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'पुलिस से पकड़वाकर वोट के लिए भेजें क्या?'...वोटिंग अनिवार्य करने की मांग वाली PIL पर सुनवाई से दिल्ली HC का इनकार

दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि वह किसी व्यक्ति को मतदान के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है. हम लॉ मेकर्स नहीं हैं. कानून नहीं बनाते हैं. इसलिए हम इस तरह के निर्देश पारित नहीं कर सकते. क्या संविधान में कोई प्रावधान है जो मतदान को अनिवार्य बनाता है?"

दिल्ली हाई कोर्ट (फाइल फोटो) दिल्ली हाई कोर्ट (फाइल फोटो)
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 17 मार्च 2023,
  • अपडेटेड 1:54 PM IST

दिल्ली हाई कोर्ट ने संसद और विधानसभा चुनावों में मतदान अनिवार्य करने के लिए केंद्र और चुनाव आयोग को निर्देश देने की मांग वाली जनहित याचिका पर विचार करने से शुक्रवार को इनकार कर दिया.  कोर्ट ने कहा हम किसी को मतदान के लिए मजबूर नहीं कर सकते.

'संविधान में ऐसा कोई प्रावधान नहीं'

अदालत ने कहा कि वह किसी व्यक्ति को मतदान के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है. हम लॉ मेकर्स नहीं हैं. कानून नहीं बनाते हैं. इसलिए हम इस तरह के निर्देश पारित नहीं कर सकते. क्या संविधान में कोई प्रावधान है जो मतदान को अनिवार्य बनाता है? मुख्य न्यायाधीश सतीश चंद्र शर्मा और न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद की पीठ ने कहा कि अदालत ने याचिकाकर्ता अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय को चेतावनी दी कि वह याचिका को जुर्माने के साथ खारिज कर देगी जिसके बाद उन्होंने इसे वापस ले लिया.

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'अनिवार्य मतदान मतदान प्रतिशत बढ़ाने में होगी मदद'

उपाध्याय ने जनहित याचिका दायर की थी, जिसमें कहा गया था कि अनिवार्य मतदान सुनिश्चित करेगा कि प्रत्येक नागरिक की आवाज हो, लोकतंत्र की गुणवत्ता में सुधार होगा और मतदान का अधिकार सुरक्षित रहे. याचिका में कहा गया है कि मतदान का कम प्रतिशत एक कान्सटेंट प्रॉब्लम है और अनिवार्य मतदान मतदान प्रतिशत बढ़ाने में मदद कर सकता है, खासकर वंचित समुदायों के बीच. 

'पुलिस से पकड़वाकर मतदान के लिए भेजेंगे क्या?'

सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ता ने ड्राइवरों का उदाहरण देते हुए कहा कि उनमें से कई लोग वोट डालने में सक्षम नहीं हैं क्योंकि उन्हें दूसरे शहरों में काम करना पड़ता है. जवाब में पीठ ने कहा कि यह उनका अधिकार और उनकी पसंद है. हम चेन्नई में मौजूद किसी व्यक्ति को श्रीनगर में अपने गृहनगर वापस आने और वहां मतदान करने के लिए मजबूर नहीं कर सकते. आप चाहते हैं कि हम पुलिस को उसे पकड़ने और श्रीनगर भेजने का निर्देश दें." कोर्ट ने चुनाव आयोग को याचिका को प्रतिनिधित्व के रूप में मानने का निर्देश देने से भी इनकार कर दिया.

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'लोगों की राजनीति में रुचि बढ़ेगी'

याचिका में कहा गया था, "जब मतदान अधिक होता है, तो सरकार लोगों के प्रति अधिक जवाबदेह होती है और उनके सर्वोत्तम हित में कार्य करने की अधिक संभावना होती है. अनिवार्य मतदान को नागरिक कर्तव्य बनाकर राजनीतिक भागीदारी को बढ़ावा दिया जा सकता है, और जब मतदान अनिवार्य होता है, तो लोगों की राजनीति में रुचि लेने और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में शामिल होने की संभावना अधिक होती है. यह मतदाता उदासीनता को दूर करने में मदद कर सकता है, जो भारत में एक महत्वपूर्ण समस्या है. बहुत से लोगों का राजनीतिक व्यवस्था से मोहभंग हो गया है और उन्हें लगता है कि उनके वोटों की गिनती नहीं है. याचिका में कहा गया है कि अनिवार्य मतदान लोकतांत्रिक प्रक्रिया में विश्वास बहाल करने और लोगों को राजनीति में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करने में मदद कर सकता है.

'सरकार की वैधता बढ़ेगी'

इसमें कहा गया है कि अनिवार्य मतदान सुनिश्चित करता है कि निर्वाचित प्रतिनिधियों को लोगों के एक बड़े और अधिक प्रतिनिधि समूह द्वारा चुना जाता है, जिससे सरकार की वैधता बढ़ेगी. याचिकाकर्ता ने कहा कि अनिवार्य मतदान ऑस्ट्रेलिया, बेल्जियम और ब्राजील जैसे देशों में सफलतापूर्वक लागू किया गया है और उन्होंने मतदान प्रतिशत में उल्लेखनीय वृद्धि देखी है. एक वैकल्पिक प्रार्थना के रूप में, याचिका में अदालत से आग्रह किया गया था कि वह चुनाव आयोग को संसद और राज्य विधानसभाओं के चुनावों में मतदाताओं के मतदान को बढ़ाने के लिए अपनी पूर्ण संवैधानिक शक्ति का उपयोग करने का निर्देश दे. इसने अनिवार्य मतदान पर एक रिपोर्ट तैयार करने के लिए विधि आयोग को निर्देश देने की भी मांग की थी.

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