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रेलवे स्टेशन या शहर ही नहीं, देश भी बदलते रहे अपने नाम, क्या है इसकी प्रक्रिया, कितना आता है खर्च?

उत्तर प्रदेश में रेलवे स्टेशनों के नाम बदलने पर चर्चा हो रही है. वैसे स्टेशन ही नहीं, राज्यों और यहां तक कि देशों के भी नाम बदलते रहे. कुछ समय पहले ही तुर्की ने खुद को तुर्किये में बदल दिया, या चेक रिपब्लिक चेकिया कहलाने लगा. ज्यादातर देश गुलामी की याद से छुटकारा पाने के लिए नाम बदलते रहे.

तुर्की समेत कई देश अपना नाम बदल चुके. तुर्की समेत कई देश अपना नाम बदल चुके.
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 28 अगस्त 2024,
  • अपडेटेड 12:26 AM IST

आजादी के बाद से अब तक देश के 9 राज्यों और 2 संघशासित प्रदेशों का नाम बदल चुका. शहरों, चौराहों और रेलवे स्टेशनों के नाम तो बदलते ही रहते हैं. लेकिन देशों के लिए नाम बदलना नई बात नहीं. जानें, क्यों बदलते हैं देश अपने नाम, इसकी क्या प्रक्रिया है, और कितनी जटिल है. 

किन देशों ने बदले नाम

दुनियाभर की सरकारें अपने राज्यों, जिलों या जगहों के नाम बदलती रहीं. कई सरकारों ने अपने देश के नाम भी बदल डाले. आमतौर पर ये किसी पुराने गलत को सुधारने की कोशिश रही. जैसे साल 2023 में तुर्की ने यूनाइटेड नेशन्स से गुजारिश की कि वे उसका तुर्की भाषा वाला नाम तुर्किये ही इस्तेमाल में लाएं. इसके पहले चेक रिपब्लिक ने अपने अलग नाम चेकिया के लिए संसद में वोटिंग करवाई. साल 2018 में यूगोस्लाव रिपब्लिक ऑफ मेसेडोनिया ने अपना नाम नॉर्थ मेसेडोनिया कर डाला. 

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कई देश अपने किसी शहर का नाम छोटे वक्त के लिए भी बदलते रहे. जैसे साल 2011 में ऑस्ट्रेलियाई शहर स्पीड ब्रीफली ने अपना नाम स्पीड किल्स कर लिया था ताकि सड़क हादसों पर जागरुकता लाई जा सके. 

क्यों बदलते हैं नाम

ज्यादातर देश वे हैं, जो किसी वक्त पर ब्रिटेन या किसी और देश के अधीन रहे. जैसे ब्रिटिश खोजकर्ताओं समुद्री सफर के बाद जब भी किसी पड़ाव पर पहुंचते, अपनी भाषा और सोच के मुताबिक उस जगह का नामकरण कर देते. मिसाल के तौर पर, घाना का नाम उन्होंने गोल्ड कोस्ट कर दिया. लेकिन साल 1957 में आजादी के बाद देश को वापस घाना बना दिया गया. उसके कुछ बाद में सीलॉन ने अपना नाम श्रीलंका कर लिया, और अपर वोल्टा बदलकर बुर्किना फासो हो गया. 

कई बार विवादों को खत्म करने के लिए भी नाम बदले गए

मेसेडोनिया ने कुछ साल पहले ही खुद को नॉर्थ मेसेडोनिया बना लिया. सुनने में ये बदलाव मामूली लगता है लेकिन इसकी वजह ग्रीस से उसके रिश्ते सुधरे. दरअसल ग्रीस में भी इस नाम से एक जगह है, और वो लंबे समय से दूसरे देश से अपना नाम बदलने की मांग करता रहा. इस बदलाव के साथ ही नॉर्थ मेसेडोनिया के नाटो में शामिल होने के रास्ते खुल गए. 

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क्या है नया नाम रखने की प्रक्रिया

देशों के नाम बदलने की एक पूरी प्रक्रिया है, जो बेहद खर्चीली भी है. सबसे पहले देश के भीतर ही नाम बदलने को लेकर वोटिंग होती है.

इसके बाद नया नाम यूनाइटेड नेशन्स में भेजा जाता है.

बताया जाता है कि 6 आधिकारिक इंटरनेशनल भाषाओं में कैसे ये नाम लिखा जाए.

सबकुछ ठीक रहे तो नाम यूएन के डेटाबेस ऑफ वर्ल्ड जियोग्राफिकल नेम्स में शामिल हो जाता है.

इसके बाद मिलिट्री यूनिफॉर्म, देश की करेंसी, सरकारी दस्तावेजों, सब पर नाम बदलना होता है. इसमें पेपरवर्क, वेबसाइट, सरकारी दफ्तरों पर साइनएज के अलावा तमाम सरकारी दफ्तरों के लेटरहेड पर नाम बदलना भी शामिल है. 

कितना खर्च आता है इसमें

ये प्रोसेस जितनी जटिल है, उतनी ही खर्चीली भी. ये इसपर भी निर्भर करता है कि कोई देश कितना बड़ा या छोटा है. इसी के मुताबिक खर्च कम या ज्यादा हो सकता है. देश के आकार और उसके डॉक्युमेंटेशन पर काफी कुछ तय रहता है. दक्षिण अफ्रीका के इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी लॉयर डैरेन ऑलिवियर इसपर लंबे समय से काम कर रहे हैं. वे देशों में नाम बदलने को लेकर स्टडी करते रहे. वे दावा करते हैं कि अफ्रीकी देश स्वाजीलैंड को एस्वातिनी बनाने में लगभग 6 मिलियन डॉलर लगे होंगे. 

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इस तरह से लगा सकते हैं अंदाजा 

नाम बदलने पर कितना खर्च आएगा, ये उस देश की टैक्सेबल और नॉन-टैक्सेबल इन्कम पर निर्भर करता है. ये प्रोसेस वैसी ही है, जैसे किसी बड़े कॉर्पोरेट ग्रुप की रीब्रांडिंग करना. मान लीजिए, कोई ग्रुप अपना नाम बदलना चाहे, तो कागजों में, बैंक में तो इसे बदला ही जाएगा, साथ ही बड़ा खर्च लोगो बदलने और रीब्रांडिंग में लगेगा. 

कॉर्पोरेट पर इससे खास फर्क नहीं पड़ता, लेकिन छोटी कंपनियों के लिए ये नुकसान का सौदा है. यही बात कम और ज्यादा जीडीपी वाले देशों पर भी लागू होती है.

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