
दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) की मेयर शैली ओबराय और डिप्टी मेयर आले मोहम्मद इकबाल चुने गए हैं. आम आदमी पार्टी भले ही मेयर और डिप्टी मेयर अपना बनाने में सफल हो गई, लेकिन एमसीडी की स्टैंडिंग कमेटी के चुनाव को लेकर बीजेपी और AAP के बीच रातभर टकराव जारी रहा. एमसीडी में अभी से दिल्ली सरकार की तरह पावर फाइट की संभावना दिखने लगी है. स्टैंडिंग कमेटी पर यदि किसी तरह से बीजेपी का कब्जा हो जाता है तो फिर एमसीडी में भी उपराज्यपाल और केजरीवाल सरकार की तरह पावर क्लैश होता रहेगा.
दिल्ली में उपराज्यपाल वीके सक्सेना और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के बीच काफी समय से अधिकारों को लेकर सियासी जंग जारी है. टकराव की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि एलजी-केजरीवाल सरकार के बीच अधिकारों की जंग कई बार सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुकी है. कमोवेश, यही हालत एमसीडी में होती नजर आ रही है, जिसकी शुरूआत चुनाव के बाद से ही हो गई थी जब नतीजे आम आदमी पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और बीजेपी दूसरे नंबर पर रही.
सुप्रीम कोर्ट के हस्ताक्षेप के बाद दिल्ली में 84 दिन के बाद मेयर और डिप्टी मेयर का चुनाव हो सका है, लेकिन स्टैंडिंग कमेटी के चुनाव को लेकर बीजेपी और आम आदमी पार्टी आमने-सामने हैं. यह लड़ाई एमसीडी के पावर के लिए है, जिसमें मेयर भले ही आम आदमी पार्टी ने बना लिया है, लेकिन स्टैंडिंग पर काबिज हुए बगैर खुलकर पार्टी काम नहीं कर सकेगी. स्थाई समिति एमसीडी की सबसे पावरफुल कमेटी होती है, जिसके पास ज्यादातर मामलों में सदन से अधिक अधिकार होते हैं. इसीलिए स्थाई समिति पर कब्जे के लिए बीजेपी और आम आदमी पार्टी के बीच तलवारें खिंच गई हैं.
एमसीडी में क्या टकराव?
दिल्ली नगर निगम में अधिकांश प्रस्ताव स्थायी समिति से पारित होकर सदन में पहुंचते हैं. नीति बनाने या संशोधन के प्रस्ताव पर स्थायी समिति पहले निर्णय लेती है. इसके बाद प्रस्ताव सदन में जाता है तो सदन ही अंतिम निर्णय लेता है. ऐसे में सत्ता के जब दो केंद्र होंगे तो किसी भी दल के लिए एमसीडी के सदन और स्थायी समिति में प्रस्ताव पारित कराना कठिन हो सकता है. प्रस्ताव पारित नहीं होगा तो विवाद भी होंगे. इसके अलावा, एमसीडी में मेयर, स्टैंडिंग कमेटी और निगमायुक्त के अधिकार भी अलग-अलग हैं. तीनों कानूनी दायरे में रहकर स्वतंत्र होकर फैसला लेते हैं, लेकिन कभी-कभी उनके हित कॉमन न होने पर एक दूसरे के बीच टकराव भी होते हैं.
मेयर के पास अधिकार
आम आदमी पार्टी की शैली ओबराय दिल्ली की मेयर चुन ली गई हैं. मेयर के पास एमसीडी में ए श्रेणी के अधिकारियों की नियुक्ति, प्रमोशन और डेप्यूटेशन पर आए अफसर की नियुक्ति का अधिकार है. निगम में कार्यरत कर्मचारी और अधिकारी पर कार्रवाई-दंड देने का अधिकार है. दिल्ली के संपत्ति कर की दरें क्या होंगी और किसे छूट दी जानी है. 50 हजार रुपये से अधिक की कोई भी एमसीडी अचल संपत्ति किराए पर देने या बेचने का अधिकार महापौर के पास है. पदों के सृजन और पदों को समाप्त करने का उनके पास अधिकार है, लेकिन नीति बनाने या संशोधन के प्रस्ताव पर स्थायी समिति को पहले निर्णय लेना पड़ता है.
स्थाई समिति के पास ताकत
दिल्ली नगर निगम में स्थाई समिति को काफी पावर हैं. ठेके वाली परियोजनाओं पर मेयर-निगमायुक्त को पहले स्थायी समिति से मंजूरी लेनी होगी. स्टैंडिंग कमेटी में पास होने के बाद ही इसे मेयर सदन से पास कराने के लिए रख सकते हैं. प्रस्ताव से अहसमत होने पर सदन स्थायी समिति की परियोजना को खारिज कर सकती है. स्थायी समिति प्रस्तावों को वापस कर विभाग को नए सिरे से समीक्षा करने का आदेश दे सकती है. बड़े व्यावसायिक और आवासीय संपत्तियों के नक्शे और ले-आउट प्लान पास करने का अधिकार स्थायी समिति के पास है.
दिल्ली निगमायुक्त की छुट्टी स्वीकृत करने और निगम में कौन सी एजेंसी काम करेगी और कौन नहीं, इसका फैसला लेने का अधिकार स्थाई समिति के पास है. एमसीडी के किसी भी परियोजना का बजट तय करने और 50 हजार रुपये तक की कोई भी अचल संपत्ति बेचने और किराए पर देने का अधिकार भी स्टैंडिंग कमेटी के पास है. स्टैंडिंग कमेटी में जो चेयरमैन बनेगा, उसकी हैसियत कामकाज के लिहाज से मेयर से कम नहीं है.
