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पहाड़ों के बीच बर्फ की मोटी परत से ढंकी 'कयामत के दिन वाली तिजोरी', आखिर क्या है इस लॉकर में, जिसे दुनिया खत्म होने तक संभालकर रखा जाएगा?

दुनिया में एक ऐसी तिजोरी भी है, जिसे डूम्सडे-वॉल्ट कहा जाता है, यानी कयामत के दिन की तिजोरी. इसका ताला तभी खुलेगा, जब दुनिया खत्म होने लगे. नॉर्वे में बेहद कम तापमान पर रखे इस लॉकर पर एक या दो नहीं, बल्कि 100 देशों की दावेदारी है. समझिए, आखिर ऐसा क्या है, तिजोरी में और कयामत आने तक क्यों इसे संभालकर रखा जा रहा है.

इसे ग्लोबल सीड वॉल्ट भी कहते हैं. सांकेतिक फोटो (AFP) इसे ग्लोबल सीड वॉल्ट भी कहते हैं. सांकेतिक फोटो (AFP)
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 26 मई 2023,
  • अपडेटेड 1:37 PM IST

लगभग 65 मिलियन साल पहले आखिरी प्रलय आई थी, जब धरती से डायनासोर खत्म हो गए. इसे पांचवां सामूहिक विनाश कहा गया. अब वैज्ञानिक डरे हुए हैं कि जल्द ही 6वीं प्रलय भी आएगी, जिसमें बहुत-सी स्पीशीज समेत इंसानों का भी खात्मा हो सकता है. इसमें बैक्टीरिया, फंगी और पेड़-पौधे ही नहीं, रेप्टाइल्स, पंक्षी, मछलियां सब खत्म हो जाएंगे. इसकी वजह होगा क्लाइमेट चेंज. लेकिन अगर कयामत करीब आ ही जाए तो उसके बाद दुनिया को चलाए रखने के लिए कुछ तो चाहिए. इसमें सबसे जरूरी है अनाज. डूम्सडे वॉल्ट में अनाज की लाखों किस्में रखी हुई हैं. 

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दुनिया के एक कोने पर क्यों है तिजोरी?

इसे ग्लोबल सीड वॉल्ट भी कहा जाता है, जो आर्कटिक सागर के पास नॉर्वे के स्पिट्सबर्गन आइलैंड पर रखा गया है. दुनिया के एक कोने में तिजोरी बनाने की एक वजह ये है कि नॉर्थ पोल के करीब होने के कारण ये जगह हमेशा काफी ठंडी रहती है. इससे अनाज के बीज हमेशा के लिए सुरक्षित रहेंगे. इतने रिमोट इलाके में बीजों की तिजोरी इसलिए भी बनाई गई कि यहां तक किसी भी युद्ध, किसी परमाणु विस्फोट का खतरा नहीं रहता है. न ही यहां किसी देश का आना-जाना है. 

कोई भी देश बन सकता है हिस्सा

फरवरी 2008 में जब ये तिजोरी बनी, तब से अब तक इसमें 100 देश शामिल हो चुके हैं. जो भी देश अपना बीज संरक्षित कराना चाहते हों, उन्हें एक फीस देनी होती है. साथ में नॉर्वे सरकार के साथ एक एग्रीमेंट साइन करना होता है, जो बीजों की क्वालिटी और उनके प्रिजर्वेशन पर होता है. ये घोषणा भी करनी होती है कि बीज पूरी तरह स्वस्थ है. 

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नॉर्वे में अनाज, फल, सब्जियों और हर्ब्स के बीजों का ग्लोबल बैंक लॉकर है. सांकेतिक फोटो (Getty Images)

बैंक के लॉकर सिस्टम की तरह

जैसे बैंक लॉकर में हम गहने या जरूरी कागजात रखते हैं, और बदले में फीस देते हैं, उसी तरह नॉर्वे का सीड वॉल्ट भी काम करता है. अगर कोई देश अपने बीज वापस लेना चाहे तो वो ऐसा कर सकता है. इसपर उसी देश का मालिकाना अधिकार होगा. 

बड़ी तबाही के बाद ही देश डिमांड कर सकते हैं

बैंक के लॉकर से डूम्स डे वॉल्ट थोड़ा अलग है. यहां एक बार बीज जमा कराने के बाद देश जब-तब उसे मांग नहीं सकते हैं. हालात खराब होने पर, युद्ध के दौरान जब खेती-बाड़ी खत्म होने लगे, या किसी कुदरती आपदा के बाद क्रिटिकल हालातों में ही बीज वापस लेने की मांग हो सकती है. जैसे 2010 के बाद सीरिया में अरब क्रांति के दौरान भारी तबाही मची थी. तब उसकी बहुत सी खेती नष्ट हो गई थी. ऐसे में उस देश की मांग पर उसके ग्रेन्स का कुछ हिस्सा निकालकर भेजा गया था. 

क्या वाकई जरूरी है डूम्सडे वॉल्ट?

