
कृषि कानून को लेकर दिल्ली के बॉर्डर पर घमासान मचा हुआ है, लेकिन ये सिर्फ किसानों या प्रशासन तक सिमटा हुआ नहीं. सोशल मीडिया पर भी किसानों के सपोर्ट में लड़ाई चल रही है. एक खेमा उन्हें अन्नदाता बताते हुए कह रहा है कि अगर खेती न हुई तो लोगों का पेट कैसे भरेगा. बात में दम तो है, लेकिन इसका एक पक्ष और भी है. कई देश ऐसे हैं, जहां खेती लगभग नहीं जितनी हो रही है, फिर भी वे सबसे खुशहाल जगहों में से हैं.
सिंगापुर में 1 प्रतिशत खेती की जमीन
बेहद अमीर देश सिंगापुर जमीन के लिहाज से काफी सिकुड़ा हुआ है. करीब 700 स्क्वायर किलोमीटर में फैले देश में 55 लाख से ऊपर आबादी है, मतलब हर स्क्वायर किमी पर करीब-करीब साढ़े 8 हजार लोग. हालत ये है कि सिंगापुर में छत की बजाए लोग माचिस के डिब्बे की तरह डॉमेट्री में रह रहे हैं, जिनका महीने का किराया लाखों में है. ऐसे में खेती के लिए जमीन कहां से आए.
यहां केवल 1% जमीन पर ही यहां खेती होती है, वो भी वर्टिकल स्टाइल में. इसमें एक के एक ऊपर मंजिल बनाकर अलग-अलग चीजें, फल-सब्जियां उगाई जाती रहीं. लेकिन ये इतनी बड़ी आबादी के लिए काफी नहीं. इससे पूरे देश की जरूरत का 10 प्रतिशत से भी कम पूरा हो पाता है.
खाने का करता है आयात
ऐसे में ये देश खाने के लिए आयात पर निर्भर है. वो सबसे ज्यादा फूड मलेशिया से मंगाता है. यहां से फल-सब्जियों के अलावा समुद्री भोजन भी सिंगापुर पहुंचता रहा. चावल वहां के लोग शौक से खाते हैं. इसकी आपूर्ति वियतनाम और थाइलैंड से होती आई. कुछ मात्रा में भारत से भी चावल भेजा जाता रहा.
70 के दशक से बदला देश
केवल 1 प्रतिशत जमीन पर खेती करने वाले इस देश में कभी भरपूर अनाज उगता था. यहां के कम्पोंग में खेती-बाड़ी के साथ पशुपालन भी होता. इससे चिकन और अंडे की भी कमी नहीं थी. लेकिन आजादी के बाद सत्तर के दशक से देश पूरी तरह से इकनॉमिक ग्रोथ पर फोकस करने लगा. खेतों की जगह फैक्ट्रियों ने ले ली. अब तो वहां की आबादी ही इतनी ज्यादा है कि अनाज उगाने के लिए कोई जगह बाकी नहीं.
क्या सिंगापुर में भूख से मौत होती है
वर्ल्ड पॉपुलेशन रिव्यू ने साल 2024 का स्टार्वेशन डेटा जारी किया, जो पिछले सालों के पैटर्न पर आधारित है. इसके अनुसार, सोमालिया इसमें सबसे ऊपर है, जहां हर 1 लाख में 43 लोगों की मौत प्रोटीन-एनर्जी मालन्यूट्रिशन के चलते हो रही है, यानी भूख से. वहीं सिंगापुर में हर लाख में 0.17 मौत खाने की कमी से होती है, यानी लगभग नहीं जितनी.
साल 2030 का टारगेट रखा है
बीच में सिंगापुर को कई झटके भी मिले. जैसे कोविड के दौरान जब ज्यादातर देशों ने सीमाएं सील कर रखी थीं, सिंगापुर में भी अनाज संकट दिखने लगा था. इसी दौरान वहां तय किया गया कि वे 2030 तक अपनी कुल जरूरत का 30 प्रतिशत अनाज उगाने लगेंगे.
