
बीते दिसंबर की 15 तारीख को कोलकाता इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल (केआइएफएफ) के 28वें संस्करण के उद्घाटन समारोह में आए हजारों दर्शक हैरान रह गए. मंच पर गीत-नृत्य की प्रस्तुति चल रही थी, जिसकी परिकल्पना पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने की थी. तभी पृष्ठभूमि में लगे विशाल परदे पर भगवान गणेश की तस्वीर चमकी और उसके साथ अमिताभ बच्चन की जानी-पहचानी असरदार आवाज में श्लोक—वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि संप्रभ—गाया जा रहा था.
केआइएफएफ के उद्घाटन समारोहों में पहले भी आ चुके कई लोगों के लिए हिंदू देवता का जयगान पहली बार हुआ था. यह उस आयोजन में कुछ अटपटा मालूम देता था जहां पिअर पाओलो पासोलिनी और मिखाएल काकोरयानिस सरीखी दुनिया भर में प्रतिष्ठित फिल्म शख्सियतों की फिल्मों के सिंहावलोकन दिखाए जाने वाले थे. मगर फिर यह राजनैतिक संदेश में उस बदलाव का एक और संकेत था जिस पर सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) राज्य में लगातार ज्यादा से ज्यादा और आक्रामक ढंग से जोर दे रही है.
टीएमसी मुख्य विपक्षी दल भाजपा का 'मुस्लिम तुष्टीकरण’ का आरोप लगातार झेलती रही है. फिर 2019 के लोकसभा चुनाव की हार और कुराज तथा भ्रष्टाचार के आरोपों का डर भी था. उसके दो दिग्गज नेता पार्था चटर्जी और अनुब्रत मंडल घोटालों में कथित मिलीभगत के आरोपों में सीखचों के पीछे हैं. नकारात्मक जनधारणा का जवाब देने के लिए टीएमसी को हिंदुत्व के अपने ब्रांड की शरण लेनी पड़ी.
ममता के चंडी श्लोक का जाप करने और खुद को ''कट्टर ब्राह्मण’’ पृष्ठभूमि का बताने से लेकर बंगाल में जगन्नाथ और वैष्णो देवी मंदिरों की प्रतिकृतियां बनाने और हुगली के किनारे वाराणसी की गंगा आरती के आयोजन के फैसलों तक तृणमूल हिंदुओं को रिझाने की अपनी बेताब कोशिश में कोई कसर नहीं छोड़ रही है. सबसे नजदीकी लक्ष्य जल्द होने वाले पंचायत चुनाव हैं, पर 2024 के लोकसभा चुनाव भी सिर पर आ ही गए हैं.
पार्टी मौजूदा पड़ाव तक खरामा-खरामा पहुंची. 2011 में धूमधाम से सत्ता में आने के बाद टीएमसी ने राज्य के मुसलमानों को भरोसेमंद वोट बैंक के तौर पर पहचाना, जो 2011 की जनगणना के मुताबिक, पश्चिम बंगाल की आबादी के 27 फीसद हैं. 2012 में इमामों और मुअज्जिनों के लिए मासिक भत्ते के ममता के ऐलान का भाजपा ने जोरदार विरोध किया, तो उसे सिरे से खारिज कर दिया गया.
पूरे दशक के दौरान, जब भाजपा अपने बलशाली हिंदुत्व के दम पर बंगाल में ताकत जुटा रही थी और मिसाल के तौर पर धूमधाम से रामनवमी के जुलूस निकाल रही थी, टीएमसी ने इसका मुकाबला करने के लिए बंगाल की महान उदार, पंथनिरपेक्ष और सुधारवादी परंपरा को गले लगाना सबसे बेहतर समझा. भाजपा के ब्रांड की राजनीति की आलोचना करके उसने 'हिंदू विरोधी’ होने 'अल्पसंख्यकों का तुष्टीकरण’ करने के आरोपों को न्यौता. 2019 के संसदीय चुनाव नतीजों ने खतरे की घंटी का काम किया जब भाजपा ने पश्चिम बंगाल की 42 में से 18 सीटें जीत लीं और राज्य की सबसे प्रमुख विपक्षी पार्टी बन गई.
