
हजारों लोगों को मौत की नींद सुलाने वाली यूनियन कार्बाइड का जहरीला कचरा मध्य प्रदेश सरकार के लिए आफत बन गया है. सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को निर्देश दिए हैं कि 346 टन जहरीले कचरे में से 10 टन कचरे को बतौर परीक्षण पीथमपुर में जलाया जाए. अब, औद्योगिक संगठन, गैर-सरकारी संगठन और राज्य सरकार पुनर्विचार याचिका दायर करने की तैयारी में हैं.
इससे पहलेकेंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की टास्क फोर्स ने भी इस कचरे को पीथमपुर में निबटाने के निर्देश दिए थे. लेकिन अदालत के निर्देश के बाद फिलहाल 10 टन कचरा ही जलाया जाएगा और अगले 60 दिन तक इससे निकलने वाली जहरीली गैस के असर और पर्यावरण पर प्रभाव पर नजर रखी जाएगी. परिणाम देखने के बाद ही केंद्र सरकार बाकी के कचरे के निबटान पर फैसला लेगी.
2 दिसंबर, 1984 की रात हुई भोपाल गैस त्रासदी के 28 साल बाद भी इस कचरे का निबटान नहीं हो सका है. यूनियन कार्बाइड के भोपाल स्थित 132 एकड़ के परिसर में पड़ा 346 टन जहरीला रासायनिक अपशिष्ट उसी मिथाइल आइसोसाइनेट (मिक) कीटनाशक का अपशिष्ट है जिसकी वजह से 16,000 (राज्य सरकार का गैस राहत विभाग के अनुसार) से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी. सरकार ने इस जहरीले कचरे की सुध 2006 में तब ली जब एक जनहित याचिका पर अदालत ने इसके निपटान के निर्देश दिए.
प्रदेश के पर्यावरण मंत्री जयंत मलैया कहते हैं कि यह संयंत्र इंदौर के यशवंत सागर के कैचमेंट एरिया में स्थित है, जहां से शहर को पेयजल की आपूर्ति होती है. कचरे का निबटान यहां होने पर पेयजल दूषित हो सकता है. वे आरोप लगाते हैं, ''केंद्र ने सारे पक्षों को अदालत के सामने नहीं रखा और धोखे से एकतरफा फैसला करवाया है. इसके खिलाफ हमारी लड़ाई जारी रहेगी.'' मलैया के मुताबिक कचरे को जर्मनी की एक कंपनी को भेजने पर भी विचार चल जा रहा है.
पीथमपुर औद्योगिक संगठन भी केंद्र के इरादे को उद्योगों के खिलाफ बता रहा है. संगठन के अध्यक्ष और जन संगठन लोक मैत्री के प्रमुख गौतम कोठारी कहते हैं, ''पीथमपुर स्थित रामकी एनवायरो इंजीनियर्स का संयंत्र इंडस्ट्रियल वेस्ट मैनेजमेंट के लिए है. इस कचरे को यहां लाने का मतलब यहां की इंडस्ट्री को उजाड़ना है.''
दरअसल, संयंत्र से कुछ ही दूरी पर रिहायशी इलाका और इंडस्ट्रियल क्लस्टर है. भोपाल ग्रुप फॉर इन्फॉर्मेशन ऐंड एक्शन के सतीनाथ सारंगी कहते हैं, ''कचरे का निबटान रिहायशी इलाके के इतने नजदीक नहीं हो सकता.'' इसी संगठन की रचना ढींगरा कहती हैं, ''इस कचरे के निबटान के लिए खास किस्म के वाष्पीकरण की जरूरत होगी. यह सुविधा इस संयंत्र में नहीं है.''
इस कचरे को लेकर प्रदेश सरकार के हाथ पहले भी जल चुके हैं. 2008 में परीक्षण के नाम पर उसने 40 टन कचरा पीथमपुर में गुपचुप तरीके से ठिकाने लगवाया था. इसके गंभीर परिणाम हुए थे. इलाके की फसल चौपट हो गई थी और दूषित पानी से स्थानीय लोगों को चर्मरोग की शिकायतें होने लगी थीं. 2010 में पीथमपुर दौरे पर आए तत्कालीन केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने कहा था कि कचरे का निबटान यहां नहीं होगा.
दिल्ली स्थित सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवायर्नमेंट (सीएसई) ने भोपाल गैस त्रासदी की 25वीं बरसी पर जारी रिपोर्ट में बताया था कि भोपाल स्थित फैक्टरी के बाहर बसी बस्तियों के भूजल और मिट्टी में क्लोरिनेटिड बेंजीन सहित अन्य घातक रसायन हैं, जो धीमे जहर की तरह है.
इस कचरे को महाराष्ट्र में ठिकाने लगाने की कोशिश की गई लेकिन उसके इनकार के बाद पीथमपुर को चुना गया. कचरे को ठिकाने लगाने की जिम्मेदारी कंपनी की ही थी लेकिन लचर कानून की वजह से यह केंद्र और राज्य सरकार के लिए मुसीबत बन गया.