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नीतीश का चेहरा, लालू का फॉर्मूला... बिहार में महागठबंधन ने 2024 के लिए ऐसे रचा 'चक्रव्यूह'

बिहार में नीतीश मंत्रिमंडल के विस्तार में महागठबंधन के वोट बेस का ध्यान रखते हुए जातीय समीकरण साधने की कवायद की गई है. नीतीश-तेजस्वी ने अपने कैबिनट विस्तार के जरिए 2024 के लोकसभा और 2025 के विधानसभा चुनाव के लिए मजबूत आधार रखा है. आरजेडी सुप्रीम लालू यादव के सियासी फॉर्मूले को कैबिनेट में उतारने की कवायद की गई है.

नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव
कुबूल अहमद
  • नई दिल्ली ,
  • 17 अगस्त 2022,
  • अपडेटेड 10:13 AM IST

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने मंत्रिमंडल का विस्तार करते हुए मंत्रियों के बीच विभागों का बंटवारा कर दिया है. बिहार में बनी महागठबंधन सरकार का चेहरा नीतीश कुमार हैं, लेकिन मंत्रिमंडल में लालू प्रसाद यादव का फॉर्मूला चला है. कैबिनेट विस्तार में नीतीश-तेजस्वी ने अपने बेस वोट बैंक पर ज्यादा फोकस किया है, लेकिन यह दिखाने की कोशिश की जरूर की है कि ए-टू-जेड की सरकार है और सभी जाति के लोगों को सत्ता में मौका दिया है. इस तरह जातीय समीकरण के साथ-साथ 2024 के लोकसभा और 2025 के विधानसभा चुनाव के लिए सियासी चक्रव्यूह रचा गया है. 

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नीतीश कैबिनेट में मंगलवार को 31 विधायकों ने मंत्री पद की शपथ ली. आरजेडी के कोटे से तेजस्वी यादव को मिलाकर कुल 17 मंत्री बने हैं जबकि जेडीयू के कोटे से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को मिलाकर 12 मंत्री हैं. वहीं, कांग्रेस के दो, जीतनराम मांझी की हिंदुस्तान अवाम मोर्चा के एक और एक निर्दलीय विधायक को मंत्री बनाया गया है. नीतीश सरकार में आरजेडी, जेडीयू, कांग्रेस और जीतन राम मांझी की पार्टी शामिल हैं जबकि वामपंथी पार्टियां बाहर से समर्थन कर रही हैं. 

एनडीए से काफी बड़ा हो गया विपक्षी कुनबा

बिहार में विपक्ष का कुनबा एनडीए से काफी बड़ा हो गया है. यह कुनबा सामाजिक समीकरण के लिहाज से भी काफी बड़ा है. ऐसे में बिहार के जातीय समीकरण के लिहाज से देखें तो नीतीश कुमार कैबिनेट में पिछड़े और अतिपिछड़े समुदाय से सबसे ज्यादा 17 मंत्री हैं. यादव समुदाय के मंत्रियों की संख्या बढ़ गई है. इसके अलावा दलित-6 और 5 मुस्लिम नेताओं को कैबिनेट में शामिल किया गया तो 6 सवर्ण जातियों के मंत्री बनाए गए हैं.

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लालू यादव अपनाते थे ये फॉर्मूला

बिहार की दो सबसे ज्यादा प्रभुत्व वाली ओबीसी जातियां यादव और कुर्मी के दोनों नेता साथ हैं. इसके अलावा इन दोनों के साथ होने से मुसलमानों के वोट बंटने की आशंका भी खत्म हो गई है. वामपंथी पार्टियों का भोजपुर और मगध में दलितों के बीच प्रभाव है. यही वजह है कि नीतीश कैबिनेट के जरिए यादव-मुस्लिम-दलित-अतिपिछड़ी जातियों का सियासी कॉम्बिनेशन बनाया गया है, जो एक समय बिहार में लालू यादव का फॉर्मूला हुआ करता था. पहले लालू यादव और फिर नीतीश कुमार ने इसी सियासी समीकरण के बदौलत बिहार की सत्ता के धुरी बने हुए हैं.

