
बिहार की सियासत ने ऐसी राजनीतिक करवट ली की वीआईपी के अध्यक्ष मुकेश सहनी ने सब कुछ गंवा दिया है. सहनी के पास न तो एक भी विधायक बचे हैं और न ही वो अब नीतीश सरकार में मंत्री रहे. सीएम नीतीश कुमार ने भाजपा के पत्र पर रविवार को राज्यपाल फागू चौहान से उन्हें राज्य मंत्रिमंडल से पदमुक्त करने की सिफारिश किया, जिसे पर मुहर भी लग गई है. मंत्री की कुर्सी छिनने के बाद मुकेश सहनी का अलग सियासी कदम क्या होगा?
सहनी के विधायक बीजेपी में चले गए
2020 में बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान आरजेडी के साथ गठबंधन तोड़कर बीजेपी से हाथ मिलकर चुनाव लड़ने वाले मुकेश सहनी की वीआईपी पार्टी से चार विधायक जीते थे. इनमें से एक विधायक का निधन हो चुका है और बाकि तीनों विधायक राजू सिंह, मिश्रीलाल यादव और स्वर्णा सिंह ने सहनी का साथ छोड़कर बीजेपी का का दामन थाम लिया हैं. स्पीकर ने उन्हें बीजेपी में विलय की मान्यता भी दे दी है, जिसके चलते वीआईपी के टिकट पर जीतते तीनों विधायक अब बीजेपी का हिस्सा हैं.
नीतीश कैबिनेट से सहनी की छुट्टी हो गई
वहीं, अब वीआईपी के पास कोई विधायक नहीं बचा है तो अब मुकेश सहनी की नीतीश सरकार में मंत्री पद से छुट्टी हो गए हैं. सहनी के लिए अगला झटका जुलाई 2022 में लग सकता है और अब उन्हें एमएलसी के पद से भी हाथ धोना पड़ सकता है, क्योंकि वो जिस उपचुनाव में एमएलसी बनाए गए थे, उसका कार्यकाल जुलाई 2022 तक है. ऐसे में अब मुकेश सहनी के सदन वापसी के राह मुश्किल हो गई है. वीआईपी के न तो विधायक बचे हैं जिनके सहारे दोबारा से एमएलसी बन सके और न ही कोई विधानसभा की सीट रिक्त है. ऐसे में मुकेश सहनी के पास अब सियासी विकल्प क्या बचे हैं, जिसके सहारे बिहार की सियासत में आगे बढ़ेंगे.
चार साल पहले बनी थी मुकेश सहनी की पार्टी
मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में सेट डिजाइन का काम छोड़कर मुकेश सहनी ने सियासत आए. यह बात 2014 लोकसभा चुनाव की बात है, जब मुकेश सहनी 'स्टार कैंपेनर के तौर पर बिहार में बीजेपी के लिए प्रचार किया. यहीं से सियासी चस्का लगा और उन्होंने निषाद समुदाय को एससी आरक्षण दिए जाने की मांग को लेकर 2018 में विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) का गठन किया. इसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में आरजेडी के साथ मिलकर तीन सीटों पर चुनाव लड़े, लेकिन एक भी सीट पर जीत नहीं सके.
साल 2020 विधानसभा चुनाव में एनडीए में बीजेपी और जेडीयू के साथ-साथ मुकेश सहनी की वीआईपी और जीतनराम मांझी की हम ने मिलकर चुनाव लड़ा था. हालांकि, सीट शेयरिंग बीजेपी और जेडीयू के बीच हुई थी, जिसके तहत बीजेपी ने अपने कोटे से वीआईपी को 11 सीटें दी थी तो जेडीयू ने अपने कोटे से हम को सीट दिया था. वीआईपी ने 11 सीटों पर चुनाव लड़कर चार जीती थी. जीतने वाले करीब-करीब सभी विधायक बीजेपी के करीबी रहे. सहरसा के सिमरी बख्तियारपुर से विधानसभा चुनाव हारने के बावजूद सूबे के पशुपालन मंत्री बने मुकेश सहनी इस पद पर मात्र 496 दिन ही रह सके.
बीजेपी से रार ठानने और बोचहां सीट पर उपचुनाव में जब मुकेश सहनी ने अपना प्रत्याशी उतार दिया है. यही नहीं विधान परिषद के चुनाव में भी बीजेपी के खिलाफ अपने प्रत्याशी उतार रखे हैं. ऐसे में बीजेपी ने सहनी को सियासी सबक सिखाने के लिए पहले उनके तीनों विधायकों को अपने साथ मिला और अब उनकी कैबिनेट से छुट्टी करा दी. इस तरह सहनी खाली हाथ रह गए हैं और एमएलसी की कुर्सी पर भी संकट मंडराने लगा है.