सीएसडीएस लोकनीति के चुनाव बाद सर्वे से पता चला कि टीएमसी को हिंदुओं के महज 32 फीसद वोट मिले, जबकि 57 फीसद भाजपा के खाते में गए. टीएमसी के नेताओं का कथित भ्रष्टाचार और 2018 के पंचायत चुनाव के दौरान चौतरफा हिंसा के आरोपों ने भी निश्चित योगदान दिया, पर साफ था कि धार्मिक ध्रुवीकरण की भाजपा की चाल कारगर रही थी. तभी से बीच राह सुधार की कोशिश शुरू हुई. 2019 में हिंदू पुरोहितों को मासिक भत्ता देने का वादा किया और 2021 के विधानसभा चुनाव से पहले पूरा भी कर दिया. उसी साल पहली बार मुसलमानों से यह अपील भी की गई कि ''दूसरों की भावनाओं’’ का ख्याल रखते हुए खुलेआम गायों का वध न करें.
यह बदलाव कारगर होता भी दिखाई दिया. 2021 के विधानसभा चुनाव में टीएमसी के हिंदू वोटों में सात फीसद अंकों का इजाफा हुआ और भाजपा के हिंदू वोटों में इतनी ही गिरावट आई. अब जब भाजपा के नेता विपक्ष सुवेंदु अधिकारी ममता के खिलाफ कथित अल्पसंख्यक तुष्टीकरण का तंज कसने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं, टीएमसी अपनी हिंदू साख को जान-बूझकर बढ़ा-चढ़ाकर जता रही है. और देखिए इस नई नीति से वे किस तरह चिपके हैं!
जुलाई 2022 में इंडिया टुडे कॉन्क्लेव ईस्ट में जब टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने मां काली के ''मासांहारी और मदिरा स्वीकार करने वाली देवी’’ होने के अपने निजी विश्वास को लेकर एक सरसरी-सी बात कही, तो उक्वमीद के मुताबिक भाजपा ने उस पर आतिशी तूफान बरपा दिया. लेकिन टीएमसी ने खुद को मोइत्रा के विचारों से अलग करने में जरा देर नहीं की. एक बयान में उसने कहा, ''महुआ मोइत्रा की कही बात का पार्टी किसी भी रूप से अनुमोदन नहीं करती.’’
2024 के आम चुनाव ज्यों-ज्यों नजदीक आ रहे हैं, भाजपा ने खेल को और ऊंचा उठा दिया है. उसके समर्थक मुख्यमंत्री को चिढ़ाने के लिए हर मौके पर 'जय श्री राम’ के नारे लगा रहे हैं. 30 दिसंबर को वंदे भारत एक्सप्रेस के उद्घाटन के समय उन्होंने यही किया. इसके अलावा भाजपा के राज्य अध्यक्ष सुकांत मजूमदार और अधिकारी विरोध रैलियां आयोजित कर रहे हैं.
भाजपा का मनसूबा राज्य भर में रथ निकालने का भी है. टीएमसी हालांकि खुद को भगवा पार्टी के कथित आक्रामक हिंदुत्व से दूर दिखाने के लिए पूरी ताकत झोंक रही है, फिर भी वह इस होड़ में पड़ ही जाती है. बयानों और प्रतीकात्मक हाव-भावों के साथ इरादों का भी प्रदर्शन किया जाता है. इसकी अगुआई खुद मुख्यमंत्री करती हैं. अभी मंदिर और अनुष्ठान अग्रमोर्चे पर हैं.