कैबिनेट में सबसे ज्यादा ओबीसी

नीतीश ने बिहार में सामाजिक न्याय के फार्मूले को कैबिनेट में भी अमलीजामा पहनाने की कवायद की है. बिहार में करीब 49 फीसदी ओबीसी हैं, तो नीतीश के मंत्रिमंडल में भी सबसे ज्यादा 45 फीसदी पिछड़ों को प्रतिनिधित्व हैं. दलित बिहार में 16 फीसदी हैं, उन्हें कैबिनेट में 18 फीसदी भागीदारी दी गई है. मुस्लिमों की आबादी 16 फीसदी है और कैबिनेट में उन्हें 15 फीसदी हिस्सेदारी मिली है. 

नीतीश कैबिनेट में दो भूमिहार मंत्रियों को जगह मिली है तो तीन राजपूत मंत्री बनाए गए और एक ब्राह्मण चेहरे को शामिल किया गया है. बिहार में सवर्णों की आबादी 15 फीसदी है और उन्हें कैबिनेट में करीब 18 फीसदी हिस्सेदारी मिली है. इस तरह से आबादी के लिहाज से शामिल किया गया है.

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सवर्णों का कद घटा

यही नहीं बिहार में अगड़ों की जातियों की संख्या को देखते हुए सबसे ज्यादा राजपूत, उसके बाद भूमिहार और फिर ब्राह्मण हैं. हालांकि, एनडीए सरकार की तुलना में इस बार सवर्ण जातियों का कैबिनेट में कद घटा है तो पिछड़ी जातियों और मुस्लिमों का प्रतिनिधित्व बढ़ा है. बिहार में सवर्ण जातियां अहम खिलाड़ी नहीं रहीं. मंडल के बाद ऊंची जातियां बिहार के राजनीतिक मैदान से बाहर हो गईं.

नीतीश की अगुवाई वाली जेडीयू ने अपने कोटे से अतिपिछड़ी जातियों के साथ-साथ सभी समाज को प्रतिनिधित्व देने की कवायद की है. जेडीयू ने भूमिहार-ब्राह्मण-राजपूत-यादव समुदाय से एक-एक मंत्री बनाए हैं तो कुर्मी-दलित समाज से दो-दो मंत्री बने हैं.  पांच अतिपिछड़ी जातियों से मंत्री बने हैं, जो जेडीयू का कोर वोटबैंक माना जाता है. यही वजह है कि नीतीश ने सबसे ज्यादा फोकस पिछड़े और अतिपिछड़ों पर रहा. 

कांग्रेस बिहार में पुराने वोट बैंक की तरफ मुड़ती दिख रही है. पार्टी के दो मंत्री में एक मुस्लिम और एक दलित है. मुस्लिम चेहरे के तौर पर आफाक आलम को जगह दी गई है तो दलित प्रतिनिधित्व के रूप में मुरारी लाल गौतम को मंत्री बनाया है. पार्टी पहले भी दलित और मुस्लिम गठजोड़ के जरिए बिहार से लेकर केंद्र में सालों तक राज कर चुकी है. हालांकि, कांग्रेस के पास अभी एक और मंत्री पद है, जिसके जरिए वो किसी दूसरे समुदाय को मौका दे सकती है.

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आरजेडी ने रखा मुस्लिम और यादव पर फोकस

वहीं, लालू यादव की आरजेडी ने अपने कोर वोटबैंक यादव-मुस्लिम समुदाय का ख्याल रखते हुए ए-टू-जेड की पार्टी होने का संदेश दिया है. आरजेडी ने अपने कोटे से सबसे ज्यादा यादव जाति से सात यादव मंत्री बनाए हैं तो तीन मुस्लिम को मंत्री बनाए हैं. इतना ही नहीं राजपूत-भूमिहार समुदाय से एक-एक मंत्री बनाया है तो दो दलित और तीन अतिपिछड़ी जातियों से मंत्री बने हैं. आरजेडी ने पहली बार किसी भूमिहार को कैबिनेट में जगह दी है तो अतिपछड़ी जातियों का प्रतिनिधित्व देकर ए-टू-जेड की पार्टी होने का संदेश दिया है. 

बता दें कि 2020 के विधानसभा चुनाव में आरजेडी के हाथ सत्ता आते-आते रह गई थी. इस हार की कसक तेजस्वी यादव को जरूर रही है, लेकिन अब फिर से दोनों ही दल साथ हैं. ऐसे में कहा जा रहा है कि नीतीश कुमार अगले साल तक पीएम पद की रेस में शामिल होने की तैयारी में हैं तो तेजस्वी यादव का टारगेट 2025 विधानसभा चुनाव है. वहीं, जेडीयू के बीजेपी से अलग होने के बाद एनडीए बिहार में कमजोर हुआ है तो महागठबंधन की ताकत बढ़ी है. 

