
एल्डरमैन वोटिंग मुद्दे पर बीजेपी की जोर-आजमाइश सुप्रीम कोर्ट ने खत्म कर दी क्योंकि दिल्ली नगर निगम के एक्ट में मनोनीत के वोटिंग राइट सदन में नहीं थे. उस वक्त बीजेपी की पार्षद सत्या शर्मा पीठासीन अधिकारी थीं लेकिन अब वक्त बदल गया है.
डिप्टी मेयर और स्टैंडिंग कमेटी के 6 सदस्यों के चुनाव में 47 वोट पड़ जाने तक फोन ले जाने की अनुमति थी लेकिन इसके तुरंत बाद ही नई मेयर शैली ओबेरॉय ने फोन अंदर ले जाने पर रोक लगा दी. बीजेपी को यह फैसला रास नहीं आया. सदन में जमकर हंगामा किया, जिसके बाद सदन की कार्यवाही अगले दिन के लिए स्थगित करनी पड़ी. ऐसा करके AAP ने बीजेपी से एल्डरमैन की वोटिंग वाला बदला ले लिया.
क्या कहता है MCD एक्ट
दिल्ली नगर निगम का एक्ट और बिजनेस रूल दोनों ही मोबाइल फोन के मुद्दे पर साइलेंट हैं. पिछले चुनावों में कभी भी मोबाइल ले जाना अलाउड नहीं था. काउंसलर्स पर एंटी डिफेक्शन लॉ नहीं लगता है, इसलिए वो पार्टी लाइन के पार जाकर वोट कर सकते हैं. मोबाइल ले जाने के पीछे राजनीतिक दलों की मंशा है कि क्रॉस ओटिंग न होने पाए.
मेयर का फैसला ही माना जाएगा
नाम ना छापने की शर्त पर पूर्व विधि अधिकारी ने कहा कि दिल्ली नगर निगम इस मुद्दे पर साइलेंट है. बिजनेस रूल में भी इस बात का जिक्र नहीं है क्योंकि उस वक्त मोबाइल फोन का इतना ज्यादा चलन नहीं था. लिहाजा मोबाइल ले जाने और नहीं ले जाने, दोनों ही दशा में मेयर का डिसीजन माना जाएगा.
AAP या बीजेपी के पार्षद ने वोट देकर फोटो खींचकर रख लिया तो इससे साबित हो जाएगा कि उसने पार्टी लाइन के खिलाफ जाकर वोट तो नहीं किया है. एक पार्षद को केवल एक ही बैलट पेपर मिलता है. किसी भी तरह की गलती से बैलट पेपर खराब हो जाता है. बैलट पेपर पर प्रत्याशियों के सामने ही पार्षद वोट करता है.
पूर्व विधि अधिकारी ने बताया कि नए बैलट पेपर प्रिंट करवाने के बाद नए सिरे से चुनाव करवाया जा सकता है, हालांकि यह पीठासीन अधिकारी को ही तय करना है. हाउस में मेयर का डिसीजन ही सर्वोपरि होता है. मेयर के मुताबिक इतने बैलट पेपर नहीं बचे कि पूरे पार्षद वोट डाल पाएं इसलिए वोटिंग रोकनी पड़ी.
AAP और बीजेपी को क्रॉस वोटिंग का डर
AAP को पता है कि डिप्टी मेयर चुनाव में क्रॉस वोटिंग हुई है. स्थायी समिति में 4 उम्मीदवार AAP के और 3 बीजेपी के प्रत्याशी भले लड़ रहे हों लेकिन यह सच है कि दोनों पार्टी के तीन उम्मीदवार आसानी से चुने जा सकते हैं. लड़ाई चौथे की है और इसलिए दोनों को क्रॉस वोटिंग का डर सता रहा है.
हालांकि आप के सांसद संजय सिंह ने कहा, “हमें क्रॉस वोटिंग का डर क्यों होगा? तानाशाही और गुंडागर्दी का आचरण हुआ है. जिन लोगों ने वोट डाल दिया, उसमें बीजेपी और आम आदमी पार्टी के भी लोग हैं. एक्ट में मोबाइल फोन नहीं ले जाने का कोई जिक्र नहीं है. हर जगह हार गए हैं. दिल्ली के दो करोड़ लोगों ने हरा दिया, मेयर, डिप्टी मेयर चुनाव में हार गए. अब स्टैंडिंग कमिटी चुनाव में हार रहे हैं. ये हार नहीं पचा पा रहे हैं. संविधान, हाई कोर्ट को चुनौती दे रहे हैं. एमसीडी के चुनाव में लिखा था कि पोल बूथ पर वोटर मोबाइल ले जा सकता है. यहां चुने हुए पार्षद पर रोक लग रही है. क्या चोर छिपा है मन में एक आदमी वोट देने गया, वोट देकर आ गया, अपना वोट किसी को दिखाया नहीं, तो क्या परेशानी है.”
मेयर और डिप्टी मेयर के चुनाव में फोन अलाउ नहीं था. मेयर ने खुद तय किया कि मोबाइल फोन ले जा सकते हैं. बीजेपी ने इसको लेकर सवाल उठाया. आप के पार्षद सिर्फ आप के ही उम्मीदवार को प्रिफरेंस देगा, बीजेपी को नहीं. वहीं बीजेपी सिर्फ बीजेपी के उम्मीदवारों को प्रिफरेंस देगा, लेकिन बीजेपी नए सिरे से पूरी वोटिंग करवाने की मांग कर रही है. वह कह रही है कि जो वोट अब तक डाले वह नियम के अनुसार सही नहीं हैं, क्योंकि वह सीक्रेट वोटिंग का उल्लंघन है. बीजेपी को लगता है कि डिप्टी मेयर चुनाव की तरह क्रॉस वोटिंग हुई तो उसके पक्ष में वोट आ सकते हैं.