20 मार्च को सहनी की छुट्टी की स्क्रिप्ट लिख दी गई थी
हालांकि, वीआईपी प्रमुख मुकेश सहनी का राज्य मंत्रिमंडल से हटना 20 मार्च को ही तय हो गया था. केंद्रीय गृह राज्य मंत्री और बिहार भाजपा के वरिष्ठ नेता नित्यानंद राय ने जब सीएम नीतीश कुमार से मुलाकात की थी. माना जाता है कि केंद्रीय मंत्री नित्यानंद राय ने नीतीश को उसी दिन बीजेपी शीर्ष नेतृत्व की राय से वाकिफ कर दिया था. इसी के चलते बीजेपी के द्वारा पत्र जारी होते ही नीतीश कुमार ने राज्यपाल से सहनी को मंत्री पद से मुक्त करने की सिफारिश कर दी.
बीजेपी और वीआईपी के बीच दूरी उत्तर प्रदेश चुनाव से ही बढ़ने लगी थी. सहनी पहली बार जब यूपी में फूलन देवी की मूर्ति लगाने के लिए तो उन्हें वाराणसी एयरपोर्ट से ही वापस आना पड़ा. इसके बाद चुनाव के दौरान मुकेश सहनी ने बीजेपी पर जमकर प्रहार किए थे. उन्होंने बीजेपी निषाद समाज के शोषण करने और उनके अधिकारों को न देने का आरोप लगा. सीएम योगी आदित्यनाथ पर भी व्यक्तिगत रूप से हमलावर रहे. यह भाजपा को नागवार गुजरा और तभी से वह उसके निशाने पर थे.
आरजेडी से पहले ही रिश्ते बिगाड़ रखा है
मुकेश सहनी ने बीजेपी के साथ अपने रिश्ते पहले ही खराब कर रखे हैं. 2020 में विधानसभा चुनाव के पहले मुकेश सहनी महागठबंधन के अंग थे, लेकिन सीटों का बंटवारे पर जब प्रेस कांफ्रेंस के दौरान ही मुकेश सहनी ने महागठबंधन छोड़ने का ऐलान कर दिया. तेजस्वी यादव के सामने ही पीठ पर खंजर भोंकने का आरोप लगाने वाले मुकेश सहनी लगातार कहते रहे कि उन्हें 25 सीट देने का वादा कर बाद में धोखा दे दिया गया. इसके बाद वे एनडीए का हिस्सा बने थे. ऐसे में अब सहनी के लिए बीजेपी से नाता खत्म होने के बाद आरजेडी भी कह रही है कि जैसी करनी वैसी भरनी. हालांकि, सहनी अब लगातार लालू यादव की तारीफ कर रहे हैं.
मुकेश सहनी का बीजेपी और आरजेडी दोनों से ही रिश्ते बिगड़ चुके हैं तो अब उनके पास अकेले दम पर ही अपनी सियासी राह को आगे बढ़ाने का विकल्प बचा है. मुकेश सहनी ने कहा कि मेरा काम संघर्ष करना है और वह करता रहूंगा. निषाद आरक्षण के लिए संघर्ष कर रहे हैं और आखिरी सांस तक लड़ेंगे. तीन विधायकों और मंत्री पद की कुर्सी के जाने के बाद और मजबूती के साथ अपनी मुहिम को आगे बढ़ाएंगे.
सहनी के सामने अब क्या है सियासी विकल्प
वीआईपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता देव ज्योति ने aajtak.in से बातचीत करते हुए कहा कि गठबंधन में रहते हुए भी अपने मूल मुद्दों को नहीं छोड़ा था. गठबंधन की कुछ मजबूरिया होती है, लेकिन हम अब आजाद है. हमारे अध्यक्ष मुकेश सहनी ने साफ कर दिया है कि निषाद समाज के आरक्षण को मुद्दे और जातिगत जनगणना की मांग को लेकर आवाज उठाएंगे और समाज के बीच जाएंगे. संघर्ष करेंगे और फिर दोहरी ताकत से वापस आएंगे. बीजेपी किसी भी छोटी पार्टियां आगे नहीं बढ़ने देना चाहती है.
उन्होंने कहा कि बिहार में निषाद समुदाय देख रहा है कि आज कैसे एक मल्लाह के बेटे की सियासत को खत्म करने के लिए बीजेपी ने साजिश रचा है, जिसका जवाब आगामी चुनाव में जनता देगी. हम उपचुनाव बड़ी मजबूती से लड़ रहे हैं और आगे की राजनीति के लिए प्लान बनाए हैं. बिहार में अपने संगठन को मजबूत करेंगे और जमीनी स्तर पर काम कर 2024 के लिए तैयारी शुरू करेंगे. गठबंधन की जहां तक बात है तो अभी इस बार किसी तरह का कोई फैसला नहीं किया गया है.