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गिरफ्तारी वैध, जमानत भी शर्तों पर... बाहर आकर भी केजरीवाल के लिए सरकार चलाने में मुश्किलें कम नहीं! 7 points में समझें

दिल्ली के कथित शराब घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग केस में फंसे मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को ईडी के बाद सीबीआई मामले में भी जमानत मिल गई है. ईडी ने नवंबर 2023 से मार्च 2024 तक केजरीवाल को 9 समन भेजे, लेकिन वे पूछताछ में शामिल नहीं हुए. उसके बाद ईडी ने 21 मार्च को केजरीवाल को गिरफ्तार कर लिया था. 10 दिन की पूछताछ के बाद 1 अप्रैल को केजरीवाल को तिहाड़ जेल भेजा गया था.

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल. (फाइल फोटो) दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल. (फाइल फोटो)
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 13 सितंबर 2024,
  • अपडेटेड 6:53 PM IST

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को ईडी के बाद सीबीआई मामले में भी सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिल गई है. वे जेल से बाहर आ चुके हैं. हालांकि, कोर्ट ने सीबीआई की गिरफ्तारी को वैध ठहराया है और बेल की शर्तें तय की हैं. कोर्ट ने जमानत के लिए वहीं शर्तें लगाई हैं, जो ED केस में बेल देते वक्त लगाईं थीं. केजरीवाल को बाहर आकर उन शर्तों का पालन करना होगा. माना जा रहा है कि रिहाई की शर्तों की वजह से केजरीवाल की मुश्किलें कम नहीं हुई हैं. उन्हें सरकार चलाने में मशक्कत झेलनी पड़ सकती है. फिलहाल, केजरीवाल की रिहाई से पार्टी नेता से लेकर कार्यकर्ता तक खुश हैं और तिहाड़ से लेकर उनके आवास तक जश्न का माहौल है. सीएम आवास से लेकर पार्टी दफ्तर तक में जश्न मनाया जा रहा है. सात पॉइंट में जानिए केजरीवाल की रिहाई के मायने.

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दरअसल, दिल्ली के कथित शराब घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग केस में केजरीवाल भी फंसे हैं. ईडी ने नवंबर 2023 से मार्च 2024 तक केजरीवाल को 9 समन भेजे. लेकिन वे पूछताछ में शामिल नहीं हुए. उसके बाद ईडी ने 21 मार्च को केजरीवाल को गिरफ्तार कर लिया. 10 दिन की पूछताछ के बाद 1 अप्रैल को केजरीवाल को तिहाड़ जेल भेजा गया. इस बीच, 26 जून को सीबीआई ने केजरीवाल को अरेस्ट कर लिया. बाद में 12 जुलाई को ईडी केस में केजरीवाल को जमानत मिल गई, लेकिन सीबीआई की गिरफ्तारी के कारण जेल से रिहाई नहीं हो सकी. आम आदमी पार्टी लगातार दावा कर रही है कि बीजेपी ने केजरीवाल को राजनीतिक साजिश के तहत फंसाया है. वहीं, बीजेपी कह रही है कि बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से होय.

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केजरीवाल को किन शर्तों का करना होगा पालन?

- जेल से बाहर आने के बाद केजरीवाल किसी भी फाइल पर दस्तखत नहीं कर पाएंगे. जब तक ऐसा करना जरूरी ना हो. 
- केजरीवाल के दफ्तर जाने पर भी पाबंदी रहेगी.  वे ना तो मुख्यमंत्री कार्यालय और ना सचिवालय जा सकेंगे.
- इस मामले में केजरीवाल कोई बयान या टिप्पणी भी नहीं कर सकते हैं.
- किसी भी गवाह से किसी तरह की बातचीत नहीं कर सकते हैं. 
- इस केस से जुड़ी किसी भी आधिकारिक फाइल को नहीं मंगा सकते हैं. ना देख सकते हैं.
- जरूरत पड़ने पर ट्रायल कोर्ट में पेश होंगे और जांच में सहयोग करेंगे.
- 10 लाख का बेड बॉन्ड भरना होगा.

1. केजरीवाल के सामने अभी भी मुश्किलें क्यों?

शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस सूर्यकांत ने केजरीवाल को नियमित जमानत देने का फैसला सुनाया. जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने उनके फैसले पर सहमति जताई. कोर्ट ने केजरीवाल को 10 लाख रुपये के मुचलके पर जमानत दी है. जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस उज्जवल भुइयां की बेंच ने CBI की गिरफ्तारी को नियमों के तहत बताया. जस्टिस सूर्यकांत का कहना था कि अगर कोई व्यक्ति पहले से हिरासत में है और जांच के सिलसिले में उसे दोबारा अरेस्ट करना गलत नहीं है. कोर्ट ने कहा, CBI ने नियमों का कोई उल्लंघन नहीं किया है. उन्हें जांच की जरूरत थी, इसलिए इस केस में अरेस्ट किया गया. इससे पहले केजरीवाल के वकील ने गिरफ्तारी पर सवाल उठाए थे और इसे अवैध ठहराया था. कोर्ट के इस निर्णय को केजरीवाल के लिए झटका माना जा रहा है. केजरीवाल अभी भी ट्रायल का हिस्सा रहेंगे और कानूनी दायरे में बने रहेंगे.

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2. सिर्फ चुनाव प्रचार तक ही सीमित रहेंगे केजरीवाल?

जमानत की शर्तें केजरीवाल के कामकाज में आड़े आएंगी और सरकार चलाने में मुश्किलें खड़ी करेंगी. दरअसल, जमानत की शर्तों के मुताबिक, केजरीवाल ना कोई नीतिगत फैसले ले सकते हैं और ना किसी सरकारी फाइल पर दस्तखत कर सकते हैं. सिर्फ चुनावी प्रचार तक ही सीमित रह सकते हैं. सरकार से जुड़े कोई फैसले की अनुमति नहीं है. ऐसे में जो उम्मीदें लगाई जा रही थीं कि बाहर आते ही बतौर मुख्यमंत्री केजरीवाल ताबड़तोड़ फैसले ले सकते हैं, वो परवान चढ़ते नहीं दिख रही हैं. खासतौर पर महिलाओं के लिए प्रति महीने 1000 रुपए की स्कीम अब तक लागू नहीं हो पाई है. ऐसी तमाम योजनाएं दिल्ली चुनाव से पहले धरातल पर लाने में दूर की कौड़ी साबित हो सकती हैं.

3. तो मुख्यमंत्री बने रहेंगे केजरीवाल?

हालांकि, यह तय है कि केजरीवाल ही मुख्यमंत्री बने रहेंगे. वो अपना पद नहीं छोड़ेंगे. क्योंकि, लंबा वक्त जेल में बिताने के बाद भी उन्होंने पद नहीं छोड़ा है तो अब दायित्व छोड़ने की उम्मीद भी कम ही है.

4. बीजेपी की मुहिम की निकल जाएगी हवा?

इसके अलावा, दिल्ली में अभी राष्ट्रपति शासन की सुगबुगाहट चल रही थी. दलील दी जा रही थी कि मुख्यमंत्री के जेल में बंद होने के कारण दिल्ली में कामकाज ठप पड़ा है. पिछले दिनों बीजेपी विधायकों ने राष्ट्रपति को अपना मांग पत्र सौंपा था और दिल्ली राष्ट्रपति शासन लागू करने की मांग की थी. राष्ट्रपति ने इस मांग पत्र को केंद्रीय गृह सचिव के पास विचार के लिए भेजा है. लेकिन केजरीवाल के बाहर आने के बाद बीजेपी के इस मुहिम की हवा निकल सकती है.

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5. केजरीवाल के बाहर आने से राहत क्या है?

केजरीवाल को दिल्ली वालों की नब्ज पहचानने में माहिर माना जाता है. यहां विधानसभा चुनाव से ठीक 4 महीने पहले केजरीवाल का बाहर आना दिल्ली की सियासत में सबसे ज्यादा हलचल लेकर आने वाला है. विपक्षी भी मानते आए हैं कि केजरीवाल के बाहर आने से आम आदमी पार्टी की ताकत कम से कम दिल्ली में तो दोगुनी हो ही जाती है.

6. संगठन बिखरने से बचाएंगे केजरीवाल?

