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शरण देने के मामले में सबसे पीछे हैं ये अमीर देश, जापान ने सालभर में 2 सौ शरणार्थियों को अपनाया, हंगरी ने बनाई कांटेदार बाड़, क्या है वजह?

अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव से पहले शरणार्थियों का मुद्दा चर्चा में है. डोनाल्ड ट्रंप इसके खिलाफ दिखते हैं, वहीं कमला हैरिस उनके लिए नरमी दिखा रही हैं. वैसे यूएसए हर साल अपने यहां सबसे ज्यादा लोगों को शरण देता रहा. वहीं कई ऐसे मुल्क भी हैं, जिन्होंने बाहरियों के लिए अपने दरवाजे बंद कर रखे हैं. चीन, जापान से लेकर कई यूरोपीय देश भी इस लिस्ट में हैं.

चीन शरणार्थियों से दूरी बरतता रहा. (Photo- Getty Images) चीन शरणार्थियों से दूरी बरतता रहा. (Photo- Getty Images)
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 12 सितंबर 2024,
  • अपडेटेड 4:57 PM IST

राष्ट्रपति चुनाव से पहले हो रही डिबेट में डोनाल्ड ट्रंप ने आरोप लगाया कि घुसपैठिए स्ट्रीट से उठाकर पालतू पशुओं को खा रहे हैं. इसके बाद से वहां एक बार फिर शरणार्थियों और घुसपैठियों पर चर्चा उठ खड़ी हुई. अमेरिका कई बार कह चुका कि रिफ्यूजियों का सारा जिम्मा कुछ ही देशों ने ले रखा है, जबकि कई अमीर देश इससे दूर रहते हैं. कुछ हद तक ये बात सच भी है. कई विकसित देशों ने अपनी नीतियां इतनी सख्त कर रखी हैं कि शरण पाना बेहद मुश्किल है. 

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दुनिया में कुल कितने शरणार्थी

नॉर्वेजियन रिफ्यूजी काउंसिल के अनुसार, दुनिया में सौ मिलियन से भी ज्यादा विस्थापति हैं. इनमें से लगभग 46 मिलियन लोग ऐसे हैं, जिन्होंने किसी देश में शरण ले रखी है. लेकिन आबादी का ये बंटवारा समान नहीं, बल्कि बिखरा हुआ है. किसी देश में इतने शरणार्थी कि स्थानीय लोग बगावत कर दें तो किसी देश में सालभर में सौ लोगों को भी शरण नहीं दी जाती. 

जापान करता आया हील-हुज्जत

वर्ल्ड पॉपुलेशन रिव्यू के मुताबिक, साल 2022 में जापान ने केवल 202 शरणार्थियों को अपनाया था. वही पिछले साल ये संख्या बढ़कर 303 हो गई, जो कि पिछले कई सालों में सबसे ज्यादा है. बेहद अमीर और तकनीकी तौर पर एडवांस जापान में फिलहाल उम्रदराज आबादी इतनी बढ़ चुकी कि ये दूसरे देशों से अपने लिए युवा कामगार और स्किल्ड वर्कर मांग रहा है, लेकिन शरणार्थियों को शरण देने से यह हमेशा बचता रहा.

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कल्चर बचाने के नाम पर उसने ऐसी नीतियां बना रखी हैं कि रिफ्यूजी थककर उम्मीद छोड़ दें. जैसे अगर किसी ने तीन बार शरण के लिए आवेदन कर दिया हो तो वो अपने-आप रिजेक्ट हो जाएगा. 

क्यों मुश्किल है जापान में शरण पाना

यूएन की शरणार्थी एजेंसी यूएनएचआरसी का कहना है कि जापान सिर्फ उन लोगों को शरण देने की बात करता है जो खुद पर आई मुसीबत को साबित कर सकें. इसे साबित करना उतना आसान  नहीं, साथ ही ये प्रोसेस काफी लंबी और जटिल होती है. बहुत से दस्तावेज जमा करने होते हैं, जो आमतौर पर युद्ध में बचकर भागे लोगों के पास मिलना मुश्किल है. पॉलिसी के तहत जापान अपने कल्चर को बनाए रखने के लिए बहुत कम ही आवेदन स्वीकार करता है. पिछले साल की बात करें तो जापान में कुल 4,508 लोगों ने असाइलम के लिए आवेदन किया. इसमें से भी 168 शरणार्थी आवेदनों को स्वीकार किया गया. 

