
बोरिस जॉनसन की परदादी एना कैथरीना के अवशेष साल 1975 में मिले. जांच के दौरान उनकी हड्डियों में घाव का पता लगा. ये लक्षण सिफलिस का संकेत था. एंथ्रोपोलॉजिस्ट को मृत शरीर के अवशेष देखने पर ये भी समझ आया कि शायद मरीज को इलाज भी नहीं मिला होगा. इसी के बाद मान लिया गया कि अना को सिफलिस रहा होगा. ये उस दौर में काफी फैली हुई यौन बीमारी थी, जो लाइलाज भी थी.
सिफलिस से इमेज का क्या लेनादेना?
बीमारी हुई और मरीज चला गया. इसमें पूर्व पीएम जॉनसन की इमेज का क्या मतलब? तो ऐसा इसलिए है कि बोरिस की परदादी एना एक पादरी की विधवा थीं. तो यौन रोग को चरित्र से जोड़ा जाने लगा. हालांकि अब वैज्ञानिक सिफलिस वाली थ्योरी को नकार रहे हैं. वे कह रहे हैं कि पादरी की विधवा होने के नाते वे कई बीमार लोगों से मिलती रही होंगी. वे खुद तब लगभग 70 साल की और कई बीमारियों की शिकार थीं. इसी समय वे किसी ऐसे मरीज के संपर्क में भी आ गई होंगी. फिलहाल ये ममी नेचुरल हिस्ट्री म्यूजियम ऑफ बेसल में रखी हुई है.
हिटलर के डॉक्टर की डायरी में मिला लक्षणों का जिक्र
17वीं से 20वीं सदी में इस यौन रोग ने बहुतों को अपनी गिरफ्त में लिया. यहां तक हिटलर को लेकर भी वैज्ञानिक इस तरह के दावे करते हैं. हिटलर के निजी डॉक्टर हुआ करते थे, थियो मॉरेल. उनकी डायरी एंट्री के आधार पर एक्सपर्ट कहते हैं कि इस नाजी तानाशाह को निश्चित तौर पर सिफलिस की बीमारी थी. इसी बीमारी ने धीरे-धीरे यहूदियों से उनकी नफरत बढ़ा दी. दरअसल रिपोर्ट्स के मुताबिक साल 1908 के दौरान हिटलर विएना किसी यहूदी महिला के संपर्क में आया, जिससे उसे सिफलिस हो गया.
जर्मनी में नाजी ताकत के तौर पर उभरने के बाद हिटलर ने सिफलिस को यहूदियों का रोग कहते हुए बीमारी की जड़ यानी उन्हें ही खत्म करने की बात कही. यहां तक अपनी आत्मकथा में भी कई पेजों में हिटलर ने इस बीमारी की बात की है. इसमें लिखा है- सिफलिस जैसी यहूदी बीमारी को खत्म करना जर्मनी का फर्ज है.
हिंसक होना भी इसका एक लक्षण
ब्रिटिश मनोचिकित्सक डॉक्टर बसीम हबीब के मुताबिक हिटलर में वे सारे लक्षण थे, जो सिफलिस के मरीज में होते हैं. त्वचा पर लाल चकत्ते या फोड़े बनते रहना, पेट खराब होना, बेहद गुस्सा आना जैसी दिक्कतें हिटलर को थीं. वक्त के साथ मूड स्विंग्स बदलकर ज्यादा आक्रामक होता चला गया, जो कि सिफलिस की एडवांस स्टेज न्यूरो सिफलिस के दौरान अक्सर होता है.
यौन बीमारी से जूझते हुए हिटलर यहूदियों के लिए लगातार हिंसक होता गया. यहां तक कि लाखों यहूदियों को गैस चैंबर में मार दिया गया. बच्चों को भी नहीं छोड़ा गया, सिर्फ इसलिए कि वे यहूदी थे. एंटीबायोटिक के आने से पहले सिफलिस लाइलाज था. तब अक्सर मरीज को पागलपन के दौरे पड़ते और इसी अवस्था में कई शारीरिक-मानसिक तकलीफें झेलते हुए उसकी मौत होती थी. अब भी सिफलिस को इंटरनेट पर खोजें तो पागलपन के बारे में लिखा जरूर दिखता है.