केजरीवाल के बाहर आने से संगठन के लिए जरूर अच्छी खबर है. पार्टी में 6 महीने से चेहरे का संकट देखने को मिल रहा था. सुनीता केजरीवाल से लेकर मनीष सिसोदिया और संजय सिंह तक संगठन से जुड़े फैसले ले रहे थे. इससे पहले आतिशी, सौरभ भारद्वाज और सांसद संदीप पाठक को आगे किया गया था. पिछले कुछ दिनों से पार्टी को बड़े झटके लगे हैं. पूर्व मंत्री राजकुमार आनंद और राजेंद्र पाल गौतम जैसे बड़े नेताओं ने पार्टी का साथ छोड़ दिया है. राजकुमार, पटेलनगर से विधायक रहे हैं और वे बीजेपी में चले गए हैं. गौतम ने कांग्रेस जॉइन कर ली है. वे सीमापुरी से विधायक रहे हैं और केजरीवाल सरकार में मंत्री रहे. इसके अलावा, कई पार्षदों ने भी AAP का साथ छोड़ दिया है.

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7. सिसोदिया और बड़े नेताओं के रोल तय होंगे 

आबकारी नीति मामले में एक समय आम आदमी पार्टी का शीर्ष नेतृत्व लगभग पूरी तरह जेल के अंदर था, लेकिन मनीष सिसोदिया की जमानत के बाद जो राहत का सिलसिला शुरू हुआ, वो केजरीवाल के जेल से बाहर आने के साथ ही पूरा होने जा रहा है. गुजरात विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल करने के बाद संगठन विस्तार की चुनौती थी, लेकिन झटके के बाद झटकों ने इस महत्वाकांक्षी योजना पर ब्रेक लगा दिया था. अब केजरीवाल के बाहर आने पर कई अहम नेताओं को संगठन के भीतर नई जिम्मेदारियां दी जा सकतीं हैं ताकि पार्टी की गाड़ी दोबारा पटरी पर लौट सके. मनीष सिसोदिया यूं तो जेल से निकलने के बाद पूरी दिल्ली में पदयात्रा कर रहे हैं लेकिन उन्हें अभी ऐसी कोई औपचारिक जिम्मेदारी नहीं दी गई है. केजरीवाल अब फैसला कर पाएंगे कि सिसोदिया और बाकी वरिष्ठ नेता किस रोल में ज्यादा फिट बैठेंगे.

केजरीवाल मामले में सुप्रीम कोर्ट ने क्या-क्या कहा?

जस्टिस सूर्यकांत का कहना था कि तर्कों के आधार पर हमने 3 सवाल तैयार किए हैं. क्या गिरफ्तारी अवैध थी? क्या अपीलकर्ता को नियमित जमानत दी जानी चाहिए? क्या चार्जशीट दाखिल करना परिस्थितियों में इतना बदलाव है कि उसे ट्रायल कोर्ट में भेजा जा सके? सुप्रीम कोर्ट ने कहा, हिरासत में लिए गए व्यक्ति को गिरफ्तार करना कोई गलत बात नहीं है. हमने पाया है कि सीबीआई ने अपने आवेदन में उन कारणों को बताया है कि उन्हें क्यों ये जरूरी लगा. धारा 41ए (iii) का कोई उल्लंघन नहीं किया गया है. हमें इस तर्क में कोई दम नहीं लगता कि सीबीआई ने धारा 41ए सीआरपीसी का अनुपालन नहीं किया.

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यानी केजरीवाल को भले सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिल गई है, लेकिन उनकी गिरफ्तारी गलत नहीं थी और यह बात जांच एजेंसी ने कोर्ट में साबित करके केजरीवाल की मुश्किलें कम नहीं होने दीं. यही वजह है कि कोर्ट ने फैसले में जमानत की शर्तों को सख्त रखा है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा, अपीलकर्ता (केजरीवाल) इस केस के संबंध में सार्वजनिक रूप से कोई टिप्पणी नहीं करेगा. यानी बयानाजी से केजरीवाल को परहेज करना होगा. वरना ये अदालत की शर्तों का उल्लंघन माना जाएगा. इसके कोर्ट ने यह भी साफ किया कि ईडी मामले में जो शर्तें लगाई गई हैं, वो इस मामले में भी लागू होंगी. वो ट्रायल कोर्ट के साथ पूरा सहयोग करेंगे.

