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पतंजलि का मामला क्या है जिसमें सुप्रीम कोर्ट में बाबा रामदेव को होना पड़ा पेश, मांगनी पड़ रही माफी, कैसे शुरू हुआ था ये पूरा विवाद?

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को योग गुरु रामदेव और उनके सहयोगी बालकृष्ण को 'एलोपैथी को नीचा दिखाने' के किसी भी प्रयास के खिलाफ चेतावनी दी और उत्तराखंड सरकार को फटकार लगाई. कोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि वो दोनों को अभी भी मुक्त नहीं कर रहा है. रामदेव और बालकृष्ण की तरफ से जस्टिस हिमा कोहली और अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की बेंच को बताया कि वे अपराध के लिए सार्वजनिक माफी मांगने के लिए तैयार हैं.

कोर्ट ने योग गुरु रामदेव और बालकृष्ण को एक सप्ताह के भीतर सार्वजनिक माफी मांगने पर सहमति दी है. कोर्ट ने योग गुरु रामदेव और बालकृष्ण को एक सप्ताह के भीतर सार्वजनिक माफी मांगने पर सहमति दी है.
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 17 अप्रैल 2024,
  • अपडेटेड 8:35 AM IST

सुप्रीम कोर्ट में पतंजलि आयुर्वेद के संस्थापक योग गुरु रामदेव और मैनेजिंग डायरेक्टर बालकृष्ण ने भ्रामक विज्ञापन के मामले में सार्वजनिक माफी मांगने की बात कही है. कोर्ट ने दोनों को एक हफ्ते का वक्त दिया है. यानी पतंजलि को हफ्तेभर के अंदर भ्रामक विज्ञापन दिखाने के मामले में सार्वजनिक माफी मांगनी होगी. जस्टिस हिमा कोहली और जस्टिस अमानतुल्लाह की बेंच के सामने रामदेव और बालकृष्ण तीसरी बार पेश हुए. हालांकि, कोर्ट ने साफ कहा कि इससे मामला खत्म नहीं होगा. कोर्ट ने इस माफी और 2 अप्रैल, 10 अप्रैल को दायर किए गए माफी के हलफनामे को अभी स्वीकार नहीं किया. कोर्ट ने पतंजलि की तारीफ भी की और कहा, आप अच्छा काम कर रहे हैं, लेकिन एलोपैथी को बदनाम नहीं कर सकते हैं. कोर्ट के सख्त लहजे के बीच रामदेव ने कहा, हमारा कोर्ट के प्रति अनादर करने का कोई इरादा नहीं था. अब मामले में 23 अप्रैल को सुनवाई होगी. जानिए पूरा मामला....

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शीर्ष अदालत इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही है. ये याचिका 17 अगस्त 2022 को सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई थी. इसमें कहा गया था कि पतंजलि ने कोविड वैक्सीनेशन और एलोपैथी के खिलाफ नकारात्मक प्रचार किया और खुद की आयुर्वेदिक दवाओं से कुछ बीमारियों के इलाज का झूठा दावा किया है. आरोप लगाया कि विज्ञापन में यह दिखाया गया कि पतंजलि प्रोडक्ट कोविड वायरस समेत अन्य कुछ बीमारियों को पूरी तरह और स्थायी तौर पर ठीक कर सकते हैं. इतना ही नहीं, आधुनिक चिकित्सा और कोविड-19 वैक्सीनेशन प्रोग्राम के खिलाफ पतंजलि आयुर्वेद ने अपमानजनक अभियान चलाया.

पतंजलि पर किन कानून के उल्लंघन का आरोप?