चीन में हालात और खराब

साल 2022 में चीन ने लगभग 320 शरणार्थियों को अपनाया, जो कि आबादी और रिसोर्सेज की तुलना में बहुत कम है. असल में इस देश की राजनैतिक सोच काफी अलग है. वो दूसरे देशों के घरेलू मामलों से दूर रहने का दावा करता है. और इसी बात को वजह बताते हुए शरणार्थियों से भी दूरी बनाए रखता है. यहां तक कि वहां कोई पुख्ता रिफ्यूजी रिसैटलमेंट पॉलिसी तक नहीं. बदले में वो उस देश में निवेश का प्रस्ताव देता है. 

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पहले अलग था माहौल 

मॉडर्न चीन के बनने के दौरान माओ जेडॉन्ग ने अपने देश के दरवाजे खुले रखे थे. उस समय मिडिल ईस्ट से लेकर बहुतेरे देशों के लोग चीन आने लगे. ज्यादातर लोग मुस्लिम समुदाय से थे. इसी बीच देश में तनाव बढ़ा. आबादी का ऊंचा जाता ग्राफ और नए बदलाव इसकी वजह थे, लेकिन इसी बीत कम्युनिस्ट सरकार ने जनता की नब्ज पहचान ली. वो समझ गई कि जनता विदेशियों से अपनी जमीन और नौकरी शेयर नहीं करना चाहती. अस्सी के दौर से ही शरणार्थियों पर रोक लगने लगी, जो अब एक तरह का अलिखित कानून बन चुकी है.

मुस्लिमों पर कथित हिंसा भी वजह

इसके अलावा चीन में जिस तरह की सेंसरशिप है, साथ ही वहां बसे उइगर मुस्लिमों पर इंटरनेशनल मीडिया में जैसी रिपोर्ट्स आती हैं, मिडिल ईस्टर्न लोग वहां खुद भी नहीं जाना चाहते. 

ये देश भी शरणार्थियों से बचते रहे

साल 2022 में जब रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध शुरू हुआ, तब लाखों की संख्या में यूक्रेनियन पड़ोसी देश जाने लगे. इसी समय हंगरी, पोलैंड और चेक रिपब्लिक ने कड़ा रवैया अपनाते हुए बॉर्डर पर पहरे बढ़ा दिए. यूएनएचआरसी ने जब रिफ्यूजियों के समान बंटवारे की बात की, तब भी इन देशों ने प्लानिंग का हिस्सा बनने से साफ मना कर दिया था.

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वेटिकन सिटी भी रिफ्यूजियों से दूर रहता आया. हालांकि इसके पीछे दूसरे कारण हैं. एक तो ये देश काफी छोटा है, जिसके पास नए लोगों को बसाने की जगह और प्रशासनिक ताकत नहीं. दूसरी वजह धार्मिक है. ये धार्मिक और राजनैतिक आधार पर बना स्ट्रक्चर है. यहां पर ईसाई धर्म से जुड़े अधिकारी, चर्च के लोगों को भी रहने की इजाजत मिलती है. पिछले दस सालों में वेटिकन में कितने लोगों को असालइम मिला, इसका कोई डेटा नहीं मिलता क्योंकि ये सार्वजनिक भी नहीं किया जाता. 

हंगरी लगातार रहा विवादों में

हंगरी को अपनी खराब मेहमाननवाजी के लिए जाना जाता रहा. मध्य-पूर्व में बढ़ती अस्थिरता के बीच साल 2015 में इस देश ने एकदम से शरणार्थियों को लेकर सख्ती शुरू कर दी. जैसे उसने सर्बिया और क्रोएशिया के साथ लगी सीमाओं पर कांटेदार बाड़ और दीवारें बना दीं, जिससे बहुत बार घुसपैठिए घायल भी हुए. वहां की सरकार ने कई नियम बना दिए, जिससे रिफ्यूजियों की मदद करने वाले लोगों और संस्थाओं के भी हाथ बंध गए.

हंगरी की सरकार का कहना है कि रिफ्यूजियों के चलते न केवल उसके देश की सुरक्षा खतरे में आ सकती है, बल्कि कल्चर भी खत्म हो सकता है. 

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