किस आधार पर मिली केजरीवाल को जमानत?

सुप्रीम कोर्ट का कहना था कि हमने जमानत पर विचार किया है. मुद्दा स्वतंत्रता का है. हमें लगता है कि इस केस का नतीजा जल्द निकलने की संभावना नहीं है. सबूतों और गवाहों से छेड़छाड़ को लेकर अभियोजन पक्ष की आशंकाओं पर विचार किया गया. उन्हें खारिज किया जाता है. हमने निष्कर्ष निकाला है कि अपीलकर्ता को जमानत दी जानी चाहिए.

वहीं, जस्टिस भुइयां का कहना था कि सीबीआई को ऐसी धारणा दूर करनी चाहिए कि वो पिंजरे में बंद तोता है, उसे दिखाना चाहिए कि वो पिंजरे में बंद तोता नहीं है. केजरीवाल के जांच में सहयोग नहीं करने का हवाला देकर सीबीआई गिरफ्तारी को उचित नहीं ठहरा सकती और हिरासत में नहीं रखे रह सकती. जब ईडी मामले में जमानत मिल गई है तो कस्टडी में रखना न्याय की दृष्टि से ठीक नहीं होगा.

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गिरफ्तारी की वैधता पर दोनों जजों में मतभेद

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के दोनों जजों ने सीबीआई द्वारा केजरीवाल की गिरफ्तारी की वैधता पर मतभेद जताया. जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, लंबे समय तक कारावास आजादी से अन्याय के बराबर है. लेकिन उन्होंने कहा कि केजरीवाल की गिरफ्तारी कानूनी थी और इसमें कोई प्रक्रियागत गड़बड़ी नहीं थी. हालांकि, जस्टिस उज्जल भुइयां का अलग मत था. उन्होंने कहा, सीबीआई द्वारा की गई गिरफ्तारी 'अनुचित' थी. जस्टिस भुइयां का कहना था कि ईडी मामले में जमानत मिलने के बावजूद गिरफ्तारी करना सवाल खड़े करती है. ये सिर्फ  जेल से रिहाई में बाधा डालने की कोशिश प्रतीत हो रही है. ईडी मामले में रिहाई के समय सीबीआई की जल्दबाजी समझ से परे है, जबकि 22 महीने तक उसने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया.

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने पांच सितंबर को केजरीवाल की याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित रख लिया था. सीबीआई ने इस मामले में केजरीवाल को 26 जून को गिरफ्तार किया था, उस समय केजरीवाल तिहाड़ जेल में बंद थे. इससे पहले ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में 21 मार्च को केजरीवाल को गिरफ्तार किया था. इसी शराब घोटाला मामले में आम आदमी पार्टी के दो बड़े नेता मनीष सिसोदिया और संजय सिंह भी लंबे समय तक तिहाड़ जेल में बंद रहे. फिलहाल दोनों नेता जमानत पर बाहर हैं.

केजरीवाल ने कोर्ट में दलील दी है कि उनके खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं मिले हैं. सिर्फ सरकारी गवाहों पर भरोसा कर उन्हें गिरफ्तार किया गया था. जबकि जांच एजेंसियां कह रही है कि केजरीवाल शराब घोटाले मामले के मुख्य साजिशकर्ता हैं, इसलिए उन्हें जमानत मिलने से जांच प्रभावित हो सकती है. सुप्रीम कोर्ट भी पिछले कई मामलों में दोहरा चुका है कि जमानत के नियम और हिरासत अपवाद है. केजरीवाल पर ईडी का आरोप है कि जिस शराब नीति से शराब कंपनियों और कुछ लोगों को फायदा पहुंचाकर घोटाला हुआ, उस नीति को ड्राफ्ट करने में केजरीवाल भी शामिल थे. ईडी के मुताबिक, केजरीवाल 2 तरीके से मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपी हैं. साथ ही ईडी मानती है कि केजरीवाल ने 100 करोड़ की मांग भी की थी. वहीं, आम आदमी पार्टी पर गोवा विधानसभा चुनाव में रिश्वत के 45 करोड़ रुपए से प्रचार का भी आरोप है.

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