मंदिरों की महा दौड़
पश्चिम बंगाल की सरकार ने नए क्षेत्र के तौर पर 2020 से नए मंदिरों का निर्माण करना और धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देना शुरू किया. उस साल उसने दक्षिणेश्वर रेलवे स्टेशन को प्रसिद्ध काली मंदिर परिसर से जोड़ने वाला रानी राशमोनी स्काइवॉक बनाने के लिए 65 करोड़ रुपए आवंटित किए. इसी तरह बीरभूम के तारापीठ काली मंदिर और हुगली के ताड़केश्वर शिव मंदिर तथा हंसवेश्वरी मंदिर के जीर्णाद्धार का ऐलान किया. 2022 में ममता ने कोलकाता के कालीघाट मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए बजट में 300 करोड़ रुपए रखे.
ममता ने 2019-20 में समुद्रतट पर बसे दीघा में 10 एकड़ जमीन पर जगन्नाथ मंदिर के निर्माण का फैसला लिया और 2022-23 के बजट में इसके लिए 500 करोड़ रुपए अलग रखे. यह फैसला मुख्य विपक्षी दल के तौर पर भाजपा के उभार के फौरन बाद लिया गया, पर इसके पीछे एक और दिलचस्प कहानी है.
2017 में पुरी के जगन्नाथ मंदिर की यात्रा के दौरान ममता का सामना नाराज पुरोहितों से हुआ, जिन्होंने उन पर गौमांस के भक्षण का समर्थन करने का आरोप लगाया. कहा जाता है कि नाराज ममता ने बंगाल का अपना जगन्नाथ मंदिर बनाने की गांठ बांध ली. दीघा में जमीन का इंतजाम बुनियादी ढांचे का विकास करने वाली नोडल एजेंसी दीघा-शंकरपुर विकास प्राधिकरण (डीएसडीए) ने किया. मंदिर के चारों तरफ आर्थिक पुनरोद्धार की योजना बनाई गई और लाख-लाख रुपए में दुकानें और स्टॉल बेचे जा रहे हैं.
एक और प्रतिकृति वैष्णो देवी मंदिर की बनाई जा रही है, जिसका निर्माण पूरा हो चुका है. यह कोलकाता के बेहाला में एक एकड़ जमीन पर बना है. इस पूरे इलाके में अब उन देवी-देवताओं के आठ मंदिर हैं, जिनके राजस्थान और उत्तर प्रदेश में जाने-माने समर्पित मंदिर हैं, चाहे वह जीन माता हों, या रानी सती, देवी सिताला, भैरोंनाथ, खाटू श्याम जी या राधा-कृष्ण. टीएमसी के काउंसिल-मेयर तारक सिंह दानदाताओं को लाकर धन जुटा रहे हैं. उत्तर प्रदेश के रहने वाले सिंह को हुगली नदी के कई घाटों पर वाराणसी की प्रसिद्ध गंगा आरती का पुनर्सृजन करने की जिम्मेदारी भी सौंपी गई है. ममता मार्च 2022 में वाराणसी के दशाश्वमेध घाट गई थीं और वहां के अनुभव ने उनके भीतर वैसी ही आरती करवाने की इच्छा जगाई.
इस साल भी टीएमसी सरकार गंगासागर तीर्थस्थल, सागर द्वीप, बंगाल की खाड़ी पर पांच नए मंदिर बना रही है. मंदिरों के निर्माण के लिए 4,000 वर्ग फुट का इलाका तय करके इसे 'बंगाल के मंदिर: एक आध्यात्मिक यात्रा’ नाम दिया गया है. यह इलाका कालीघाट, तारापीठ, माल्दा की जहुरा काली, दक्षिणेश्वर और ताड़केश्वर से मिलता-जुलता होगा. टीएमसी और जिला प्रशासन ने लागत के बारे में मुंह सिल रखे हैं, पर एक करोड़ से ज्यादा तो आसानी से खर्च हो रहा है.
