घर, खेत, जमीन-मैदान ही शामिल नहीं है, बल्कि पंखा, कूलर, साइकिल, टीवी-फ्रिज भी आ सकते हैं.

शर्त यही है कि, इसे जनकल्याण की मकसद से दान किया गया हो. जो ये दान देते हैं, ऐसे दानदाता को ‘वाकिफ’ कहा जाता है. वाकिफ ये भी तय कर सकता है कि जो दान दिया गया है, उसका या उससे होने वाली आमदनी का इस्तेमाल कैसे होगा? अगर कोई दानदाता (वाकिफ) यह कहता है कि उसके दिए गए दान से होने वाली कमाई सिर्फ यतीम बच्चों के लिए खर्च होगी, तो ऐसा ही किया जाएगा.

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इस्लाम में वक्फ से जुड़ी एक कहानी

इसे लेकर एक कहानी भी सामने आती है. ऐसा कहा जाता है कि, एक बार खलीफा उमर ने खैबर में एक जमीन हासिल की और पैगंबर मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से पूछा कि इसका सबसे अच्छा और बेहतरीन प्रयोग कैसे किया जा सकता है? पैगंबर ने कहा, "इस संपत्ति को रोक लो, इसके बांध लो और इससे होने वाले फायदे को लोगों के काम में लगाओ, उनकी जरूरतों पर खर्च करो. इसे न बेचा जाए, न उपहार में दिया जाए और न ही इसे विरासत में दिया जाए. इस तरह उस जमीन को वक्फ किया गया.

पैगंबर मोहम्मद साहब के समय की ऐसी ही एक घटना और सामने आती है, जब 600 खजूर के पेड़ों के एक बाग को वक्फ किया गया था और इससे होने वाली आमदनी से मदीना के गरीब लोगों की मदद की जाती थी. ये वक्फ के सबसे पहले उदाहरणों में से एक है. इसी तरह इजिप्ट की राजधानी काहिरा में एक बहुत पुरानी अल अजहर यूनिवर्सिटी है, जिसे अरबी संस्कृति और भाषा की पढ़ाई के लिए सबसे बेहतरीन माना जाता है. ये 10वीं सदी में बनी थी और ये भी एक वक्फ है.

भारत में वक्फ कब आया?

इस्लाम के भारत आने के साथ ही भारत में वक्फ की आमद मानी जा सकती है, हालांकि इतिहास इसे लेकर बहुत क्लियर नहीं है कि वह किस कालखंड में इसकी शुरुआत बताए. ऐसे में यह भी तय करना इतिहास के लिए मुश्किल ही है, वक्फ को औपचारिक रूप से लागू करने वाला 'पहला शासक' कौन रहा होगा. ये सवाल ठीक ऐसा ही है, जैसा कि ये जानने की कोशिश करना की 'दान की परंपरा कैसे शुरू हुई.'

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मोहम्मद गोरी से मानी जा सकती है शुरुआत
हालांकि एक तथ्य यह है कि वक्फ की संपत्ति की शुरुआत सिर्फ दो गांवों के दान से हुई थी. इन दो गांवों का कनेक्शन मोहम्मद गोरी से जुड़ा है.  12वीं शताब्दी के आखिर में पृथ्वीराज चौहान से जीतने के बाद मोहम्मद गौरी ने सैन्य ताकत और इस्लामिक संस्थानों को बढ़ाकर अपनी सत्ता मजबूत करने की कोशिश की थी. मोहम्मद गौरी ने मुसलमानों की शिक्षा और उनकी इबादत के लिए मुल्तान की जामा मस्जिद के लिए दो गांव दान में दिए थे. भारत में इसको वक्फ के पहले उदाहरण में से एक माना जाता है.

यह भी कहते हैं कि भारतीय रेलवे और भारतीय सेना के बाद, वक्फ बोर्ड भारत में तीसरा सबसे बड़ा जमींदार हैं. इसकी शुरुआत 12वीं सदी के अंत में अविभाजित भारत के पंजाब के मुल्तान में हुई, और दिल्ली में राज करने वाले सुल्तानों के शासनकाल में यह फैली.

वक्फ इस्लामी परंपरा का हिस्सा था और यह भारत में मुस्लिम शासकों के शासनकाल में धीरे-धीरे प्रचलन में आया. अब अगर समय के पहिए के साथ पीछे की ओर सफर करते हुए चलें तो मिलता है कि इस्लाम के साथ 7वीं शताब्दी में अरब व्यापारियों के कदम जब दक्षिण भारत (खासकर मालाबार क्षेत्र) में पड़े तो उन्हीं के कंधों पर 'वक्फ' ने भी भारतीय जमीन पर कदम रखा, लेकिन इसे शासकीय स्तर पर लागू करने की बात की जाए तो पहला जिक्र दिल्ली सल्तनत के शासकों को दिया जा सकता है. दिल्ली सल्तनत की शुरुआत 13वीं शताब्दी से हुई थी.

