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कान्हा में नया माओवादी ठिकाना

सुरक्षा अधिकारियों का कहना है कि माओवादियों के खिलाफ उनके सफल अभियान ने माओवादियों को कान्हा में पीछे धकेलने के लिए मजबूर किया है

वन्यजीवों का स्वर्ग देश के सबसे पुराने संरक्षित वनों में शामिल कान्हा में 100 बाघ हैं वन्यजीवों का स्वर्ग देश के सबसे पुराने संरक्षित वनों में शामिल कान्हा में 100 बाघ हैं
राहुल नरोन्हा
  • नई दिल्ली,
  • 17 मई 2022,
  • अपडेटेड 4:55 PM IST

लगभग 2,162 वर्ग किमी का घना और हरा-भरा मध्य भारतीय जंगल किसका घर है...बाघों, बायसन, भालू, खूंखार जंगली कुत्तों के झुंड और...मोगली का? नहीं, किपलिंग को 2022 के मुताबिक अपडेट होने की जरूरत है. सही जवाब है माओवादी. भारत के सबसे पुराने संरक्षित वनों में शामिल कान्हा बाघ रिजर्व एक अप्रत्याशित घटनाक्रम का गवाह बन रहा है. इस रिजर्व में फिलहाल 100 से अधिक बाघ हैं और यह भारत के सबसे लोकप्रिय वन्यजीव अभयारण्यों में से एक है. लेकिन, बाघों को उनके प्राकृतिक आवास में देखने के इच्छुक पर्यटकों को अब कुछ और भी नजर आ सकता है. आसपास के इलाकों के माओवादी छापेमार रिजर्व में शरण लेने की कोशिश कर रहे हैं, जिसे लुप्तप्राय बाघों का सुरक्षित पनाहगाह माना जाता था.

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मध्य प्रदेश के बालाघाट और मंडला जिलों में फैले कान्हा के 917 वर्ग किलोमीटर के आंतरिक क्षेत्र में माओवादियों को लगातार देखे जाने की घटनाओं ने सुरक्षा प्रतिष्ठानों के साथ-साथ वन्यजीव संरक्षण से जुड़े लोगों के लिए खतरे की घंटी बजा दी है. माओवादियों के हाथों की गई कई लोगों की हत्या के बाद गश्ती दल ने अभयारण्य के कई हिस्सों में जाने से मना कर दिया. राज्य वन विभाग ने इस मसले को लेकर पुलिस को आगाह किया था. सबसे हालिया मामला वन चौकीदार सुखदेव की हत्या का है. उसे पुलिस का मुखबिर बताकर निशाना बनाया गया था. 23 मार्च को बालाघाट की मुक्की में एक टूरिस्ट लॉज के ठीक बाहर उसका शव मिला.

उस हत्या की वजह से केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने 26 मार्च को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को पत्र लिखकर कान्हा में सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाने के लिए कहा. मुख्य वन्यजीव संरक्षक और राज्य के डीजीपी के बीच बैठकें हुईं और बाघ रिजर्व में सुरक्षाबलों को ले जाने पर व्यापक सहमति बनी. खराब पहलू यह है कि इससे पर्यटन और संरक्षण के कार्यों को भी झटका लगेगा.

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सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं ने राज्य सरकार के राजस्व के एक बड़े स्रोत को खतरे में डाल दिया है—पर्यटकों के प्रवेश शुल्क के जरिए सालाना 8 करोड़ रुपए मिलते हैं और कान्हा के आसपास के होटलों तथा बारों की ओर से भुगतान किए जाने वाले अप्रत्यक्ष करों के जरिए और भी कहीं ज्यादा राजस्व. कान्हा को 1930 में सैंक्चुएरी घोषित किया गया और प्रोजेक्ट टाइगर के ऐलान के बाद इसे 1973 में तुरंत बाघ रिजर्व में तब्दील कर दिया गया था. सालाना करीब 1,70,000 भारतीय और 15,000 विदेशी पर्यटक कान्हा आते हैं. इससे यह इलाके के लोगों के रोजगार का बड़ा स्रोत है. रिजर्व में करीब 85 वन्यजीव लॉज, 175 गाइड और 257 ड्राइवर हैं, और उनके जरिए सालाना 1,00,000 कार्यदिवस बनाए जाते हैं. वन कर्मचारियों के रिजर्व में गश्त करने से डरने से वन्यजीव भी खतरे में पड़ सकते हैं. वन्यजीव गणना, 2020 के चौथे चरण के बाद पता चला कि कान्हा में 118 बाघ और 146 तेंदुए और 30,000 चित्तीदार हिरण के साथ-साथ 957 बारहसिंगे भी हैं.

