
लोकसभा चुनाव से पहले बिहार की सियासत में नई इबारत लिखी जा रही है. नीतीश कुमार विपक्षी एकता के मिशन में जुटे हैं और राहुल गांधी से लेकर केजरीवाल तक से मिल रहे हैं. वहीं, बीजेपी नए राजनीतिक समीकरण बनाने की कवायद कर रही है. ऐसे में महागठबंधन के सहयोगी जीतनराम मांझी ने गुरुवार को दिल्ली में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात की तो पटना में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय चिराग पासवान से मिले.
मांझी-शाह, चिराग-नित्यानंद
नीतीश कुमार की अगुवाई वाले महागठबंधन में जेडीयू से लेकर आरजेडी, कांग्रेस, वामपंथी दल और मांझी की पार्टी HAM सहित करीब सात दल शामिल हैं, जबकि बीजेपी के साथ सहयोगी दल के तौर पर फिलहाल पशुपति पारस की पार्टी एलजेपी है. इस आधार पर बीजेपी के लिए महागठबंधन से मुकाबला करने की बड़ी चुनौती है. ऐसे में मांझी-शाह और चिराग-नित्यानंद के बीच हुई मुलाकात के सियासी मायने निकाले जाने लगे हैं.
महागठबंधन से मुकाबला
महागठबंधन से मुकाबला करने के लिए बीजेपी जातीय वोटों की मजबूत गोलबंदी अपने पक्ष में करना चाहती है. ऐसे में सवाल उठता है कि बीजेपी सूबे में दलित वोटों को साधने के लिए कहीं चिराग पासवान और जीतनराम मांझी को अपने साथ मिलाने का दांव तो नहीं खेलने जा रही है. चिराग खुले तौर पर नीतीश के खिलाफ आक्रामक है और एनडीए में एंट्री करना चाहते हैं. मांझी महागठबंधन में हैं, लेकिन वो बहुत सहज नहीं दिख रहे हैं.
मांझी ने अमित शाह से मुलाकात के बाद मीडिया से बात करते हुए बीजेपी के साथ गठबंधन करने की बात को खंडन किया और कहा कि महागठबंधन के साथ रहने के लिए प्रतिबद्ध हैं. इतना ही नहीं, नीतीश को पीएम मैटेरियल करार दिया. साथ ही उन्होंने कहा कि दशरथ मांझी को भारत रत्न की मांग करने के लिए गृहमंत्री के पास गए थे.
हालांकि, मांझी जिस समय शाह से दिल्ली में मिल रहे थे, उस समय नीतीश भी दिल्ली में थे. इसके बावजूद बिहार के दोनों नेता नहीं मिले. ऐसे में मांझी भले ही कुछ कहें, लेकिन बिहार की सियासत में कुछ खिचड़ी जरूर पक रही है.
नीतीश का महागठबंधन
नीतीश कुमार अक्सर सात दलों के महागठबंधन को सफल प्रयोग बताते हुए केंद्रीय स्तर पर भी 2024 में विपक्षी एकता के लिए सभी दलों को एकजुट होने की अपील करते रहते हैं. ऐसे में बीजेपी अपने आपको मजबूत करने के लिए हरसंभव कोशिश में जुटी है. इसी कड़ी में बीजेपी चिराग पासवान और जीतनराम मांझी जैसे दोनों दलित नेताओं को अपने खेमे के साथ लाने में सफल होती है तो बिहार के सियासी रण में महागठबंधन को चुनौती दे सकती है.
मांझी और चिराग की ताकत
जीतनराम मांझी की पार्टी के चार विधायक हैं और उनके बेटे एमएलसी व नीतीश सरकार में मंत्री हैं, लेकिन पूर्व सीएम लंबे समय से अपने लिए एक और एमएलसी सीट या कोई सम्मानजनक पद पाने की कोशिश कर रहे हैं. वहीं, चिराग पासवान भी चाचा पशुपति की बगावत के बाद से अपने सियासी वजूद को बचाए रखने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं. नीतीश की वजह से चिराग के लिए महागठबंधन में कोई जगह नहीं है. इस तरह उनके पास बीजेपी के साथ हाथ मिलाने का विकल्प बचा है.
चिराग पासवान बिहार में दलित समुदाय से आते हैं और उनके पिता रामविलास पासवान दलित समुदाय के सबसे बड़े नेताओं में से एक रहे हैं. चिराग पासवान बिहार में दलित वोटर में खासकर पासवान जाति के नेता हैं. पासवान दलितों में सबसे ज्यादा हैं और उसके बाद दूसरे नंबर पर मुसहर यानि मांझी समुदाय के लोगों की संख्या है. इस तरह से दलितों की दो बड़ी जातियों को अपने साथ जोड़ने की रणनीति मानी जा रही है.
बिहार में दलित समुदाय की आबादी 16 प्रतिशत है, जो दलित और महादलित की श्रेणी में बंटा हुआ है. दलित कोटे के वोट का 70 फीसदी हिस्सा रविदास, मुसहर और पासवान जाति का है. सूबे में दलित वोट बैंक सत्ता की दिशा और दशा दोनों तय करने की ताकत रखता है. बिहार में दलितों के लिए 38 विधानसभा सीटें और छह लोकसभा सीटें आरक्षित हैं, लेकिन उनका असर इससे भी ज्यादा सीटों पर है.
बीजेपी की नई सोशल इंजीनियरिंग
बीजेपी का बिहार में पूरा फोकस कास्ट कांबिनेशन पर है. 2024 के चुनाव में नीतीश कुमार की अगुवाई वाले महागठबंधन से मुकाबला करने के लिए बीजेपी एक मजबूत गठबंधन बनाने कवायद कर रही है. बिहार में भले ही बात विकास की हो, लेकिन सियासत कास्ट पर होती है. इसलिए बीजेपी अपने सवर्ण कोर वोटबैंक के साथ दलित और पिछड़े वर्ग का कॉम्बिनेशन बनाना चाहती है.
नीतीश कुमार के खिलाफ आक्रमक तरीके से मोर्चा खोलने वाले उपेंद्र कुशवाहा से लेकर चिराग पासवान और मुकेश सहनी जैसे नेताओं को बीजेपी अपने पाले में लाने की कवायद कर रही है. बिहार में वीआईपी दल के प्रमुख मुकेश सहनी बिहार में मल्लाह जाति के बड़े नेता है, जिसकी आबादी करीब 3-4 फीसदी है. बिहार में 5 लोकसभा सीटों पर निषादों का सीधा प्रभाव है. इसी तरह से ओबीसी समुदाय से आने वाले उपेंद्र कुशवाहा का अपना जनाधार है.
बिहार में कुशवाहा की करीब 5 से 6 फीसदी आबादी है. पासवान समाज दलित में आता है और प्रदेश में उसकी करीब 4.2 फीसदी हिस्सेदारी है. इस तरह मांझी समुदाय की आबादी भी करीब 4 फीसदी है. बीजेपी बिहार में इस तरह ओबीसी और दलित जातियों के नेताओं को मिलाकर मजबूत सोशल इंजीनियरिंग बनाने की कोशिशों में जुटी है. बीजेपी इसे अमलीजामा पहनाने में सफल रहती है तो फिर 2024 का लोकसभा चुनाव बिहार में काफी दिलचस्प हो जाएगा.