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शख्सियतः कविता की स्पर्श कथा

इस अनोखी पुस्तक में कुल 78 कवियों की 156 रचनाओं को संकलित किया गया था. शुरुआत में ख्वाबों का कारवां  की 500 प्रतियां छपी थीं, जिन्हें इच्छुक दृष्टिबाधित दिव्यांगों के बीच मुफ्त में बांटा गया.

लखनऊ और मुंबई में दो जगह ब्रेल लिपि की पुस्तकों की लाइब्रेरी भी बनाई है रोहित ने लखनऊ और मुंबई में दो जगह ब्रेल लिपि की पुस्तकों की लाइब्रेरी भी बनाई है रोहित ने
आशीष मिश्र
  • नई दिल्ली,
  • 09 दिसंबर 2019,
  • अपडेटेड 6:55 PM IST

सितंबर, 2007 में रोहित कुमार 'मीत' एसी सुपरफास्ट एक्सप्रेस ट्रेन से दिल्ली से लखनऊ लौट रहे थे. ट्रेन में पढऩे के लिए रोहित ने सुप्रसिद्ध कवि दिवंगत गोपाल दास नीरज का कविता संग्रह कारवां गुजर गया और चर्चित शायर बेकल उत्साही का संग्रह लफ्जों की घटाएं साथ ले रखे थे. एक वे पढ़ रहे थे और दूसरा बगल में था. ट्रेन में रोहित के सामने की बर्थ पर दस साल की एक बच्ची अपने नेत्रहीन पिता के साथ सफर कर रही थी. उसने रोहित से किताबें मांगीं और पिता को पढ़कर सुनाने लगी. एक छोटी-सी बच्ची, नेत्रहीन पिता को जिस भाव से कविताएं पढ़कर सुना रही थी उसे देखकर रोहित भावुक हो गए. उन्होंने उसी वक्त मन में यह संकल्प किया कि वे साहित्यिक पुस्तकें बे्रल लिपि में प्रकाशित करेंगे जिससे नेत्रहीन दिव्यांग भी उन्हें आसानी से पढ़कर उनका रसास्वादन कर सकें.

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नेत्रहीनों के लिए पाठ्यक्रम की पुस्तकें तो ब्रेल लिपि में मिल जाती हैं लेकिन साहित्यिक किताबों की वैसी उपलब्धता नहीं है. दूसरे, गजलों को सुनने से इतर पढ़ने का आनंद बिल्कुल अलग किस्म का होता है. और दृष्टिबाधित लोग इससे मरहूम हैं. रोहित ने इसके बाद दो साल तक देश के करीब सभी बड़े प्रकाशकों से ब्रेल लिपि में साहित्यिक पुस्तकें छापने के लिए संपर्क किया. लेकिन चूंकि इस योजना में पैसे का कोई मुनाफा नहीं दिख रहा था इसलिए कोई भी प्रकाशक ब्रेल लिपि में साहित्य की पुस्तकें छापने को तैयार न हुआ.

थक-हारकर खुद रोहित ने ही अपनी मां और दोस्तों से उधार लेकर पांच लाख रुपयों का इंतजाम किया और 2009 में वॉयस पब्लिकेशन के नाम से लखनऊ में खुद का प्रकाशन केंद्र खोला. इसी प्रकाशन के बैनर तले ख्वाबों का कारवां नाम से एक संकलन हिंदुस्तानी जबान में ब्रेल लिपि में प्रकाशित हुआ. इस अनोखी पुस्तक में कुल 78 कवियों की 156 रचनाओं को संकलित किया गया था. शुरुआत में ख्वाबों का कारवां  की 500 प्रतियां छपी थीं, जिन्हें इच्छुक दृष्टिबाधित दिव्यांगों के बीच मुफ्त में बांटा गया. किताब की मांग बढ़ी और फौरन इसकी 500 प्रतियां और छापनी पड़ीं.

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उत्तर प्रदेश के सिद्घार्थनगर जिले के बढ़नी में रहने वाले रोहित कुमार मीत का शुरुआती जीवन बड़े अभावों में कटा था. पिता मुरारीलाल श्रीवास्तव मेरठ की मवाना शुगर मिल में क्लर्क थे. 1993 में रोहित अभी 10 साल के ही थे कि पिता का साया सिर से उठ गया. मां ने रोहित के चार भाई-बहनों का पालन-पोषण किया. रोहित को बचपन से ही शेरो-शायरी लिखने का शौक था. यह संयोग ही था कि मकबूल शायर बेकल उत्साही की बेटी का ब्याह बढऩी में हुआ था और वे बेटी से मिलने अक्सर बढऩी आते रहते थे. 1997 में उनके ऐसे ही एक आगमन के दौरान रोहित की उनसे मुलाकात हुई. तब रोहित हाइस्कूल में पढ़ रहे थे. बेकल ने रोहित को अपना शागिर्द बना लिया.