पतंजलि पर दो कानूनों का उल्लंघन करने का आरोप भी लगाया गया है. इसमें ड्रग्स एंड मैजिक रेमेडीज एक्ट 1954 और कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट 2019 का जिक्र है. ड्रग्स एंड मैजिक रेमेडीज एक्ट में प्रावधान है कि किसी भी बीमारी को बिना साइंटिफिक प्रूफ के पूरी तरह ठीक करने का दावा करना गलत और भ्रामक है और यह कानून का उल्लंघन है. कंज्यूमर प्रोटेशन एक्ट में प्रावधान है कि कोई कंपनी झूठा या भ्रामक प्रचार नहीं कर सकती है. अगर वो ऐसा करती है और वो उपभोक्ता के हित के खिलाफ है तो यह कानून के उल्लंघन के दायरे में आता है. दरअसल, पतंजलि ने प्रिंट मीडिया में कुछ विज्ञापन जारी किए थे. इन विज्ञापनों में डायबिटीज और अस्थमा को 'पूरी तरह से ठीक' करने का दावा किया था.

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कोर्ट के आदेशों का उल्लंघनन क्यों किया?

मंगलवार को रामदेव और बालकृष्ण की ओर से पेश वकील ने कहा, हम कोर्ट से एक बार फिर माफी मांगते हैं. हमें पछतावा है और हम जनता के बीच माफी मांगने के लिए तैयार हैं. बेंच ने दोनों की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी से कहा कि विज्ञापन के जरिए आपको जो करना है, करें. हम इस पर टिप्पणी नहीं कर रहे हैं. लेकिन इस समय हम यह नहीं कह रहे हैं कि वो बंधन से बाहर हैं. बेंच ने उन्हें माफी के लिए एक सप्ताह का समय दिया है. सुनवाई के दौरान बेंच ने रामदेव और बालकृष्ण से बातचीत की और उनसे पूछा कि उन्होंने अदालत को दिए गए आश्वासन और उसके द्वारा पारित आदेशों का उल्लंघन क्यों किया?

'क्यों नाराज हो गया था सुप्रीम कोर्ट?'

अदालत में दो अलग-अलग हलफनामे दायर किए गए हैं. एक हफलनामे में रामदेव और बालकृष्ण ने सुप्रीम कोर्ट के पिछले साल 21 नवंबर के आदेश के बाद बयानबाजी करने पर माफी मांगी है. अदालत को दिए गए आश्वासनों के बावजूद पालन ना करने और उसके बाद दोनों द्वारा मीडिया में दिए गए बयानों से पीठ नाराज हो गई थी. बाद में कोर्ट ने नोटिस जारी कर यह बताने के लिए कहा था कि क्यों ना उनके खिलाफ अवमानना ​​की कार्यवाही शुरू की जाए? इससे पहले 10 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई की थी और बिना शर्त माफी मांगने वाले हलफनामे को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था. कोर्ट ने भ्रामक विज्ञापनों के मुद्दे पर ढिलाई बरतने के लिए उत्तराखंड के लाइसेंसिंग अथॉरिटी को कड़ी फटकार लगाई थी.

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10 नवंबर को SC ने क्या कहा था?

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस अमानुल्लाह ने 21 नवंबर 2023 को सुनवाई के दौरान कहा था, पतंजलि को सभी भ्रामक दावा करने वाले विज्ञापनों को तुरंत बंद करना होगा. कोर्ट का कहना था कि ऐसे किसी भी उल्लंघन को बहुत गंभीरता से लिया जाएगा और हर एक प्रोडक्ट के झूठे दावे पर 1 करोड़ रुपए तक जुर्माना लगाया जा सकता है.

'रामदेव से प्रेस कॉन्फ्रेंस करने पर पूछा सवाल'

जस्टिस कोहली ने पिछले साल 21 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस करने पर रामदेव से सवाल पूछा. सुनवाई के दौरान रामदेव ने कहा कि उनका इरादा कभी भी किसी भी तरह से कोर्ट का अनादर करने का नहीं था. उस वक्त हमने जो किया, वो नहीं करना चाहिए था. भविष्य में भी इस बात को ध्यान में रखेंगे. उन्होंने कहा कि यह काम के प्रति उत्साह में हो गया है. किसी को भी गलत बताने का हमारा कोई इरादा नहीं था. आगे से इसके प्रति जागरूक रहूंगा. आगे से नहीं होगा. 

