
सेफ ब्लड ट्रांसफ्यूजन सिस्टम के तहत ये तय करने की कोशिश होती है कि मरीज को हर हाल में सुरक्षित खून ही मिले. उसमें किसी भी तरह की ऐसी बीमारी न हो, जो ब्लड से फैलती हो. इसे पक्का करने के लिए सेंटर के परिवार कल्याण मंत्रालय की ब्लड डोनर सिलेक्शन गाइडलाइन में कई बातें हैं. यहां इस बात का भी खुला जिक्र है कि कौन-कौन ब्लड डोनेशन कर सकते हैं और कौन नहीं.
कौन खून नहीं दे सकता?
रक्तदान के लिए लोगों का वयस्क और स्वस्थ होना जरूरी है, वहीं उम्रदराज, बीमार लोग और प्रेग्नेंट या लेक्टेटिंग महिलाएं खून नहीं दे सकती हैं. क्रॉनिक स्किन डिसीज के मरीज और 6 महीने पहले टैटू करवाए लोगों का भी ब्लड नहीं लिया जाता है. टैटू के बारे में डर रहता है कि सुई से यौन बीमारी न हो गई हो. कुत्ता काटने पर अगर सालभर के भीतर रेबीज का टीका लिया हो, तो भी आप ब्लड डोनर नहीं हो सकते.
LGBTQ को रखा गया बाहर
इसी लिस्ट में कुछ और लोग भी हैं. एलजीबीटीक्यू को इसकी इजाजत नहीं. इस बात पर लगभग दो साल पहले एससी में इस समुदाय के एक शख्स थंगजम सिंह ने याचिका लगाई और भेद खत्म करने की मांग की. इसपर सरकार ने डोनर गाइडलाइन को पूरी तरह वैज्ञानिक बताया. इसे सपोर्ट करने के लिए स्टडीज का भी हवाला दिया.
साल 1980 में ब्लड डोनर्स की गाइडलाइन को साफ करते हुए गे समुदाय के रक्तदान पर पाबंदी लगी. ये प्रतिबंध समलैंगिक पुरुष, समलैंगिक महिलाओं और ट्रांसजेंडरों के लिए था. यहां साफ कर दें कि ट्रांस उन्हें कहते हैं, जिनकी लैंगिक पहचान उनके जन्म की पहचान से अलग होती है, यानी पुरुष की तरह जन्मा शख्स खुद को महिला पाए या इसका उल्टा हो. अस्सी के दौर में इसपर खास स्टडी तो नहीं थी, लेकिन माना गया कि ये लोग यौन संबंधों के दौरान लापरवाही बरतते होंगे और इनका ब्लड डोनेशन न करना ही ठीक है.
किन बीमारियों का खतरा
हमारे यहां ब्लड डोनेशन के लिए क्लॉज 12 की गाइडलाइन फॉर ब्लड डोनर सलेक्शन एंड ब्लड डोनर रेफरल 2017 को देखा जाता है. इसके मुताबिक डोनेट किया जा रहा खून किसी भी फैलने वाली बीमारी से रहित होना चाहिए. कई बीमारियां हैं, जो ब्लड ट्रांसफ्यूजन से फैलती हैं, जैसे HIV और हेपेटाइटिस बी और सी का संक्रमण. खून लेते समय मेडिकल ऑफिसर को रक्तदाता की फिटनेस देखनी चाहिए.
इसी गाइडलाइन के तहत गे और ट्रांसजेंडरों के ब्लड डोनेशन पर पाबंदी है. नेशनल ब्लड ट्रांसफ्यूजन काउंसिल और नेशनल एड्स कंट्रोल ऑर्गेनाइजेशन ने मिलकर इसे इश्यू किया था.
अमेरिका में क्या है नियम?
अमेरिका में हाल तक ट्रांस और गे लोगों के रक्तदान पर प्रतिबंध था. दिसंबर 2015 में ही फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने इसमें थोड़ा बदलाव करते हुए जोड़ा कि वे भी खून दे सकते हैं, अगर उन्होंने पिछले 12 महीनों के दौरान यौन संबंध न बनाए हों. पब्लिक सेफ्टी के लिए ये जरूरी माना गया. साल 2020 में इस नियम में एक बार फिर बदलाव हुआ. अबकी बार एक साल के पीरियड को घटाकर 3 महीने कर दिया गया. लेकिन सरकार ने खुद माना कि ये बदलाव कोरोना वायरस के बढ़ते मामलों और खून की कमी को देखते हुए किया गया था.
अब भी 3 महीने वाला नियम लागू है. अगर समलैंगिक पुरुष या महिला या फिर टांसजेंडर बीते 3 महीनों में सेक्सुअली एक्टिव रहे हों या नया पार्टनर जुड़ा हो, तो वे खून नहीं दे सकते.
किन-किन देशों में कितनी समय-सीमा?
यूनाइटेड किंगडम में भी ब्लड डोनेशन का नियम कुछ इसी तरह का है. वहां डोनर से पूछा जाता है कि बीते 3 महीनों के दौरान क्या उसके मल्टीपल पार्टनर रहे या फिर कोई नया पार्टनर बना. अगर ऐसा नहीं हो तो वो खून डोनेट कर सकता है. स्विटजरलैंड में एक साल तक यौन संबंध न हों, तभी समलैंगिक और ट्रांस रक्तदान कर सकते हैं. कमोबेश ऐसे ही रूल दूसरे देशों में भी लागू हैं.
कनाडा में नियम कुछ ज्यादा सख्त है. वे मानते हैं कि हाई-रिस्क सेक्सुअल बिहेवियर वाली श्रेणी में यौन बीमारियों का खतरा भी ज्यादा होता है इसलिए इसकी स्क्रीनिंग जरूरी है. ऑस्ट्रेलिया में गे और ट्रांस लगातार ब्लड डोनेशन में भेदभाव की शिकायत करते रहे. यहां भी तीन महीने वाला नियम लागू है.
सरकारें मानती हैं कि जरूरतमंद और बीमार लोगों को सेफ ब्लड मिले, इसके लिए नियम मानने होंगे. ये नियम कुछ अध्ययनों पर आधारित हैं जो दावा करते हैं कि LGBTQ का सेक्सुअल एनकाउंटर तथाकथित सामान्य जोड़ों से ज्यादा होता है. ऐसे में उनपर सेक्सुअली ट्रांसमिटेड बीमारियों का भी खतरा ज्यादा रहता है. सेफ प्रैक्टिस की कमी को भी इसके लिए जिम्मेदार माना गया. हालांकि कई अध्ययन ये भी कहते हैं कि सेफ प्रैक्टिस की कमी हर जगह है और महिलाओं को यौन रोगों का खतरा सबसे ज्यादा रहता है.