कान्हा में माओवादियों की मौजूदगी का यह भी मतलब है कि उन्होंने अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों का विस्तार किया है. हालांकि उन्हें केवल हाल के दिनों में ही रिजर्व के अंदर देखा गया है, पर बालाघाट जिले के आसपास तीन दशकों से माओवादी मौजूद हैं. पड़ोस के मंडला और डिंडोरी जिलों को भी 'एलडब्ल्यूई (वामपंथी चरमपंथी) प्रभावित' क्षेत्र के रूप में चिन्हित किया गया है. वन चौकीदार की हत्या का मामला सामने आने से पहले तक माओवादियों ने खुद को लोगों की नजरों से दूर ही रखा और संघर्ष से बचते रहे हैं. यह नवंबर, 2021 के बाद से उनके हाथों तीसरी स्थानीय हत्या थी. एक साल पहले मध्य प्रदेश सरकार की माओवाद विरोधी इकाई—हॉक फोर्स—ने एक महिला माओवादी शारदा को मार गिराया था.

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पुलिस सूत्रों का दावा है कि उसी के प्रतिशोध में 14 नवंबर को बालाघाट निवासी जगदीश और संतोष की हत्या कर दी गई. एक दिन बाद, माओवादियों के महाराष्ट्र-मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़ (एमएमसी) क्षेत्र का नेतृत्व करने वाले मिलिंद तेलतुंबड़े को 26 अन्य लोगों के साथ महाराष्ट्र पुलिस की सी-60 कमांडो इकाई ने कान्हा से थोड़ी ही दूर पर मार गिराया था. मध्य प्रदेश में पिछले ढाई साल में छह से 12 लाख रुपए के इनामी सात माओवादी मारे जा चुके हैं. पिछले एक साल में, राज्य में माओवादियों और सुरक्षा बलों के बीच 15 से अधिक बार गोलीबारी हुई है.

सुरक्षा अधिकारियों का कहना है कि माओवादियों के खिलाफ उनकी कामयाबी ने माओवादी छापामारों को कान्हा में जाने को मजबूर कर दिया है. एक पुलिस अफसर बताते हैं, ''मुठभेड़ तब हुई जब माओवादियों ने भोजन और अन्य आपूर्ति के लिए रिजर्व की परिधि में स्थित गांवों का दौरा किया. ऐसे में उन्होंने अब उन गांवों से बचने का फैसला किया है और जंगल के काफी भीतर स्थित कैंपों में कर्मचारियों को धमकाकर अपने भोजन का बंदोबस्त कर रहे हैं. रिजर्व के भीतर कोई गांव नहीं होने से माओवादियों को शायद ही कोई नोटिस करेगा, जब तक कि वे वन विभाग की गश्त में न पकड़े जाएं, जिसकी संभावना इन दिनों कम होती जा रही है.

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कान्हा में छापामार एमएमसी जोन से हैं. इस जोन को प्रतिबंधित भाकपा (माओवादी) ने बस्तर में दबाव कम करने के लिए बनाया था, जहां सुरक्षा बल उनका सफाया करते जा रहे हैं. इसके रैंकों में कुछ ही स्थानीय लोग हैं, अधिकतर लड़ाकू छत्तीसगढ़ से हैं और माना जाता है कि इसकी अगुआई आंध्र प्रदेश का एक कमांडर कर रहा है. सारा ध्यान उन पर लगाना आसान नहीं होगा. मसलन, हॉक फोर्स में सिर्फ 800 जवान हैं, जो पहले ही बालाघाट और मंडला के शिविरों में तैनात हैं. वन्यजीवन संरक्षण अधिनियम, 1972 रिजर्व के भीतर स्थायी निर्माण की अनुमति नहीं देता है, जब तक कि सुप्रीम कोर्ट की अधिकार प्राप्त समिति इसकी मंजूरी नहीं देती. वहीं, पुलिस अधिकारियों का कहना है कि उन्हें सभी मौसम में कारगर सड़कों की जरूरत है.

किसी भी लापरवाही के खिलाफ आगाह करते हुए हॉक फोर्स के एक जवान ने कहा, ''किसी क्षेत्र में ऑपरेशन शुरू करने से पहले माओवादी वहां खुद को मजबूत करते हैं. अपेक्षाकृत शांति हमें भरोसा दिला सकती है कि वे कान्हा में कोई बड़ी योजना नहीं बना रहे पर ऐसा मानना सही नहीं होगा.'' उन्होंने कहा कि इससे पहले कि हालात हाथ से निकल जाएं कार्रवाई का वक्त आ गया है.

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