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समलैंगिक संबंधों पर मौत की सजा के कानून पर वर्ल्ड बैंक ने फ्रीज किया युगांडा का लोन

अफ्रीकी देश युगांडा ने LGBTQ संबंधों पर बेहद कड़ा स्टेप लेते हुए एक बिल साइन किया. इसके तहत समलैंगिक संबंध रखने पर लोगों को आजीवन कारावास या मौत की सजा तक हो सकती है. इसे लेकर युगांडा को पूरी दुनिया समझाइश दे रही है. वहीं वर्ल्ड बैंक ने अनोखा ही कदम उठाया. उसने इस देश को नए लोन न देने का एलान कर दिया.

वर्ल्ड बैंक ने युगांडा को नए लोन देने से मना कर दिया. सांकेतिक फोटो (Unsplash) वर्ल्ड बैंक ने युगांडा को नए लोन देने से मना कर दिया. सांकेतिक फोटो (Unsplash)
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 22 अगस्त 2023,
  • अपडेटेड 3:07 PM IST

युगांडा के राष्ट्रपति योवेरी मुसेवेनी ने करीब ढाई महीने पहले समलैंगिक संबंधों के खिलाफ कठोर बिल वाले दस्तावेज पर साइन कर दिए. वहां की सरकार का मानना है कि LGBTQ असल में पश्चिमी अनैतिकता है, जो उनके देश में भी घुन लगा रही है. युगांडा को मजबूत बनाए रखने के लिए ये कानून लाया गया, जिसके तहत होमोसेक्सुअल रिश्ते बनाने वालों को ताउम्र जेल या मौत की सजा तक मिल सकती है. वैसे तो समलैंगिक संबंधों को लेकर कई जगहों पर मिला-जुला रिएक्शन दिखता है, लेकिन इतना सख्त नियम बनाने वाला ये पहला देश है. अब वर्ल्ड बैंक ने उसे नया कर्ज देने से मना कर दिया है. 

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क्या ह्यूमन राइट्स वॉचडॉग बन चुका है वर्ल्ड बैंक

मानवाधिकार पर काम करने के लिए इंटरनेशनल स्तर पर कई संस्थाएं हैं, लेकिन हाल में कर्ज देने वाली संस्था वर्ल्ड बैंक ने जो कदम उठाया, उससे इसके भी ह्यूमन राइट्स की तरफ मुड़ने के कयास लग रहे हैं. ये ऑर्गेनाइजेशन अब तक विशुद्ध नफा-नुकसान पर काम करता रहा, जैसा कि बाकी बैंक करते हैं. यहां तक कि युद्ध के लिए धमकाते या दूसरों की सीमाएं हड़पते देशों को भी इसने ऋण के लिए इनकार नहीं किया. तो क्या वजह है जो युगांडा के मामले में इसका टेक बदला हुआ है. ये समझने के लिए एक बार वर्ल्ड बैंक के बारे में थोड़ा जानते चलें. 

वर्ल्ड बैंक की स्‍थापना साल 1944 के ब्रेटन वुड्स सम्‍मेलन में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के साथ की गई थी. यह यूनाइटेड नेशन्स का अहम अंग है. बैंक IMF और विश्व व्यापार संगठन के साथ मिलकर काम करता है. फिलहाल इसके 189 सदस्य हैं. वर्ल्ड बैंक उन सभी देशों को मदद देता है, जिनकी एनुअल पर कैपिटा आय साढ़े 12 हजार डॉलर से कम हो. 

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क्या हैं यहां लोन के नियम

बैंक का नियम कहता है कि ये पॉलिटिकल आधार पर कोई फैसला नहीं ले सकता. इसके आर्टिकल ऑफ एग्रीमेंट में ये भी साफ है कि देश के आंतरिक मामलों में उसका कोई दखल नहीं रहेगा. ये केवल इकनॉमी पर काम करने के लिए है. अब तक वर्ल्ड बैंक ने उन्हीं देशों को कर्ज नहीं दिया, जो या तो भारी उधार में पहले से डूबे हुए हैं, या फिर जिन्होंने उससे कर्ज मांगा ही नहीं. 

मसलन, उत्तर कोरिया ने कभी वर्ल्ड बैंक से उधार नहीं लिया, क्योंकि इसके लिए उसे अपने यहां के पैसों का सारा लेखाजोखा खोलकर दिखाना होगा. साथ ही साथ फॉरेन एक्सचेंज को भी रास्ता देना होगा. वहां के सैन्य तानाशाह किम जोंग इस बात से बचते रहे कि चाहे इकनॉमी के जरिए ही सही, उनके देश में किसी तरह का विदेशी दखल हो. ये तो खैर उत्तर कोरिया की अपनी चॉइस है, लेकिन वर्ल्ड बैंक पर पक्षपाती होने के आरोप लगते हैं. 

अक्सर लगता रहा पूर्वाग्रह का आरोप

वैसे तो लगभग 190 देश इसके सदस्य हैं, लेकिन इसकी डायरेक्टर कमेटी में 25 ही देश शामिल हैं. ये सबसे ताकतवर देश हैं. यही बोर्ड ऑफ एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर तय करते हैं कि किस देश को लोन मिलेगा, और किन शर्तों पर मिलेगा. ये देश, दूसरे सदस्यों के बारे में कैसी राय रखते हैं, इसका सीधा असर लोन पर होता है. जैसे अमेरिका और क्यूबा के आपसी रिश्ते अच्छे नहीं. इसका असर लोन पर भी होता. या फिर ये हो सकता था कि पैसों के जरिए अमेरिका क्यूबा के अंदरुनी मामलों में दखल देने की कोशिश करता. यही देखते हुए इस देश ने खुद ही वर्ल्ड बैंक से अपनी सदस्यता वापस खींच ली.

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चीन ने दिया काफी कर्ज

अफ्रीका की बात करें तो वर्ल्ड बैंक यहां लोन तो देता रहा, लेकिन बीते कुछ समय से चीन भी अफ्रीकी देशों में काफी इनवेस्ट कर रहा है. अफ्रीका कर्ज ले भी रहा है क्योंकि ये कम ब्याज और कम शर्तों पर ऋण देता है. वहीं वर्ल्ड बैंक में ब्याज दर कुछ ज्यादा रहती है.

अफ्रीका देश चूंकि नेचुरल रिसोर्सेज का भंडार हैं इसलिए लगभग सारे मजबूत देशों की नजर उसपर रही. ऐसे में चीन-अफ्रीका-अमेरिका का लव-हेट ट्राएंगल अमेरिका के लिए घाटे का सौदा हो सकता है, जो कि खुद बैंक की डायरेक्टर कमेटी में है.

यही वजह है कि बैंक कई तरह से अफ्रीका पर दबाव डालने की कोशिश करता रहा. इसी साल अप्रैल में वर्ल्ड बैंक के प्रेसिडेंट डेविड मेलपास ने कई अफ्रीकी देशों की यात्रा की और कहा कि बैंक को वाकई में अपने लोन्स को ज्यादा पारदर्शी बनाने की जरूरत है ताकि इन देशों को विकास के लिए चीन की शरण में न जाना पड़े. अब युगांडा में लोन पर रोकटोक को भी साम-दाम-दंड-भेद की रणनीति की तरह देखा जा रहा है. इससे पहले मानवाधिकार से जुड़े किसी मुद्दे पर बैंक ने इस तरह का कदम नहीं उठाया था.

 

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