इसे बनाने और हमेशा के लिए प्रिजर्व करके रखने पर काफी पैसे खर्च हुए, लेकिन ये जरूरी भी था. असल में दुनिया में जिस तेजी से ग्लोबल वार्मिंग बढ़ी, वैज्ञानिक कयामत को करीब मान रहे हैं. लगातार कुदरती आपदाएं भी बढ़ती जा रही हैं. हो सकता है कि किसी रोज भूकंप, सुनामी या ज्वालामुखी के कारण आधी या लगभग पूरी दुनिया खत्म हो जाए. इसके बाद जो लोग बाकी रहेंगे, उन्हें जिंदा रहने के लिए खेती करनी होगी. ये तभी हो सकेगा, जब उनके पास इसके बीज हों. 

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दुनिया में जल्द ही 6वें सामूहिक विनाश की बात हो रही है. सांकेतिक फोटो (Getty Images)

कितने और किन देशों के बीज हैं?

यहां ज्यादातर फसलों के बीज हैं. इसमें 69 प्रतिशत अनाज, 9 प्रतिशत फलियां और बाकी फल, सब्जियों के बीज हैं. हर्ब्स के बीज भी यहां रखे हुए हैं. यहां तक कि अफीम जैसे नशे के बीज भी यहां हैं ताकि जरूरत पड़ने पर उनका मेडिकल इस्तेमाल हो सके. दुनिया के ज्यादातर देश जेनेटिकली मॉडिफाइड फसलें भी उगा रहे हैं. उन्होंने जीएम फूड के बीज रखने की इच्छा भी जताई, लेकिन नॉर्वे ने उन्हें मना कर दिया. असल में नॉर्वेजियन कानून जीएम फूड या कॉर्प्स को रखने की इजाजत नहीं देता है.

वॉल्ट में अमेरिका, चीन, भारत, पाकिस्तान से लेकर सीरिया, फ्रांस जैसे देशों के बीज रखे हुए हैं. 

तेजी से गायब हो रही किस्में

लॉकर की एक खूबी ये है कि उसमें विलुप्त हो चुके बीज भी हैं. भले ही दुनिया में अनाज, फलों  की पैदावार बढ़ी, लेकिन किस्में तेजी से कम हो रही हैं. बायोडाइवर्सिटी इतनी कम हो चुकी कि अब लगभग 30 प्रकार की फसलें ही हमारे काम आ रही हैं. मिसाल के तौर पर चीन 1950 के दशक में जो अनाज या फल-सब्जियां खाता था, आज वहां 10% किस्में ही बाकी रहीं. यही हाल दुनिया के बाकी देशों का है. ऐसे में वॉल्ट ने उन खत्म हो चुकी फसलों के बीच भी संभाले हुए हैं ताकि किसी समय काम आ सकें. 

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अनाज की किस्में तेजी से गायब हो रही हैं. सांकेतिक फोटो (Getty Images)

हर बीज के साथ उसकी सारी जानकारी 

यहां सिर्फ बीज ही नहीं हैं, बल्कि सारी जानकारी भी है कि कैसे कृषि की जा सकती है. किसी फसल को उपजाने के लिए कितनी धूप, कितना पानी चाहिए. किस मिट्टी में क्या उपजाया जा सकता है. ये सारी जानकारी इसलिए सहेजी गई ताकि कयामत के बाद अगर इंसान की नई पीढ़ी के पास खेती की जानकारी न रहे, या कोई खास किस्म उग न सके तो यहां से सबकुछ पता लग जाए. 

ऐसा है कयामत के दिन वाली तिजोरी का अंदरुनी हिस्सा

- ये वॉल्ट नॉर्वे के आइलैंड में एक पहाड़ के लगभग 4 सौ फीट नीचे बनाया गया है. 

- माउंटेन के इस वॉल्ट तक पहुंचने के लिए कंक्रीट की सुरंग से होकर जाना होता है. 

- सुरंग के खत्म होने पर एक चैंबर आता है. ये इतना मजबूत है कि न्यूक्लियर विस्फोट का भी असर नहीं होगा. 

- चैंबर के भीतर 3 तिजोरियां हैं. हरेक में करोड़ों बीज रखे जा सकते हैं. फिलहाल केवल एक ही तिजोरी काम में आ रही है. 

- तिजोरी का दरवाजा बर्फ की मोटी परत से ढंका हुआ है.

- इसके भीतर भी इलेक्ट्रॉनिक तरीके से तापमान माइनस 18 डिग्री पर रखा जाता है ताकि बीज सेफ रहें. 

- हर बीज की किस्म वैक्यूम-पैक्ड पैकेट में है, जो टेस्ट ट्यूब में रखा जाता है. इसके बाद इसे बड़े बक्सों में रखते हैं. 

- पूरे सिस्टम को इस तरह डिजाइन किया गया है कि अगर तिजोरी तक बिजली की सप्लाई बंद हो जाए तो भी बीज कई सौ सालों तक सेफ रहें. 

- तिजोरी साल में 3 बार खोली जाती है, अगर कोई देश और बीज जमा कराना चाहे तो. इसी समय इसका सिस्टम भी भीतर से चेक किया जाता है.

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