
हर दिन देश-दुनिया में कत्ल की अनगिनत घटनाएं होती हैं. गोली मार देना, चाकू या किसी धारदार हथियार से हत्या जैसे मामलों की खबरों ने तो जैसे लोगों को चौंकाना ही बंद कर दिया है. फिर अचानक आफताब पूनावाला-श्रद्धा वाकर जैसी खबर आती है जिसमें कातिल ने कत्ल के बाद लाश के टुकड़े करके हैवानियत की हदें पार कर दीं. आफताब का मामला अभी सुलझा भी नहीं था कि मुंबई के मीरानगर हत्याकांड ने सबकी नींदें उड़ा दीं.
इस घटना में भी कातिल लिव इन पार्टनर ने सात साल से साथ रह रही प्रेमिका की लाश के टुकड़े टुकड़े किए. उन लाश के टुकड़ों को मिक्सर में पीसा. उन टुकड़ों को उबालकर कुत्तों को भी खिलाया. सामान्य तौर पर कत्ल करने वाले लोगों को क्रिमिनल साइकोलॉजी अलग तरह से व्याख्या करती है. इसमें हालात, परवरिश, शिक्षा, सामाजिक स्थिति, मानसिक हालत सबकुछ जिम्मेदार होते हैं. मगर जब ऐसे मामले सामने आते हैं जिसमें अपने ही परिचित किसी की मौत के बाद लाश के साथ हैवानियत करते हैं, उन्हें साइकोपैथ का दर्जा दिया जाता है.
जानी मानी मनोवैज्ञानिक डॉ विधि एम पिलनिया कहती हैं कि डेड बॉडी के साथ क्रूरता करना मानसिक विक्षिप्तता ही कहा जाएगा. नेक्रोफिनिक टेंडेंसी वाले अपराधी मौत के बाद लाश के साथ सेक्स करना जैसी हरकतें करते हैं. लाश के साथ क्रूरता जैसे लाश के किसी हिस्से को खाना, टुकड़े टुकड़े कर देना, उबालना, कुत्तों को खिलाना, फ्रिज में रखना ये सब लक्षण असल में एंटी सोशल पर्सनैलिटी डिसऑर्डर के माने जाते हैं. समाज में अचानक से ऐसी क्रूरता के केस बढ़े हैं. जिस तरह से मीडिया या सोशल मीडिया प्लेटफार्म में इस तरह की खबरें ज्यादा दिख रही हैं, इससे लगता है कि समाज में क्रूरता बढ़ी है.
मानसिक रोगियों के प्रति दुर्भावना
IHBAS दिल्ली के साइक्रेटी विभागाध्यक्ष डॉ ओमप्रकाश कहते हैं कि इस तरह की घटनाओं को मानसिक रोगों से जोड़ना एकदम गलत है. ऐसे लोगों को साइकोपैथ कहना या किसी तरह के मनोरोग से ग्रसित बताना पूरे समाज और मीडिया की दुर्भावना को दर्शाता है. मेरी नजर में ये केस एक सामान्य व्यक्ति ने किया है जो कि बेहद बुद्धिमान है न कि मनोरोगी. उसने सबूत मिटाने और खुद को बचाने के लिए सारे सबूत मिटाए हैं. लोगों में लंबे समय से एक धारणा बन गई है कि क्रूरता की घटनाओं को मानसिक रोगों से जोड़ दिया जाता है, इससे मानसिक रोगियों की देखभाल पर असर पड़ता है. समाज में उनके प्रति एक गलत संदेश जाता है. लोग मानसिक रोगियों के साथ करुणा या सहानुभूति रखने के बजाय उनके प्रति भय और घृणा रखने लगते हैं.
हिंसा समाज का हिस्सा
डॉ पिलानिया कहती हैं कि आम मनुष्यों में भी हिंसा होती है. मनुष्य जानवर से इंसान बना है. आदिम सभ्यता से आधुनिक सभ्यता की ओर बढ़ते हुए उसने मानवीयता को आत्मसात किया है. दया, करुणा, क्षमा और सहअस्तित्व की धारणा अपनाई है. हमें बच्चों की परवरिश करते हुए समाज के तौर उनके कंडक्ट को नजरंदाज नहीं करना चाहिए. कई बच्चों में बचपन से ही हिंसक आचरण आम बच्चों से ज्यादा होते हैं. डॉ विधि कहती हैं कि कई बच्चे भले ही शांत स्वभाव के होते हैं, कम बोलते हैं लेकिन वो मौका पाकर हिंसक व्यवहार करते हैं. कभी किसी जानवर के साथ क्रूरता करना, घर के पालतू की टांग पकड़कर घसीटना या किसी छोटे जीव को मारना, अपने सिबलिंग के साथ क्रूरता करना, स्कूल में बुलिंग करना जैसे काम करते हैं. बचपन में जब उनके कंडक्ट को इग्नोर किया जाता है. उन्हें किसी तरह की काउंसिलिंग नहीं दी जाती तो वो बड़े होकर भी क्रूर व्यवहार करने से पहले नहीं सोचते हैं. कंडक्ट डिसऑर्डर धीरे धीरे उनकी एंटी सोशल पर्सनैलिटी बना देता है.