ज्यूस को कहता था पैरासाइट
वैसे हिटलर का विषाणुओं-बैक्टीरिया से डर और यहूदियों से नफरत दोनों साफ थे. वो अक्सर ही अपने भाषणों में यहूदियों को पैरासाइट कहते हुए उन्हें खत्म करने की बात कहता. नाजी जब अपना प्रचार करते हुए आम जर्मन्स को अपनी तरफ करने की कोशिश करते तो हिटलर की कही हुई बातें दोहराते. जैसे- द ज्यू इज द पैरासाइट ऑफ ह्यूमैनिटी. 'मेटाफर, नेशन एंड द होलोकास्ट' नाम की किताब में हिटलर की इस नफरत और डर का जिक्र मिलता है.
क्या यौन कुंठा का शिकार था हिटलर?
हिटलर की यौन जिंदगी के बारे में कम ही जानकारी मिलती है. नाजी दौर में जर्मनी में वेश्यावृति पर बैन लगा हुआ था. हालांकि बीच-बीच में कई किताबें और डॉक्युमेंट्रीज हिटलर पर कई नई जानकारियां लेकर आती रहीं. साल 2021 में हिटलर पर बनी एक डॉक्युमेंट्री में दावा था कि वो अपनी किशोरावस्था से लेकर शुरुआती युवावस्था में पुरुषों की तरफ आकर्षित रहा.
'हिटलर्स सीक्रेट सेक्स लाइफ' नाम की इस फिल्म का दावा था कि साल 1933 में जर्मन चांसलर बनने तक हिटलर पूरी तरह से एडिक्ट हो चुका था. यहां तक कि कथित तौर पर उसने अपनी भतीजी से भी संबंध बनाए थे और एक रोज वो संदेहास्पद हालातों में मरी मिली.
क्या खत्म हो चुकी है ये बीमारी?
सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिसीज की बात होती है तो HIV/AIDS की बात होती है, लेकिन सिफलिस का जिक्र नहीं आता. तो क्या ये बीमारी जड़ से खत्म हो चुकी है? नहीं. संक्रमित शख्स से संबंध बनाने पर होने वाली ये बीमारी एक तरह का बैक्टीरियल इंफेक्शन है. ट्रैपोनेमा पैलिडम नाम के बैक्टीरिया से एक से दूसरे तक फैलने वाली बीमारी एड्स की तरह ही कई जरियों से फैलती है. यानी संक्रमित इंजेक्शन से या फिर संक्रमित के खुले घावों के सीधे संपर्क में आने पर.
सिफलिस, जिसे सूजाक भी कहते हैं, की चार स्टेज होती हैं. पहली स्टेज में मुंह, जीभ, हथेलियों या अंदरुनी अंगों में घाव होता है, जो कुछ हफ्तों में अपने-आप ठीक हो जाता है. दूसरे चरण में स्किन रैश दिखने लगते हैं. गले में हरदम खराश रहती है. इन दो चरणों में बीमारी सबसे ज्यादा संक्रामक होती है. तीसरे और चौथे चरण, जिन्हें लेटेंट और टर्शरी सिफलिस कहा जाता है, में लक्षण ऊपरी तौर पर दिखना कम हो जाते हैं, लेकिन व्यक्ति लगातार बीमार और आक्रामक होता चला जाता है. आखिरी अवस्था में कई गंभीर समस्याओं के साथ व्यक्ति की मौत होती है.
जैविक हथियार बना दिया गया था
लड़ाइयों के दौर में इस बीमारी को जैविक हथियार की तरह भी इस्तेमाल किया गया. तब सेनाएं दुश्मन देशों के सैनिकों के पास ऐसी स्त्रियों को भेजतीं जो इस बीमारी से ग्रस्त हों. यौनकर्मियों की तरह काम करती ये महिलाएं या कमउम्र युवक एक तरह का बायोलॉजिकल वेपन हुआ करते तो दुश्मनों को कमजोर बना देते. दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जापान की सेना पर आरोप लगा कि उसने चीन के सिविलियन्स तक पर सिफलिस से जुड़े प्रयोग किए और उन्हें मार दिया. नब्बे के दशक में इस तरह के डॉक्युमेंट्स बाहर आए थे, तब संयुक्त राष्ट्र में हल्ला भी मचा था.