इन्हीं के कहने पर रोहित ने अपने नाम के आगे 'मीत' शब्द जोड़ा. बेकल की सरपस्ती में रोहित ने उर्दू जुबान पर अपनी पकड़ मजबूत करनी शुरू की. सिद्घार्थनगर से इंटरमीडियट की परीक्षा पास करने के बाद रोहित लखनऊ आ गए. 2005 में लखनऊ के कान्यकुब्ज कॉलेज से राजनीति शास्त्र में एमए करने के दौरान रोहित मुशायरों में शिरकत करने लगे. 2009 में वॉयस पब्लिकेशन स्थापित करने के बाद उन्होंने दृष्टिबाधित दिव्यांगों को ब्रेल लिपि में साहित्यिक किताबें मुफ्त में मुहैया कराने को जीवन का लक्ष्य बना लिया. उनके इस उपक्रम में उन्हें लखनऊ के मोहानरोड स्थित स्पर्श राजकीय दृष्टिबाधित इंटर कालेज में पढऩे वाले कुछ शिक्षकों और छात्रों का साथ मिला जिन्होंने गजलों और साहित्यिक पुस्तकों का ब्रेल लिपि में अनुवाद किया.

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दृष्टिïबाधित दिव्यांगों को मुफ्त में ब्रेल लिपि में लिखी शायरी की पुस्तकें बांटने के लिए रोहित ने 'मीत वेलफेयर फाउंडेशन' के नाम से एक संस्था बनाई. ख्वाबों का कारवां  के बाद अशोक चक्रधर की जरा मुस्कुरा तो दें, बशीर बद्र की घर छोड़कर मत जाओ, नीरज की लिखे जो खत तुझे, बेकल की सादगी शृंगार हो गई  किताबों का वॉयस पब्लेशन के बैनर तले ब्रेल लिपि में प्रकाशन हुआ. इन पुस्तकों का संपादन और संकलन रोहित ने किया. आज रोहित देश भर में चल रहे सभी दिव्यांग कालेजों या संस्थाओं में सबसे ज्यादा जाना-पहचाना नाम हैं. देश के ऐसे हर कॉलेज में रोहित के संकलन और संपादन वाली ब्रेल लिपि की पुस्तकें पहुंच चुकी हैं. लोगों को ये इस कदर भायीं कि रोहित के पास ऐसी ही लिपि में हास्य कलाकारों की रचनाएं छापने की मांग पहुंचने लगी. इसी को ध्यान में रखते हुए रोहित ने हास्य कविताओं का एक पूरा संकलन एक से बढ़कर एक नाम से प्रकाशित किया.

रोहित अब तक देश के सभी दिव्यांग छात्रों के कॉलेजों में पढ़ रहे दृष्टिबाधित विद्यार्थियों के बीच 5,000 से ज्यादा किताबें बांट चुके हैं. वे बताते हैं, ''ये किताबें उन्हीं दृष्टिबाधित दिव्यांगों के बीच बांटी जाती हैं जो उन्हें पढऩे की इच्छा जताते हैं.'' रोहित के इस योगदान के लिए 'उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान' ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ प्रकाशक के पुरस्कार से भी सम्मानित किया है. उन्होंने लखनऊ के चिडिय़ाघर और मुंबई के रिजवी कॉलेज में ब्रेल लिपि वाली पुस्तकों की एक लाइब्रेरी भी स्थापित की है, जहां दृष्टिबाधित लोग मुफ्त में ये किताबें पढ़ सकते हैं.

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लखनऊ चिडिय़ाघर के प्रकृति प्रशिक्षण केंद्र में शुरू हुई इस अनोखी लाइब्रेरी में नंदन, चंपक, चंदामामा जैसी पत्रिकाओं से लेकर ख्वाबों का कारवां, घर छोड़कर मत जाओ जैसी पुस्तकें ब्रेल लिपि में मौजूद हैं. रोहित ने लखनऊ के चिडिय़ाघर में जानवरों के बाड़े के बाहर लगे जानकारियों के बोर्ड पर ब्रेल लिपि में भी सूचनाएं लिखने में अपना योगदान दिया है. नेत्रहीन दिव्यांग अब बे्रल बोर्ड पर अपने हाथ के स्पर्श मात्र से बाड़े में मौजूद जानवरों की पूरी जानकारी पा सकेंगे. नेत्रहीन दिव्यांगों को ऐसी सुविधा देने वाला लखनऊ देश का पहला चिडिय़ाघर बन गया है. —

रोहित कुमार को चर्चित शायर बेकल उत्साही ने अपना शागिर्द बनाया और उन्हें 'मीत' तखल्लुस जोडऩे को कहा.

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