'23 अप्रैल को फिर सुनवाई, दोनों उपस्थित रहें'

इस पर कोर्ट ने कहा, आप इतने मासूम नहीं हैं. ऐसा लग नहीं रहा है कि कोई हृदय परिवर्तन हुआ हो. अभी भी आप अपनी बात पर अड़े हैं. हम इस मामले को 23 अप्रैल को देखेंगे और आप दोनों (रामदेव-बालकृष्ण) उस दिन भी कोर्ट में मौजूद रहें. बालकृष्ण ने भी गलती के लिए माफी मांगी.

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जानिए 16 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस कोहली ने रामदेव से कहा, हम समझना चाहते हैं. बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण दोनों यहां हैं. आपकी बहुत प्रतिष्ठा है. लोग आपको देखते हैं. आपके कार्यों की सराहना करते हैं. आपने योग के लिए बहुत सारे काम किए हैं. रामदेव ने हाथ जोड़कर कहा, मैं कहना चाहता हूं कि मैंने जो भी गलती की है उसके लिए मैं बिना शर्त माफी मांगता हूं.

'अभी माफी स्वीकार नहीं हुई'

जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा, आप एलोपैथी को नीचा नहीं दिखा सकते. आप अपना काम करें. आप बहुत अच्छा काम कर रहे हैं. बेंच ने कहा, उसने पतंजलि के वकील के हलफनामा देने के बाद पिछले साल नवंबर में आदेश पारित किया था. बेंच ने कहा, आपने यह सब तब किया जब अदालत का आदेश था. आप इतने भोले नहीं थे कि आपको पता ना चले कि अदालत में क्या हुआ है. बेंच ने कहा, इतनी मासूमियत अदालत में काम नहीं आती है. अगर आप सोच रहे हैं कि आपके वकील ने माफी मांग ली है तो हमने अभी तक यह तय नहीं किया है कि आपकी माफी स्वीकार की जाए या नहीं.

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'जब बालकृष्ण के रुख पर नाराज हो गए जज'

- बेंच तब नाराज हो गई जब पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड के प्रबंध निदेशक बालकृष्ण ने कहा कि रामदेव का कंपनी के रोजमर्रा के मामलों से कोई लेना-देना नहीं है. जस्टिस अमानुल्लाह ने बालकृष्ण से कहा, आप फिर से अपने रुख पर अड़े हुए हैं.  उन्होंने कहा कि माफी दिल से नहीं आती है.
- रोहतगी ने शुरुआत में ही अदालत से कहा कि वे सार्वजनिक माफी मांगने को तैयार हैं. उन्होंने कहा, मैंने एक सुझाव दिया था कि मैं खेद जताने के लिए और जनता को यह बताने के लिए सार्वजनिक माफी मांगने को तैयार हूं. ऐसा नहीं है कि मैं अदालत के प्रति कुछ दिखावा कर रहा हूं. बेंच ने उनसे कहा कि भारत में आयुर्वेद, योग, एलोपैथी और यूनानी जैसी कई चिकित्सा पद्धति हैं. जनता उन सभी में विश्वास करती है. किसी एक पद्धति को खराब कहना और उसे खत्म करने की सोच रखना, यह सही नहीं है. 
- रामदेव ने बेंच से कहा कि चिकित्सा की दो पद्धति के बीच इस तरह के टकराव काफी समय से हैं और उनका इरादा एलोपैथी का अनादर करना नहीं था. इससे पहले रामदेव और बालकृष्ण ने फर्म द्वारा जारी विज्ञापनों पर अपने उत्पादों की औषधीय प्रभावकारिता के बारे में बड़े दावे करने पर सुप्रीम कोर्ट के समक्ष बिना शर्त माफी मांगी थी. 

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2 अप्रैल को SC ने क्या कहा था?

