विशेषांकः मेरे पास सिर्फ 30 रु. ही बचे थे...

...मगर मुझे मालूम था कि घर से मदद का मतलब उद्यम के सपने का मर जाना होता’’

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रितेश अग्रवाल रितेश अग्रवाल

अनिलेश एस. महाजन

  • नई दिल्ली,
  • 06 जनवरी 2021,
  • अपडेटेड 9:13 PM IST

जिंदगी का निर्णायक पल

रितेश अग्रवाल, 27 वर्ष
संस्थापक और सीईओ, ओयो रूम्स


10 अरब डॉलर का अनुमानित कारोबार, दुनिया के 80 देशों में फैले 43,000 होटलों और 1,50,000 वैकेशन होम्स का नेटवर्क तैयार किया

साल 2012 की एक सर्द कंपकंपाती शाम रितेश अग्रवाल दिल्ली के मध्ममवर्गीय मोहल्ले मस्जिद मोठ के स्थानीय बाजार में बैठे हुए थे—जेब खाली थी और सोच रहे थे कि अब क्या करें. ओडिशा के रायगढ़ का यह 19 साल का लड़का कॉलेज की पढ़ाई के लिए दिल्ली आया था, लेकिन सब गड़बड़ हो गया. अग्रवाल कहते हैं, ''मेरे बैंक खाते में 30 रु. ही बचे थे और मैंने मन बना लिया था कि पब्लिक फोन बूथ पर जाऊं, पापा-मम्मी को फोन करूं और मदद मांगूं.’’

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देश में वे दिन आंत्रप्रेन्योरशिप के लिए गहमागहमी से भरे थे. आइआइटी और आइआइएम सरीखे प्रमुख संस्थानों से निकले ग्रेजुएट नौजवान नौकरियां छोड़कर कारोबारों की अनोखी संभावनाओं वाले स्टार्ट-अप लॉन्च कर रहे थे. अग्रवाल ने जिस स्टार्ट-अप में हाथ डाला था—किफायती होटल बुकिंग वेबसाइट ओरवेल स्टेज कुछ खास किए बिना ही बैठ चुका था. इसकी वजह से वे अपनी पढ़ाई से भी दूर हो गए, सो अलग, जिससे उनके माता-पिता खासे नाराज थे.

अग्रवाल जानते थे कि घर पर फोन करने का मतलब यह भी हो सकता था कि उनसे वापस आ जाने को कहा जाता और इसके साथ ही उनके उद्यमी बनने के सपने का अंत हो जाता. वह सपना जो वे 13 साल की उम्र से ही संजोए हुए थे और मोबाइल सिम कार्ड बेचकर भी उसके लिए पैसे जुटा रहे थे. यह मुश्किल विकल्प था. अग्रवाल ने आखिरकार अपने घर फोन किया, लेकिन अपनी माली हालत की भनक नहीं लगने दी.

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उन्होंने खुद को एक और मौका देना तय किया. वे कहते हैं, ''मेरे मम्मी-पापा मेरी आर्थिक बदहाली से अब भी अनजान थे (2012 में). आज पीछे मुड़कर देखने पर मुझे अपने कुछ फैसले बावले दिखाई देते हैं. लेकिन मैं बेहद खुशकिस्मत हूं कि मेरे ज्यादातर कदम मुझे सही जगहों और सही लोगों तक ले गए.’’

उनके 'सही लोगों’ का मतलब है टेक्नोलॉजी आंत्रप्रेन्योर और वेंचर कैपिटलिस्ट पीटर थिएल से वास्ता. अग्रवाल बताते हैं, ''घर पर उस फोन कॉल के कुछ हफ्तों बाद ही मुझे एक ई-मेल मिला जिसने मेरी थिएल फेलोशिप पक्की कर दी. अलब‌त्ता इसकी एक शर्त यह थी कि मुझे कॉलेज छोड़ना होगा—यह तो मेरे लिए बिन मांगी मुराद पूरी होने जैसा था!’’

थिएल ने यह फेलोशिप 2011 में शुरू की थी और इसमें आंत्रप्रेन्योर बनने के आकांक्षियों को 'कारोबार की नई संभावनाओं के निर्माण’ के लिए दो साल के दौरान 1,00,000 डॉलर (करीब 74 लाख रुपए) दिए जाते हैं. अग्रवाल कहते हैं, ''यह स्टार्ट-अप को बढ़ाने के लिए बुनियादी तौर पर जरूरी दूसरे संसाधन भी देती है.’’

ओरवेल की दुर्गति से सीख लेते हुए अग्रवाल ने 2013 में हॉस्पिटैलिटी बिजनेस ऐप ओयो रूम्स लॉन्च किया. इसका नेटवर्क 80 देशों के 80 शहरों में अपनी मौजूदगी का दावा करता है, जिसके पास 43,000 होटलों और 1,50,000 वैकेशन होम्स में दस लाख से ज्यादा कमरे हैं. पिछली बार इसका मूल्य 10 अरब डॉलर (करीब 73,630 करोड़ रुपए) आंका गया था.

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अग्रवाल कहते हैं कि थिएल, फेसबुक और नैपस्टर के सह-संस्थापक सीन पार्कर, और कारोबारी धन्नाशाह एलन मस्क सरीखे लोगों से मार्गदर्शन हासिल करना मेरे जैसे नौसिखिए इनोवेटर के लिए शानदार तजुर्बा था. वे बताते हैं, ''इसने अपने वेंचर को न केवल भारत बल्कि दुनिया भर में सबसे बड़ा बनाने की अकूत संभावना की तरफ मेरी आंखें खोल दी.’’

ओयो रूम्स की लाजवाब कामयाबी की बदौलत अग्रवाल ने कई सारे अवार्ड और खिताब हासिल किए, जिनमें बिजनेस वर्ल्ड यंग आंत्रप्रेन्योर अवार्ड भी शामिल है. 2016 में वे फोर्ब्स की सालाना ग्लोबल एचीवर्स की '30 अंडर 30’ फेहरिस्त में आए. 2020 में हुरुन ग्लोबल रिच लिस्ट में उन्हें दुनिया का दूसरा सबसे नौजवान स्वनिर्मित अरबपति घोषित किया गया.

''बहुत दिनों तक मेरी मां को ओयो रूम्स के कामयाब होने का भरोसा नहीं था. आखिर उन्होंने एक दिन प्रधानमंत्री के रेडियो प्रसारण में सुना तो उन्हें भरोसा आया. इस दौरान वे कहती रहीं कि मैं पढ़ाई पूरी करूं और कोई अच्छी नौकरी तलाश करूं’’

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