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दिल्ली सल्तनत और वक्फ

भारत में इस्लाम की आमद के साथ भी वक्फ के उदाहरण मिलने लगते हैं. दिल्ली सल्तनत के दौर से वक्फ संपत्तियों का ज़िक्र दस्तावेजों में मिलने लगता है. उस दौर में क्योंकि ज़्यादातर संपत्ति बादशाह के पास ही होती थी, इसीलिए वही वाकिफ (यानी दानदाता) होते थे और वक्फ कायम करते जाते थे. कई बादशाहों ने मस्जिदें बनवाईं, वो सारी वक्फ हुईं और उनके प्रबंधन के लिए लोकल लेवल पर ही इंतज़ामिया कमेटियां बनती रहीं.

भारत में दिल्ली सल्तनत की शुरुआत कुतुबुद्दीन ऐबक (1206-1210) से होती है और ऐबक को ही भारत में इस्लामी शासन की नींव रखने वाला पहला शासक माना जाता है. उसके शासनकाल में और उसके बाद इल्तुतमिश (1211-1236) जैसे शासकों ने मस्जिदों, मदरसों और अन्य धर्मार्थ कार्यों के लिए संपत्तियों को समर्पित करने की प्रथा को बढ़ावा दिया, जो वक्फ के शुरुआती रूप थे. हालांकि, ऐतिहासिक दस्तावेजों में स्पष्ट रूप से यह नहीं कहा गया कि वक्फ को 'लागू' करने वाला पहला शासक कौन था, लेकिन इल्तुतमिश के शासन में इस्लामी कानूनों और परंपराओं को व्यवस्थित करने का कार्य शुरू हुआ, जिसमें वक्फ भी शामिल था.

मुगल पीरियड में वक्फ

मुगल काल में, बाबर (1526-1530) और बाद में अकबर (1556-1605) ने वक्फ को और संगठित रूप दिया. अकबर ने अपने शासनकाल में धर्मार्थ कार्यों और भूमि अनुदानों के लिए वक्फ को प्रोत्साहन दिया, जिससे यह प्रथा व्यापक रूप से प्रचलित हुई. इसलिए, अगर हमें एक शासक का नाम लेना हो, तो इल्तुतमिश को भारत में वक्फ जैसी इस्लामी परंपराओं को स्थापित करने में शुरुआती योगदानकर्ता माना जा सकता है, हालांकि यह प्रथा धीरे-धीरे विकसित हुई थी और बिल्कुल शुरुआत में इसका नाम वक्फ ही रहा हो, ऐसा कह भी नहीं सकते, लेकिन ऐसी संपत्तियां जिस मद में दान की जातीं, वह तरीका वक्फ ही था.

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ब्रिटिश पीरियड में वक्फ
वक्फ की शुरुआत के बारे में मशहूर इतिहासकार प्रोफेसर इरफान हबीब ने आजतक डिजिटल से बातचीत में कहा कि, इसका इतिहास ब्रिटिश काल से लेकर इस्लाम की शुरुआत तक जाता है. प्रोफेसर हबीब बताते हैं, "वक्फ बोर्ड को औपचारिक रूप से ब्रिटिश सरकार ने 1913 में शुरू किया था. इसके बाद 1923 में वक्फ एक्ट बनाया गया, जिसने इसे कानूनी आधार दिया. लेकिन इससे पहले भी यह प्रथा व्यक्तिगत स्तर पर मौजूद थी. लोग अपनी संपत्ति को गरीबों की मदद, शिक्षा और धार्मिक कार्यों के लिए छोड़ जाते थे." उनके अनुसार, उस समय जमींदारों और नवाबों के पास अतिरिक्त संपत्तियां होती थीं, जिन्हें वे समाज के हित के लिए दान कर देते थे.

हबीब की मानें तो पहले से मौजूद एक व्यवस्था को "ब्रिटिश सरकार ने संगठित करने की कोशिश की. स्वतंत्रता के बाद यह व्यवस्था अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के तहत चलती रही. समय-समय पर इसमें संशोधन हुए, जैसे 1995 में, लेकिन मूल भावना को बनाए रखना चुनौती बना रहा."  इरफान हबीब के मुताबिक, 'वक्फ संपत्ति सिर्फ जमीन नहीं होती. इसमें इमारतें, नकदी या कोई अन्य संपत्ति भी शामिल हो सकती है. पहले जमींदार अपनी संपत्ति का हिस्सा दान करते थे, लेकिन आज यह प्रथा कम हो गई है.' वे बताते हैं कि इसका उद्देश्य था कि इनका उपयोग गरीबों, शिक्षा और धार्मिक कार्यों के लिए हो. समुदाय के लोग और दानकर्ता के प्रतिनिधि मिलकर बोर्ड बनाते थे, जिसकी निगरानी सरकार करती थी.