सुप्रीम कोर्ट ने 2 अप्रैल की सुनवाई में पतंजलि और बालकृष्ण को कोर्ट के नोटिस का जवाब नहीं देने पर फटकार लगाई थी और कहा था कि यह पूरी तरह कोर्ट की अवहेलना है. कोर्ट ने केंद्र पर भी सवाल उठाए थे और कहा था, आश्चर्य की बात यह है कि जब पतंजलि यह कह रही थी कि एलोपैथी में कोविड का कोई इलाज नहीं है तो केंद्र ने अपनी आंखें बंद रखने का फैसला क्यों किया? कोर्ट ने यह भी कहा था कि उसे रामदेव और बालकृष्ण के खिलाफ झूठी गवाही का मामला भी शुरू करना चाहिए. क्योंकि ऐसा कहा जाता है कि हलफनामे के साथ जो दस्तावेज जोड़े गए, वो बाद में तैयार किए गए हैं. यह झूठी गवाही का स्पष्ट मामला है. हम आपके लिए दरवाजे बंद नहीं कर रहे, लेकिन वही सब बता रहे हैं जो हमने अब तक देखा है.

IMA ने पतंजलि पर क्या आरोप लगाए हैं?

दरअसल, कोविड-19 महामारी के दौरान साल 2021 में योग गुरु रामदेव ने एलोपैथिक फार्मास्यूटिकल्स पर कुछ विवादास्पद टिप्पणियां भी की थीं. इसे लेकर कई राज्यों में उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई थीं. रामदेव ने अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक एफआईआर से सुरक्षा की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था. रामदेव का कहना था कि उनकी टिप्पणियां किसी अपराध के दायरे में नहीं आतीं हैं. उनके खिलाफ सभी एफआईआर को एक साथ जोड़ने और उन्हें दिल्ली ट्रांसफर करने की मांग की थी. इस बीच, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की और कहा, पतंजलि ने कोविड-19 वैक्सीनेशन के खिलाफ एक बदनाम करने वाला अभियान चलाया. पतंजलि के भ्रामक विज्ञापन से एलोपैथिक दवाओं की उपेक्षा हो रही है.

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आयुष मंत्रालय और दिल्ली हाई कोर्ट ने भी लगाई थी फटकार

आईएमए ने कहा था, पतंजलि के दावों की पुष्टि नहीं हुई है और ये ड्रग्स एंड मैजिक रेमेडीज एक्ट 1954 और कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट 2019 जैसे कानूनों का सीधा उल्लंघन है. पतंजलि आयुर्वेद ने दावा किया था कि उनके प्रोडक्ट कोरोनिल और स्वसारी से कोरोना का इलाज किया जा सकता है. इस दावे के बाद कंपनी को आयुष मंत्रालय ने फटकार लगाई थी और इसके प्रमोशन पर तुरंत रोक लगाने के लिए कहा था. दिल्ली हाई कोर्ट ने भी रामदेव को फटकार लगाई थी. HC ने कहा था कि वो एलोपैथी के खिलाफ बयान देकर लोगों को गुमराह ना करें. आपके बयान से दूसरे देशों के साथ हमारे संबंध प्रभावित हो सकते हैं.

रामदेव ने क्या विवादित बयान दिया था?

रामदेव ने 2021 में एक बयान में कहा था कि एलोपैथिक दवाएं खाने से लाखों लोगों की मौत हुई हैं. उन्होंने एलोपैथी को 'स्टुपिड और दिवालिया साइंस' भी कहा था. इसके कुछ दिन पहले उन्होंने कहा था, ऑक्सीजन की कोई कमी नहीं है, वातावरण में भरपूर ऑक्सीजन है लेकिन लोग बेवजह सिलेंडर ढूंढ रहे हैं. रामदेव के इस बयान पर तत्कालीन केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने ऐतराज जताया था. उन्होंने कहा था, डॉक्टरों के बारे में रामदेव की टिप्पणी अस्वीकार्य है और उन्हें तत्काल माफी मांगनी चाहिए. उसके बाद रामदेव ने कहा कि वो अपना बयान वापस लेकर इस विवाद को विराम दे रहे हैं. हालांकि, कुछ घंटे बाद उन्होंने फिर एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति पर सवाल खड़े कर दिए. रामदेव ने 25 पेज की एक चिट्ठी लिखी और सवाल किए थे.

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