नीतीश कुमार की नजर 2024 के लोकसभा चुनाव पर है तो तेजस्वी यादव का फोकस 2025 चुनाव पर हैं. इस तरह तैयारी के लिए अभी से दोनों ही नेताओं ने कमर कस ली है. तेजस्वी ने मंत्रिमंडल के विस्तार में आरजेडी ने अपने कोर वोटर्स यादव और मुसलमान को पूरी जगह दी है. MY समीकरण आरेजडी के बुरे दिनों में भी उसके साथ रहा था. उसके ये दो वोट बैंक हमेशा साथ रहे हैं. मंत्रिमंडल में सवर्णों को भी जगह दी है. 2020 चुनाव  के बाद से ही आरजेडी ए-टू-जेड सरकार की बात करती रही है और ऐसे में 2024 और 2025 में नए समीकरण के साथ जीत का फॉर्मूला बनाने में जुट गए हैं. 

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दलित-पिछड़े समाज पर फोकस

नीतीश कैबिनेट में जिस तरह से दलितों और पिछड़ों को भागेदारी दी गई है, उससे बीजेपी के खिलाफ जबरदस्त तरीके से सियासी चक्रव्यूह रचने की कवायद की है. महागठंबधन में शामिल चारों दलों ने अपने-अपने कोटे से दलित समाज से मंत्री बनाए हैं, जिसका राजनीतिक संदेश साफ है. बिहार में एलजेपी के दो धड़ों में चाचा-भतीजे के बीच बटने के बाद दलित वोटों पर सभी दलों की नजर है. ऐसे में महागठबंधन के चारों दलों ने दलित समुदाय को उसकी भागेदारी के लिहाज से हिस्सेदारी देने की कवायद की है. 

नीतीश कैबिनेट में नारी शक्ती

बिहार में नीतीश कुमार की कैबिनेट में महिला प्रतिनिधत्व की बात करें तो कुल तीन महिला विधायकों ने मंत्री पद की शपथ ली है. इसमें जेडीयू कोटे से दो लेसी सिंह और शीला कुमारी मंत्री बनी हैं जबकि आरजेडी की एक विधायक अनीता देवी का नाम शामिल है. बिहार में महिला वोटर काफी अहम है और बीजेपी की नजर भी इसी वोटबैंक पर है. 2020 के विधानसभा एनडीए की जीत में महिला वोटरों का अहम रोल रहा है, जिसका जिक्र पीएम मोदी ने खुद किया था. ऐसे में नीतीश कुमार भी इसी वोटबैंक पर नजर गढ़ाए हैं. 

सत्ता की कमान नीतीश के हाथ

सत्ता की कमान नीतीश कुमार को मिली तो मंत्रिमंडल में जेडीयू से ज्यादा जगह आरजेडी को मिली है. ऐसे में भले ही दिखने में जेडीयू के मंत्रियों की संख्या कम हों लेकिन पावरफुल और मलाईदार कहे जाने वाले विभाग नीतीश कुमार के पास हैं. इस तरह नीतीश कुमार ने गृह मंत्रालय समेत 5 विभाग अपने पास रखे हैं. जेडीयू कोटे से मंत्री विजय चौधरी को वित्त, वाणिज्य और संसदीय कार्य मंत्री बनाया है, जिसे कि अहम विभाग माना जाता है. इसके अलावा जेडीयू के बिजेंद्र यादव को ऊर्जा मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई है, साथ ही योजना और विकास मंत्रालाय भी मिला है. शीला कुमारी, परिवहन मंत्री तो अशोक चौधरी को भवन निर्माण मंत्रालय की जिम्मेदारी.

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वहीं तेजस्वी यादव को स्वास्थ्य, पथ निर्माण विभाग मिला है. उनके बड़े भाई तेज प्रताप यादव को वन-पर्यावरण मंत्री बनाया गया है. तेजस्वी यादव की पार्टी के कोटे में राजस्व और भूमि सुधार, उद्योग, शिक्षा, कृषि, आपदा प्रबंधन जैसे अहम मंत्रालय आए हैं. इसके अलावा शिक्षा और उद्योग मंत्रालय भी आरजेडी के हिस्से में आया है, जिसके चलते रोजगार देने की जिम्मेदारी तेजस्वी यादव के कंधे पर ही रहेगी. 
 

 

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