
मई की 28 तारीख को केंद्र ने एक अधिसूचना जारी कर कहा कि गुजरात, छत्तीसगढ़, राजस्थान, हरियाणा और पंजाब के 13 जिलों में कलेक्टरों और पंजाब तथा हरियाणा के गृह सचिवों को अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के छह अल्पसंख्यक धार्मिक समुदायों में से किसी के भी अप्रवासियों को भारत की नागरिकता प्रदान करने का अधिकार दिया गया है. इससे भारत में कानूनन रह रहे कम से कम 30,000 गैर-मुस्लिम अप्रवासियों को लाभ हो सकता है.
अधिसूचना कहती है, ''नागरिकता अधिनियम, 1955 (1955 के 57) की धारा 16 के तहत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए केंद्र सरकार एतद्वारा निर्देश देती है कि धारा 5 के तहत भारत के नागरिक के रूप में पंजीकरण के लिए या नागरिकता अधिनियम 1955, की धारा 6 के तहत देश में निवास के लिए प्रमाणपत्र प्रदान करने के लिए प्रयोग की जाने वाली अपनी शक्तियां, उल्लेखित जिलों और राज्यों में रह रहे अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के अल्पसंख्यक अर्थात् हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई, समुदाय से ताल्लुक रखने वाले किसी भी व्यक्ति को नागरिकता प्रदान की जा सकती है...'' 13 जिलों में राजस्थान के जालौर, उदयपुर, पाली, बाड़मेर और सिरोही; गुजरात के मोरबी, राजकोट, पाटन और वडोदरा; छत्तीसगढ़ में दुर्ग और बलौदाबाजार; हरियाणा में फरीदाबाद; और पंजाब में जालंधर शामिल हैं.
राजनैतिक पर्यवेक्षकों ने इस अधिसूचना को विवादास्पद नागरिकता (संशोधन) कानून (सीएए), 2019 को 'पिछले दरवाजे से लागू करने' का प्रयास बताते हुए इस आधार पर आपत्ति की है कि सीएए के नियम और प्रावधान गृह मंत्रालय की ओर से अभी तैयार किए जाने बाकी हैं. 28 मई की अधिसूचना के तुरंत बाद, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के महासचिव सीताराम येचुरी ने ट्वीट किया, ''छल. सीएए-2019 के नियम अभी बने नहीं हैं फिर भी केंद्र ने इसे लागू करने के लिए गजट नोटिफिकेशन जारी कर दिया है. सीएए की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर भी अभी सुनवाई होनी है.
उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट इस पर तुरंत संज्ञान लेगा और इसे पिछले दरवाजे से लागू करने की कोशिशों को रोकेगा.'' 1 जून को, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आइयूएमएल) ने सुप्रीम कोर्ट में इस अधिसूचना को इस आधार पर चुनौती दी कि नागरिकता अधिनियम 1955, धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करता है. अधिनियम की धारा 5 (1) के अनुसार, केंद्र एक आवेदक को भारत के नागरिक के रूप में तब तक पंजीकृत कर सकता है जब तक कि वह अवैध अप्रवासी न हो. ऐसे व्यक्तियों के नागरिकता के लिए अर्हता प्राप्त करने के लिए जो श्रेणियां निर्धारित हैं, उनमें धर्म का कोई उल्लेख नहीं है. आइयूएमएल ने आगे तर्क दिया कि केंद्र दिसंबर 2019 में अदालत की ओर से पार्टी को दिए गए आश्वासन (जब आइयूएमएल ने सीएए की वैधता को चुनौती दी थी) की अनदेखी कर रहा है. अदालत ने तब कहा था कि फिलहाल सीएए पर रोक लगाना जरूरी नहीं है क्योंकि नए कानून के नियम अभी बने नहीं हैं.
गृह मंत्रालय ने अपनी प्रतिक्रिया में याद दिलाया कि नागरिकता एक केंद्रीय विषय है और मंत्रालय समय-समय पर नागरिकता कानून, 1955 की धारा 16 के तहत राज्यों को पात्र लोगों को नागरिकता प्रदान करने का अधिकार देता है. केंद्र ने आइयूएमएल की याचिका के जवाब में 14 जून को एक हलफनामा दायर किया, जिसमें उसने कहा कि अधिसूचना का सीएए से सरोकार नहीं है और केंद्र ने अपनी निहित शक्तियों के प्रयोग का अधिकार स्थानीय अधिकारियों को दिया है.
2016 में, केंद्र सरकार ने इसी तरह के एक कदम में, गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के 16 जिलों में रहने वाले अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश के इन अल्पसंख्यक समुदायों के सदस्यों से नागरिकता के लिए आवेदन मांगे थे. 2018 में, अधिसूचना को अनिश्चित काल तक के लिए बढ़ा दिया गया था. अब नवीनतम अधिसूचना नौ राज्यों के कुल 29 जिलों को कवर करती है.
गृह मंत्रालय का कहना है कि नवीनतम अधिसूचना से केवल कानूनी आप्रवासियों को ही फायदा होगा जो भारत में सात साल के प्रवास के बाद नागरिकता के लिए पहले ही आवेदन कर चुके हैं. दूसरी ओर सीएए, 31 दिसंबर, 2014 को या उससे पहले भारत में प्रवेश करने वाले लोगों को पांच साल के प्रवास के बाद ऐसे आवेदनों की अनुमति देगा, लेकिन विवादास्पद रूप से, केवल छह नामित धार्मिक समुदाय ही इसके तहत आवेदन करने के पात्र होंगे.
सुप्रीम कोर्ट ने 15 जून को कहा कि वह केंद्र की 28 मई की अधिसूचना को चुनौती देने वाली याचिका पर दो सप्ताह बाद सुनवाई करेगा.