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चिंताजनक है वक्फ की मौजूदा स्थिति
ये सारी बातें कहते हुए इरफान हबीब  इसकी मौजूदा स्थिति पर भी चिंता जाहिर करते हैं. वह कहते हैं, 'जिस संपत्ति का कोई मालिक नहीं होता, उसके सब मालिक बन जाते हैं. वक्फ संपत्तियों के साथ भी यही हुआ. कई जगह इनका दुरुपयोग हुआ और सरकारों ने ठीक से नियंत्रण नहीं किया.' वे आगे कहते हैं, 'लोग चाहते हैं कि इसमें ईमानदारी आए, लेकिन यह भी जरूरी है कि इसका नियंत्रण समुदाय के पास रहे. अगर सरकार इसका मालिक बन जाए या बाहरी लोग हस्तक्षेप करें, तो इसका मूल उद्देश्य खत्म हो जाता है.'

हबीब इस बात पर जोर देते हैं कि कुछ लोग सरकार के नए संशोधनों पर शक करते हैं. वे कहते हैं, 'यह एक बड़ा रियल एस्टेट है. लोगों को लगता है कि इसके पीछे कब्जे की नीयत हो सकती है, जो चिंता की बात है.' इतिहासकार हबीब इस्लाम में वक्फ की जड़ों के बारे में बताते हैं, 'इस्लाम में दान की व्यवस्था शुरू से थी, जैसे जकात और फितरा. लेकिन संपत्ति को वक्फ करने का विचार बाद में विकसित हुआ.'

सामान्य तौर पर, हबीब यह मानते हैं कि वक्फ जैसी व्यवस्थाएं दुनिया के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग नामों और रूपों में हैं, लेकिन उनका मूल उद्देश्य धर्मार्थ कार्यों के लिए संपत्ति का उपयोग करना ही होता है. अपनी बातचीत में वह कहते हैं, 'यह भी जरूरी नहीं है कि अगर दूसरी कंट्रीज में है तो उनका नाम वक्फ ही हो, कुछ और भी नाम हो सकता है, आखिर हर जगह चैरिटेबल काम तो होते ही हैं.' हबीब का मानना है कि वक्फ एक ऐसी व्यवस्था है जो समाज के लिए बनाई गई थी. इसे उसी भावना के साथ आगे बढ़ाना हमारी साझा जिम्मेदारी है.

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वक्फ की क्या अहमियत?

इसी तरह, मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली (आल इंडिया मुस्लिम लॉ पर्सनल बोर्ड के सदस्य, लखनऊ) कहते हैं, 'इस्लामी कानून में जिस तरह नमाज, रोजा और हज की अहमियत है, उसी तरह वक्फ की भी अहमियत है. भारत में वक्फ की परंपरा पिछले लगभग 1400 सालों से चली आ रही है.' वे आगे समझाते हैं, 'वक्फ का मतलब आसान भाषा में यह है कि जब कोई इंसान अपनी संपत्ति को अपनी मिल्कियत से निकालकर अल्लाह को दे देता है, इस नीयत के साथ कि इसका फायदा अल्लाह के बंदों को पहुंचे, तो उसे वक्फ कहते हैं.'

व्यक्तिगत रही है वक्फ की परंपरा
उनका कहना है कि वक्फ को लेकर अक्सर गलतफहमियां फैलाई जाती हैं. 'यह आरोप कि वक्फ बोर्ड ने किसी जमीन पर कब्जा कर लिया, पूरी तरह बेबुनियाद है. कोई भी जमीन जो हमारी अपनी न हो, उसे वक्फ नहीं किया जा सकता. मुसलमानों ने शुरू से अपनी जमीनें वक्फ के लिए दान की हैं.' मौलाना खालिद बताते हैं कि दुनिया भर में वक्फ की ज्यादातर जमीनें धार्मिक स्थलों के रूप में हैं. "90% से ज्यादा वक्फ संपत्तियां मस्जिदों, दरगाहों, कब्रिस्तानों और इमामबाड़ों के रूप में मौजूद हैं.' वे इस बात पर जोर देते हैं कि यह परंपरा शुरू से व्यक्तिगत स्तर पर रही है, न कि किसी शासक या सम्राट द्वारा संगठित रूप में शुरू की गई.

कुल मिलाकर वक्फ एक धार्मिक मसला है, लेकिन इसका एक सच यह भी है कि इसमें धर्म कम ही रह गया है और नीयत बदल गई है. इस नीयत में सुधार की जरूरत भी है. केंद्र सरकार जो संशोधन बिल ला रही है, उससे यह सुधार कितना प्रभावी होगा, यह देखने वाली बात होगी.

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