कई फार्मिंग कंपनियां तैयार हुई हैं, जो वर्टिकल खेती कर रही हैं. इसमें मल्टीस्टोरी इमारतों में पैदावार की जाती है. इमारत के भीतर हर फसल के मुताबिक आर्टिफिशियल गर्मी या नमी का भी इंतजाम है.
बर्फ से ढंके ग्रीनलैंड में नहीं है कोई हरियाली
ग्रीनलैंड दुनिया का 12वां सबसे बड़ा देश है पर इसकी आबादी किसी छोटे शहर से बहुत कम है. ऐसे में होना तो ये चाहिए, कि यहां जमकर खेती-बाड़ी हो, लेकिन है इसका उल्टा. असल में ग्रीनलैंड का लगभग 80 फीसदी हिस्सा बर्फ से ढंका हुआ है, जिससे वहां अनाज उगाना संभव नहीं. वैसे ग्लोबल वार्मिंग के चलते वहां भी तापमान हल्का सा गर्म हुआ है. गर्मियों में मौसम कुछ खुल जाता है. तब वहां पत्तागोभी, आलू और कुछ साग-सब्जियां उगाई जाती हैं.
करोड़पतियों के देश में खेती-किसानी नहीं
एक और देश है मोनेको, जहां खेती के लिए कोई जमीन नहीं. फ्रांस के भूमध्य सागर के तट पर बसा ये देश लगभग 2.02 स्क्वायर किलोमीटर में फैला है. CIA वर्ल्ड फैक्टबुक की मानें तो क्षेत्रफल के लिहाज से ये न्यूयॉक के सेंट्रल पार्क से भी छोटा है. इतना छोटा होने के बावजूद, इस देश को दुनिया के सबसे अमीर देशों में गिना जाता है. इसकी दौलत का अंदाजा इसी बात से लगा लीजिए कि अब तक यहां पर गरीबी रेखा पर रिपोर्ट जारी नहीं हो सकी क्योंकि कोई गरीब ही नहीं है.
मोनेको की लगभग 40 हजार की आबादी में 32 प्रतिशत लोग करोड़पति, 15 प्रतिशत मल्टीमिलियनेयर और लगभग 1 दर्जन लोग बिलियनेयर हैं. यहां तक कि सीआईए वर्ल्ड फैक्टबुक में भी इस देश में गरीबी के आगे लिखा है- नॉट एप्लिकेबल यानी लागू नहीं होता.
इन देशों से मंगाता है अनाज
मोनेको पर वैसे फ्रांसीसी और इतालवी खाने का असर है, लेकिन वो फूड इंपोर्ट के लिए मिडिल ईस्ट और अफ्रीका की मदद लेता है. यहां से भारी मात्रा में लेकिन कम कीमत पर अनाज और फल-सब्जियां आ जाती हैं. मोनेको में फार्मिंग प्रमोट की जा रही है, लेकिन इसका दायरा बहुत सीमित है. ये लोगों को मिट्टी से जोड़ने की पहल की तरह देखा जा रहा है.
कई देशों में किसानों का प्रदर्शन
इटली, स्पेन, स्विटजरलैंड और रोमानिया में अलग-अलग मांगों के साथ लोग सड़कों पर आते रहे.
पोलैंड में किसान नाराज हैं क्योंकि उनका देश कम कीमत पर यूक्रेन से फूड आयात कर रहा है, बजाए उनसे खरीदने के.
जर्मनी में कुछ दिनों पहले ही किसानों ने हाईवे ब्लॉक कर दिया क्योंकि डीजल की कीमत में सब्सिडी उनके मुताबिक नहीं.
अमेरिकी किसानों की शिकायत है कि उसकी सरकार बड़ी कंपनियों से खरीदी कर रही है, बजाए लोकल किसानों को बढ़ावा देने के.