
बिहार की राजधानी पटना के डॉक्टर कोरोना वायरस से संक्रमण का नाम सुनकर ही उपचार करने से कतराते थे. वहीं एक डॉक्टर दंपति ऐसा भी है, जिसने 300 कोरोना संक्रमितों का उपचार कर उन्हें संक्रमण से निजात दिला दी. हालांकि, इस दौरान डॉक्टर और उनका बेटा खुद भी कोरोना से संक्रमित हो गए, लेकिन फिर भी डॉक्टर ने फोन पर उपचार करना जारी रखा. खास बात यह है कि कोरोना संक्रमितों का उपचार किसी अस्पताल में नहीं, बल्कि होम आइसोलेशन रख कर किया.
यहां बात हो रही पटना के कंकड़बाग में डाइग्नोस्टिक सेंटर चलाने वाले डॉक्टर प्रभात रंजन और उनकी पत्नी डॉक्टर रूपम की. इस डॉक्टर दंपति ने सूझबूझ और विभिन्न स्रोतों से जानकारी एकत्रित कर सैकड़ों लोगों की जान बचाई. ऐसे समय में जब पटना के डॉक्टर और निजी अस्पताल कोरोना संक्रमितों को भगा रहे थे, उस समय कम संसाधनों के बावजूद अपनी और अपने परिवार की जान को जोखिम में डाल कर इस दंपति ने सड़कों पर पीड़ितों का इलाज किया.
प्रभात के मुताबिक, कोरोना की जांच के लिए लोग उनके पास लगातार आते रहे. हालांकि, तब प्राइवेट लैब्स को जांच की अनुमति नहीं मिली थी. बाद में, उन्होंने आईजीजी टेस्ट करना शुरू कर दिया. इससे ये पता लग सकता था कि व्यक्ति कोरोना पॉजिटिव होकर ठीक हो गया है और वो खतरे से बाहर है. अगर वह संक्रमित नहीं हुआ है, तो खतरा अभी बरकरार है.
डॉक्टर प्रभात सबको घर में ही आइसोलेशन में रहने की सलाह देते रहे और फोन पर ही वॉट्सएप मैसेज, टेक्स्ट मैसेज और कॉल्स के जरिए संक्रमितों का उपचार किया. 99 फीसदी मरीज ठीक भी हो गए. अब पटना में डॉक्टरों के बीच बहस चल रही है कि सरकार के बनाए आइसोलेशन सेंटर या कोविड हॉस्पिटल में सारी सुविधाएं हैं, लेकिन वहां कोरोना संक्रमितों की मौत क्यों हो रही है. अधिकतर डॉक्टरों का कहना है कि संक्रमितों के साथ दुर्व्यवहार और तिरस्कार किया जा रहा है, जिसकी वजह से मौतें हो रही हैं. घर परिवार के बीच रहने से दवा भी अधिक असर करती है.
क्या कहते हैं डॉक्टर
आईएमए बिहार के पूर्व अध्यक्ष डॉक्टर सहजानंद का कहना है कि होम आइसोलेशन मरीजों के ठीक होने में इंस्टिट्यूशनल की अपेक्षा अधिक प्रभावी सिद्ध हुआ है. कोरोना संक्रमितों का उपचार कर रहे डॉक्टर सहजानंद, प्रभात रंजन को प्रेरणा स्रोत बताते हैं. वहीं, कैंसर विशेषज्ञ डॉक्टर जितेंद्र सिंह का कहना है कि मरीजों को हॉस्पिटल तभी जाना चाहिए, जब स्थिति गंभीर हो.