
दिल्ली की सियासत फिर गरमा गई है. आबकारी नीति घोटाले में फंसे मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने दो दिन के अंदर इस्तीफे का ऐलान कर दिया है. केजरीवाल साढ़े पांच महीने तक तिहाड़ जेल में रहे हैं, लेकिन उन्होंने अपना पद नहीं छोड़ा था. अब दो दिन पहले जेल से रिहाई के बाद उन्होंने ये बड़ा दांव खेला है. हालांकि, यह पहली बार नहीं है, जब दिल्ली की सत्ता संभाल रहे किसी नेता को भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरने के बाद पद छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है.
इससे पहले बीजेपी के दिग्गज नेता रहे मदन लाल खुराना को भी साल 1996 में दिल्ली का मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा था. उस समय खुराना और बीजेपी के तत्कालीन अध्यक्ष लाल कृष्ण आडवाणी जैन हवाला केस में घिरे थे. विपक्ष ने भ्रष्टाचार के मसले पर घेरा तो जनवरी 1996 में आडवाणी ने बीजेपी अध्यक्ष का पद छोड़ा और बेदाग साबित होने तक चुनाव ना लड़ने का ऐलान किया. उसके बाद खुराना पर भी प्रेशर बन गया और उन्हें भी सीएम की कुर्सी छोड़नी पड़ी. बाद में दो साल तक साहिब सिंह वर्मा दिल्ली के मुख्यमंत्री रहे. लेकिन, विधानसभा चुनाव से ठीक पहले प्याज की महंगाई ने वर्मा की कुर्सी भी छीन ली.
सिर्फ 52 दिन सीएम रह पाई थीं सुषमा
साल 1998 में दिल्ली को पहली महिला मुख्यमंत्री के रूप में सुषमा स्वराज मिलीं. सुषमा सिर्फ 52 दिन ही मुख्यमंत्री रह पाईं और चुनाव नतीजे आए तो बीजेपी बुरी तरह हार गई. साल 1993 में जिस बीजेपी की 49 सीटें आई थीं, 5 साल बाद एंटी इंकम्बेंसी की वजह से सिर्फ 15 सीटों पर सिमट गई. जबकि 1993 में 14 सीटें पाने वाली कांग्रेस की 1998 में 52 सीटें आईं और शीला दीक्षित के नेतृत्व में सरकार आई. यानी सत्ता विरोधी लहर ने नतीजों को ठीक उलटा कर दिया. तब से लेकर अब तक बीजेपी दिल्ली में बहुमत हासिल नहीं कर पाई है. 6 अगस्त 2019 में सुषमा का निधन हो गया था.
ठीक वैसे ही कुछ हालात एक बार फिर दिल्ली की सियासत में देखने को मिल रहे हैं. सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल कथित शराब घोटाले में फंसे हैं. सीएम से लेकर तत्कालीन डिप्टी सीएम और अन्य बड़े नेताओं को जेल तक जाना पड़ा है. हाल में बड़े नेताओं की रिहाई हुई है, लेकिन भ्रष्टाचार का नैरेटिव अभी खत्म नहीं हुआ है.
क्या केजरीवाल के पास विकल्प नहीं?
इधर, लोगों में भी जल संकट से लेकर साफ-सफाई और विकास कार्य ठप पड़े होने से नाराजगी है. केजरीवाल सरकार को तमाम चुनौतियों से ना सिर्फ जूझना पड़ रहा है, बल्कि अपनी छवि भी बकरार रखना है. लेकिन, जमानत की शर्तों ने मुख्यमंत्री केजरीवाल के हाथ बांध दिए हैं. ऐसे संकट के वक्त पार्टी के सामने बड़े दांव के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं बच रहा था. यही वजह है कि केजरीवाल का सीएम पद छोड़ने का ऐलान भी चुनावी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है. हालांकि, उनका यह दांव कामयाब होगा या नहीं, ये तो चुनावी नतीजे के बाद ही स्पष्ट हो पाएगा.
वहीं, बीजेपी ने केजरीवाल के ऐलान को नया नाटक करार दिया है. बीजेपी का कहना है कि शराब घोटाले में जेल में रहकर इस्तीफा नहीं दिया और अब बाहर आने के बाद त्यागपत्र देना बताता है कि उन्होंने आरोपों को स्वीकार कर लिया है. जब भी चुनाव होंगे, केजरीवाल सरकार की विदाई तय है.
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि जेल से बाहर आने के बाद केजरीवाल की कोशिश है कि डैमेज कंट्रोल को रोका जाए और भ्रष्टाचार की छवि को खत्म किया जाए. हालांकि, यह आसान नहीं है. सच्चाई यही है कि केजरीवाल ने इस्तीफा की घोषणा कर बड़ा दांव खेला है. उन्होंने विरोधियों को जवाब देने साथ ही लोगों को अपने साथ जोड़ने के लिए एक मजबूत कदम उठाया है. उन्होंने बीजेपी को भी जवाब दिया है कि उन्हें कुर्सी से ज्यादा लगाव नहीं है. इस घोषणा के साथ उन्होंने अपनी कट्टर ईमानदार छवि को मजबूत करने की कोशिश की है.
जब प्याज की महंगाई पर घिर गए थे साहिब सिंह वर्मा?
साहिब सिंह 1996 से 1998 तक दिल्ली के मुख्यमंत्री रहे हैं. बीजेपी ने मदन लाल खुराना को सीएम पद से हटाने के बाद वर्मा को सत्ता की कमान सौंपी गई थी. हालांकि बीजेपी ने 1998 के चुनाव से ऐन पहले साहिब सिंह वर्मा को हटाकर सुषमा स्वराज को दिल्ली का मुख्यमंत्री बना दिया था. दरअसल, साल 1993 में बीजेपी ने दिल्ली विधानसभा चुनाव में प्रचंड जीत दर्ज की थी और साहिब सिंह वर्मा को मदन लाल खुराना की सरकार में शिक्षा और विकास मंत्री बनाया गया था. इस दौरान कई अच्छे काम किए, जिससे उन्होंने बीजेपी हाईकमान के मन में बेहतर छवि बना ली. साल 1996 में भ्रष्टाचार के आरोपों (जैन डायरी हवाला केस) में आडवाणी घिरे तो उन्हें पार्टी अध्यक्ष पद छोड़ना पड़ा. इस डायरी में मदन लाल खुराना का भी नाम था. आरोप था कि उन्होंने 1988 में तीन लाख रुपये लिए थे. दबाव में आकर खुराना को भी सीएम पद छोड़ना पड़ा.
23 फरवरी 1996 को बीजेपी आलाकमान ने विधायकों की बैठक बुलाई. 49 में से ज्यादातर विधायकों ने साहिब सिंह वर्मा के नाम पर अपनी सहमति जताई. उसके बाद वर्मा को मुख्यमंत्री चुना गया. वे करीब ढाई साल तक मुख्यमंत्री रह पाए और चुनाव से ऐन 50 दिन पहले 1998 में प्याज की बढ़ती कीमतों को लेकर उन्हें सीएम पद से इस्तीफा देना पड़ा. उसके बाद संगठन ने सुषमा स्वराज को दिल्ली की कुर्सी सौंपी. सुषमा के नेतृत्व में बीजेपी ने विधानसभा चुनाव लड़ा. लेकिन दिल्ली की जनता ने बीजेपी को सत्ता से बेदखल कर दिया. जानकार कहते हैं कि उस समय बीजेपी को दिल्ली में बढ़ी प्याज की कीमतों, महंगाई और बिजली के मुद्दे के चलते हार का सामना करना पड़ा था.