सरकार ने 65 लाख रुपए खर्च करके कपिल मुनि मंदिर के पुरोहितों के लिए कमरों का निर्माण भी करवाया है. ममता सारे खर्च को यह कहकर सही ठहराती हैं, ''केंद्र हमें कुछ नहीं देता, यहां तक कि टॉफी के लिए 10 पैसे तक नहीं देता.’’ वे यह भी कहती हैं कि इसके विपरीत कुंभ मेला सेंट्रल फंड से पटा पड़ा है. इस साल गंगासागर मेले में उन्होंने अपने और भाजपा के हिंदू फैलाव में फर्क दिखाने की पुरजोर कोशिश की. उन्होंने कहा, ''हम उस हिंदू धर्म में विश्वास करते हैं कि जिसका रास्ता रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद ने दिखाया था.’’
भाजपा सांसद और पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष दिलीप घोष कहते हैं, ''मंदिरों का निर्माण करना राजनैतिक दलों का काम नहीं है. राम मंदिर का निर्माण लोग करवा रहे हैं जिसमें प्रधानमंत्री आमंत्रित अतिथि थे. हिंदू समाज तृणमूल से नाराज है, इसलिए वे हमारी नकल कर रहे हैं. सीपीआइ (एम) के राज्य सचिव मोहम्मद सलीम कहते हैं, ''तृणमूल और भाजपा एक दूसरे की पूरक हैं...
राजकाज या लोगों की बुनियादी जरूरतों—रोजगार, शिक्षा, कनेक्टिविटी—पर ध्यान देने के बजाय सरकार ऐसी गतिविधियों में लगी है जो धार्मिक न्यासों की जिम्मेदारी हैं.’’ सलीम यह भी कहते हैं, ''एक तरफ सरकार गंगा आरती कर रही है, जबकि ममता बनर्जी के घर के पीछे आदि गंगा (कभी हुगली की मुख्य धारा रही) सड़ांध मार रही हैं. यह धर्मपरायणता नहीं पाखंड है.’’
राज्य के पर्यटन और आइटी मंत्री बाबुल सुप्रियो टीएमसी और भाजपा की विचारधाराओं में फर्क बताते हैं, वे कहते हैं, ''बहुत बड़ा सामान्य फर्क है. भाजपा दक्षिणपंथी पार्टी है जो दावा करती है कि उसकी दिलचस्पी केवल 70 से 80 फीसद बहुसंख्यक मतदाताओं में है, इस तरह बेहद अहम हिस्से को अपनी योजनाओं से निकाल देती है. बंगाल की सरकार समावेशन में यकीन करती है.’’ अभी तक राजकाज और सरकार-प्रायोजित परियोजनाओं में समावेशन ममता का घोषित इरादा रहा है. हिंदुत्व पर जोर देकर अलबत्ता मुख्यमंत्री अब अनजाने इलाके में कदम रख रही हैं. यह देखना अभी बाकी है कि क्या उनके लक्षित लाभार्थी इस सरकारी धार्मिकता के झांसे में आएंगे.
अपने बचाव में टीएमसी कहती है कि भाजपा के आक्रामक हिंदुत्व के विपरीत, उनका हिंदुत्व समावेशी है
समुद्र किनारे तीर्थ
पश्चिम बंगाल के गंगासागर में स्थित कपिल मुनि मंदिर
टीएमसी का महंगा
मंदिर अभियान
65 करोड़ रु.
दक्षिणेश्वर स्काईवाक
300 करोड़ रु.
कोलकाता के कालीघाट मंदिर के पुनर्निर्माण के लिए
500 करोड़ रु.
दीघा में जगन्नाथ मंदिर
निर्माण के लिए
बंगाल में शक्तिपीठों का विकास और उनका सौंदर्यीकरण
50 लाख रु.
बाघमार में कंगला बाघमार में कंगला मांझी सरकार मांझी सरकार
1 करोड़ रु. से अधिक
पांच नए मंदिर कालीघाट, तारापीठ, जोहुरा काली, दक्षिणेश्वर और गंगासागर में ताड़केश्वर मंदिर.