एमसीडी के तमाम वित्तीय और प्रशासनिक फैसले पहले स्थाई समिति में ही लिए जाते हैं, जिसपर सदन मुहर लगाता है जो एमसीडी की सर्वोच्च संस्था है. मेयर नगर निगम के सदन की अध्यक्षता करता है, जिसकी बैठक महीने में एक बार ही होती है जबकि स्टैंडिंग कमेटी की बैठक हर हफ्ते होती है. इसीलिए नगर निगम में स्टैंडिंग कमेटी के लिए आम आदमी पार्टी और बीजेपी की बीच सियासी घमासान छिड़ गया है.
स्थाई समिति में कितने सदस्य?
एमसीडी की स्थाई समिति में कुल 18 सदस्य होते हैं, जिनमें 6 सदस्य पार्षदों के द्वारा चुने जाते हैं तो 12 सदस्य एमसीडी के अलग-अलग जोन से चुने जाते हैं. केंद्र सरकार ने सुचारू कामकाज के लिए एमसीडी के 12 प्रशासनिक (जोन) क्षेत्रों में बांट रखा है, जिसमें दिल्ली के सेंट्रल, सिटी-एसपी (सदर पहाड़गंज), सिविल लाइंस, करोल बाग, केशव पुरम, नजफगढ़, नरेला, नॉर्थ शाहदरा, रोहिणी, साउथ शाहदरा, साउथ और वेस्ट शामिल हैं.
स्डैंटिंग कमेटी के कुल 18 सदस्य हैं, जिनमें से 10 सदस्य जो भी पार्टी बनाने में कामयाब हो जाती है तो उसका ही चेयरमैन बन जाएगा. स्थाई समिति के छह सदस्यों का चुनाव हो रहा है, जिसमें आम आदमी पार्टी के चार उम्मीदवार और बीजेपी के तीन प्रत्याशी मैदान में है. स्टैंडिंग कमेटी सदस्यों के चुनाव में कुल वोट 250 हैं. ऐसे में अगर किसी उम्मीदवार को फर्स्ट प्रिफरेंस वोट हासिल करके ही जीत चाहिए तो उसे 250 के सातवें हिस्से से एक ज़्यादा पहला प्रिफरेंस हासिल करना होगा, जो 37 वोट का आंकड़ा बैठता है.
इस लिहाज से आम आदमी पार्टी को 4 सीट जीतने के लिए 148 फर्स्ट प्रिफरेंस वोट चाहिए जबकि उसके पास महज 134 पार्षद हैं. इसी तरीके से बीजेपी को 3 सीटें जीतने के लिए 111 पहला प्रिफरेंस चाहिए होगा जबकि उसके पास महज 105 ही पार्षद हैं. ऐसे में कांग्रेस के सदस्यों और निर्दलीय पार्षदों का रोल सबसे अहम हो जाता है. इसके अलावा 12 सदस्य जोन से चुने जाने हैं, उसमें भी काफी रोचक लड़ाई है.
स्थाई समिति पर कब्जे की जंग
दिल्ली नगर निगम में 12 जोन हैं, जिनमें संख्या बल के हिसाब से देखें तो 8 पर आम आदमी पार्टी का कब्जा होगा तो चार पर बीजेपी का. इस तरह सदन में मुकाबला तीन-तीन की बराबरी पर भी छूटता है तो स्टैंडिंग कमेटी के 11 सदस्य आम आदमी पार्टी के होंगे तो 7 सदस्य बीजेपी के, लेकिन यहां भी एक पेंच है. दिल्ली के उपराज्यपाल के पास 10 पार्षदों के मनोनयन का अधिकार है, जिन्हें एलडरमैन कहा जाता है. इन एलडरमैन को जोन चुनाव में वोटिंग का अधिकार होता है. दिल्ली के एलजी ने जिन 10 एल्डरमैन को नामित किया है, वे सभी बीजेपी के सदस्य हैं. ऐसे में स्टैंडिंग कमिटी के सदस्यों के चुनाव में बीजेपी की संख्या मजबूत हो गई है.
एमसीडी के 12 जोन में से भाजपा करीब 7 जोन पर दावा कर रही है. यानी साफ है 50 फीसदी से अधिक जोन में भाजपा अध्यक्ष बनाने की कोशिश में है. इस तरह से एल्डरमैन के जरिए अधिकतर जोन में अपने अध्यक्ष बनाने की जुगत में बीजेपी लगी है. बीजेपी के पास शाहदरा नॉर्थ, शाहदरा साउथ, नजफगढ़ जोन और केशव पुरम ज़ोन में बहुमत है. एल्डरमैन पार्षदों के जरिए बीजेपी ने नरेला सिविल लाइन और मध्य जोन में बहुमत लेने की कोशिश की है. बीजेपी का फोकस नरेला और सेंट्रल जोन पर है.
नरेला जोन में आम आदमी पार्टी और मध्य जोन में कांग्रेस के कुछ पार्षदों को अपनी तरफ मिला करके बीजेपी की स्थाई समिति पर कब्जा करने की कोशिश की रणनीति है. नरेला और सिविल लाइन जोन से राज्यपाल ने 4-4 और मध्य में दो एल्डरमैन को नामित कर रखा हैं. इस तरह से बीजेपी स्टैंडिंग कमेटी में अपने 10 सदस्य को जीतने की कवायद कर रही है. ऐसा होता है तो दिल्ली एमसीडी में भी सियासी पावर क्लैश जारी रहेगा, क्योंकि स्थाई समिति एमसीडी की सबसे पावरफुल कमेटी होती है जिसके पास ज़्यादातर मामलों में सदन से अधिक अधिकार होते हैं. इसलिए 18 सदस्यों वाली स्टैंडिंग कमेटी में जो चेयरमैन बनेगा, उसकी हैसियत कामकाज के लिहाज काफी अहम होगी.