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सिंगापुर ने कीड़ों की 16 किस्मों को दी खाने की मंजूरी, क्यों UN भी पशुओं की बजाय कीड़े-मकोड़ों को बनाना चाहता है फूड सोर्स?

सिंगापुर की फूड एजेंसी ने 16 ऐसे कीड़े-मकोड़ों की लिस्ट बनाई है, जिन्हें खाना सुरक्षित है. ये इनसेक्ट जल्द ही बाजारों में सब्जी-फल की तरह बिकने आएंगे. सिंगापुर अकेला नहीं, बल्कि 128 ऐसे देश हैं, जहां कीड़ों को फूड आइटम में रखा जाता है. कुछ ऐसी भी जगहें हैं, जहां सौ से ज्यादा स्पीशीज खाई जाती रहीं. अब यूनाइटेड नेशन्स भी इसकी वकालत कर रहा है.

सिंगापुर में अब कीड़ों की कई किस्में खाने में मिलेंगी. (Photo- AFP) सिंगापुर में अब कीड़ों की कई किस्में खाने में मिलेंगी. (Photo- AFP)
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 10 जुलाई 2024,
  • अपडेटेड 6:38 PM IST

दुनिया में खाने की कमी को लेकर लगातार खबरें आ रही हैं. एक और चिंता ये है कि लोग खाते तो हैं, लेकिन पोषण नहीं मिल पाता. अब इसी कमी को पूरा करने के लिए सिंगापुर एक आइडिया लेकर आया. वो अपने यहां कीड़े-मकोड़ों को आधिकारिक तौर पर खाने में शामिल कर रहा है. सिंगापुर फूड एजेंसी (SFA) ने इसपर अप्रूवल देते हुए 16 ऐसे इनसेक्ट्स की पहचान भी कर ली, जिन्हें खाना इंसानों के लिए सेफ है. 

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SFA ने इंसेक्ट रेगुलेटरी फ्रेमवर्क बनाते हुए स्टेटमेंट जारी किया, जो ये तय करेगा कि खाना कितना सुरक्षित और सेहतमंद है. इसमें कहा गया कि चूंकि इनसेक्ट इंडस्ट्री नई है, और कीड़े नया फूड आइटम, इसलिए इसपर गाइडलाइन की जरूरत पड़ेगी. एजेंसी ऐसे कीड़ों या उनसे बने उत्पाद के इंपोर्ट की भी इजाजत देगी, जो इंसानों के लिए नुकसानदेह नहीं. 

किन कीड़ों को माना गया खाने लायक

इनमें झींगुर, मॉथ, अलग-अलग किस्म के टिड्डे, बीटल्स,  सिल्कवॉर्म, मधुमक्खी और क्रिकेट की किस्में हैं, जो कुल मिलाकर 16 हैं. 

क्यों बनाया जा रहा कीड़ों को खाने का सोर्स

असल में सिंगापुर खाने-पीने के लिए ज्यादातर आयात पर निर्भर करता रहा. इसका कारण भी है. बेहद अमीर देश सिंगापुर जमीन के लिहाज से काफी सिकुड़ा हुआ है. करीब 700 स्क्वायर किलोमीटर में फैले देश में 55 लाख से ऊपर आबादी है, मतलब हर स्क्वायर किमी पर करीब-करीब साढ़े 8 हजार लोग. हालत ये है कि सिंगापुर में छत की बजाए लोग माचिस के डिब्बे की तरह डॉमेट्री में रह रहे हैं, जिनका महीने का किराया लाखों में है. ऐसे में खेती के लिए जमीन कहां से आए.

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90 फीसदी खाना आयात होता है

केवल 1% जमीन पर ही यहां खेती होती है, वो भी वर्टिकल स्टाइल में. इसमें एक के एक ऊपर मंजिल बनाकर अलग-अलग चीजें, फल-सब्जियां उगाई जाती रहीं. लेकिन ये इतनी बड़ी आबादी के लिए काफी नहीं. इससे पूरे देश की जरूरत का 10 प्रतिशत से भी कम पूरा हो पाता है.

ये देश खाने के लिए आयात पर निर्भर है. वो सबसे ज्यादा फूड मलेशिया से मंगाता है. यहां से फल-सब्जियों के अलावा समुद्री भोजन भी सिंगापुर पहुंचता रहा. चावल वहां के लोग शौक से खाते हैं. इसकी आपूर्ति वियतनाम और थाइलैंड से होती आई. कुछ मात्रा में भारत से भी चावल भेजा जाता रहा.

अगले 6 सालों का टारगेट

यहां तक सब ठीक चलता रहा लेकिन हाल के सालों में सिंगापुर को कई झटके मिले. जैसे, कोविड के दौरान जब देशों ने सीमाएं सील कर रखी थीं, सिंगापुर में भी अनाज संकट दिखने लगा था. इसी दौरान वहां तय किया गया कि वे 2030 तक अपनी कुल जरूरत का 30 प्रतिशत अनाज उगाने लगेंगे. धीरे-धीरे ये टारगेट बढ़ाया जाएगा. 

फिलहाल यहां कई फार्मिंग कंपनियां तैयार हुई हैं, जो वर्टिकल खेती कर रही हैं. इसमें मल्टीस्टोरी इमारतों में पैदावार की जाती है. इमारत के भीतर हर फसल के मुताबिक आर्टिफिशियल गर्मी या नमी का भी इंतजाम है. कीड़ों को खाने में शामिल करना भी इसी आत्मनिर्भरता का हिस्सा है. 

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और कहां खाए जाते हैं कीड़े

विज्ञान जर्नल- साइंटिफिक रिपोर्ट की इसी साल जारी रिपोर्ट के अनुसार, एक या दो नहीं, बल्कि 128 देश कीड़े-मकोड़े को फूड आइटम मानते हैं. कुल मिलाकर, सवा दो हजार स्पीशीज खाई जाती हैं. कीड़े खाने वाले देशों में एशियाई के अलावा अफ्रीकन देश और मैक्सिको भी है. 

क्यों यूएन भी दे रहा बढ़ावा

खाद्य संकट को देखते हुए यूनाइटेड नेशन्स भी इनसेक्ट्स को फूड सोर्स की तरह बढ़ावा देने की कोशिश में है. हालांकि इसकी बड़ी वजह क्लाइमेट चेंज है. असल में पशुओं को पालने-पोसने और फिर खाने से ग्लोबल वॉर्मिंग बढ़ रही है. इनकी बजाए कीड़े प्रोटीन का बढ़िया सोर्स हैं, और क्लाइमेट चेंज की प्रोसेस को उस तरह से नहीं उकसाते. ये बंद स्पेस में, कम खाने-पानी के साथ पलते हैं और कम मीथेन पैदा करते हैं. जबकि पशुपालन ज्यादा समय और एनर्जी तो लेता ही है, उनकी वजह से मीथेन भी ज्यादा निकलती है, जो ग्लोबल वॉर्मिंग को तेजी से बढ़ा रही है. यही कारण है कि बहुत से देशों में शाकाहार के लिए कैंपेन भी चल रहे हैं ताकि लाइवस्टॉक खाना कम हो सके. 

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