साइकोपैथ कहना कितना सही?
भोपाल के मनोचिकित्सक डॉ सत्यकांत त्रिवेदी कहते हैं कि किसी अपराधी को यूं ही एक घटना के आधार पर साइकोपैथ कहना सही नहीं है. इसके लिए उक्त अपराधी की साइकोलॉजिकल ऑटोप्सी होनी चाहिए. ऐसी घटनाओं में किसी एक कारण को जिम्मदार नहीं ठहराना चाहिए. इसमें बहुत सारे फैक्टर पर विचार कर सकते हैं. मसलन उक्त व्यक्ति की पर्सनैलिटी कैसी है. उसका विपरीत लिंग के प्रति क्या कॉन्सेप्ट है, वो स्त्रियों के प्रति कैसी भावना रखता है. समाज में उन्होंने आसपास देखा है कि कैसे स्त्रियों को डील किया गया.
इसके अलावा यह देखना चाहिए कि उक्त व्यक्ति नशे का आदी तो नहीं. कहीं नशे के उन्माद में इस तरह के जघन्य कृत्य को अंजाम दिया. कहीं उसे डेल्यूजनल डिसऑर्डर न रहा हो जिसमें पार्टनर के प्रति शक ने नफरत का रूप ले लिया हो. उसके बाद, ये भी देखना होगा कि कैसे अपराधिक प्रवृत्ति के लोग सोशल लर्निंग को कॉपी करते हैं. जैसे मीडिया में आफताब का केस महिमामंडित किया गया. कई बार ऐसे विषयों पर बनी वेब सीरीज देखकर भी अपराधी सीखते हैं.
डॉ सत्यकांत कहते हैं कि मैं हमेशा कहता हूं कि इन घटनाओं का जितना महिमामंडन होगा, ऐसी घटनाएं बढ़ेंगी. समाज के तौर पर हमें समझना होगा कि कैसे हिंसा नॉर्मलाइज हो रही है. वेब सीरीज भी महिलाओं के प्रति हिंसा को स्वीकार्यता ला रहे हैं. पहले के हमारे नायक और अब के नायक कौन हैं. अब क्राइम को अपनाने के लिए सहजता हो रही है. इसमें एक तरह के मिश्रित मॉडल को लेकर सोचना होगा. लेकिन इस घटना को देखते हुए इस बात से भी इनकार नहीं कर सकते कि ऐसा अपराधी कहीं न कहीं पर्सनैलिटी डिसऑर्डर से जरूर ग्रसित है, जिससे उसके भीतर की दया, सहिष्णुता, प्रेम, करुणा सब मर गई होगी. सोचकर देखिए कि कैसे कोई जिसे आई लव यू बोलता है, उसके टुकड़े टुकड़े कर सकता है. उसे पका सकता है. ये सामान्य नहीं है. ऐसे मामलों में साइकोलॉजिकल ऑटोप्सी करनी चाहिए ताकि हम समग्र रूप से समाज में आने वाली पीढ़ी को सिखा सकें कि ऐसी घटना मूवी या वेबसीरीज बनाने के लिए नहीं बल्कि एक चेतावनी है.
ये साइकोपैथ के लक्षण
एम्स के पूर्व मनोचिकित्सक डॉ राजकुमार श्रीनिवास कहते हैं कि अपने लिव इन पार्टनर के शव को क्रूरता से काटना, उसे पकाना और कुत्तों को खिलाना साइकोपैथ के ही लक्षण हैं. हेयर ने इस पर रिसर्च करके ऐसी चेक लिस्ट तैयार की है जिससे साइकोपैथ के लक्षणों का मिलान किया जा सकता है. इन लक्षणों में बताया गया है कि कैसे एक साइकोपैथ समाज में रहते हुए अलग जीवन जीता है. ये लोग पैथोलॉजिकल लॉयर होते हैं. इनमें अपराध बोध या पश्चाताप जैसे भाव नहीं होते. इनमें चालाकी बहुत ज्यादा होती है.
टॉक्सिक रिश्तों के रेड फ्लैग पहचानें
सर गंगाराम हॉस्पिटल दिल्ली के मनोचिकित्सक डॉ राजीव मेहता कहते हैं कि आप जिसके साथ पार्टनर के तौर पर रह रहे हैं, उससे मिल रहे रेड फ्लैग को समझना बहुत जरूरी है. अक्सर टॉक्सिक रिश्तों में रेड फ्लैग को लोग नजरअंदाज कर देते हैं. ये रेड फ्लैग होते हैं रिश्तों में शक, आपस में बहसबाजी, कलह और मारपीट. इन सभी फ्लैग्स को पहचानकर जितना जल्दी हो आप दूसरों की मदद से ऐसे टॉक्सिक रिश्तों से निकलें. पुलिस में भी इसकी रिपोर्ट करें. कई बार हिंसक लोग ब्रेकअप करने पर भी कोई कदम उठा सकते हैं. उनके अहंकार को चोट लगने पर वो कोई भी कदम उठाने को उतावले हो जाते हैं, इसके लिए जरूरी है कि आप एक अथॉरिटी से भी मदद मांगें.