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यमुना के रिकॉर्डतोड़ जलस्तर के बाद दिल्ली के कई इलाकों में बाढ़ का पानी घुस आया है. लोगों में अफरातफरी का माहौल है. ऐसे में सन 1978 में राजधानी में आई भीषण बाढ़ का मंजर याद करके उसके सर्वाइवर आज भी सिहर उठते हैं. इनमें से एक हैं दिल्ली के मॉडल टाउन निवासी इंद्रजीत बरनाला, जो उस समय को याद करके आज भी घबरा जाते हैं.
ये वो समय था जब राष्ट्रीय राजधानी में 100 वर्षों बाद इतनी भयंकर बाढ़ आई थी. उस समय शहर आपातकाल की स्थिति में था. टेलीफोन लाइनें बंद थीं. यमुना के ऊपर सभी पुल बंद कर दिए गए थे और बाढ़ग्रस्त इलाकों में सेना तैनात कर दी गई थी. बाढ़ के खतरे को देखते हुए दिल्ली के महारानी बाग, न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी, जामिया मिल्लिया और ओखला समेत कई इलाकों में रहने वाले लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने की सलाह दी गई थी. देश की राजधानी दिल्ली से 227 किमी दूर हरियाणा का हथिनीकुंड बैराज से तब करीब 7 लाख क्यूसेक पानी छोड़ा गया था.
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ग्राउंड फ्लोर तक भर गया था पानीइंद्रजीत ने आजतक से बातचीत करते हुए बताया कि 1978 में पैनिक फैला हुआ था. शाम को पता चला कि मॉडल टाउन में बाढ़ आएगी. उस समय सरकारी की तरफ से वार्निंग आई थी. हम लोग सारी रात जागते रहे और रात के 1:00 बजे सीवर से पानी निकलने की आवाज आने लगी. करीब आधा घंटा ही हुआ होगा कि ग्राउंड फ्लोर तक पानी भर गया.
'तीन दिनतक बिना खाए पिए रहे'
उन्होंने बताया कि भाई की मॉडल टाउन सैकंड में दुकान थी, जिसे बंद करने लगे तो इतना पानी का सैलाब आ गया कि शटर बंद नहीं हुआ और गले तक पानी आ पहुंचा. हमने सोचा हम तो गए आज. फिर दीवारों से सटकर किसी तरह पहली मंजिल पर पहुंचे. तीन दिन तक बिना खाए पिए छत पर ही रहे. इसके बाद हेलीकॉप्टर से रोटी और खाने के पैकेट गिराए गए. यहां से हमें बोट के जरिए रेस्क्यू किया गया. अगले दिन हमने अच्छे से लंच किया और फिर किसी तरह वापस लौटे.
उन्होंने बताया कि अब एक बार फिर दिल्ली के हालात को देखते हुए हमने अपना सामान पैक कर लिया है. हम पश्चिम विहार में अपनी बिटिया के पास जाने की तैयारी में हैं, क्योंकि आज दिल्ली के सिविल लाइन तक पानी पहुंच चुका है और मॉडल टाउन में पहुंचने का खतरा बना हुआ है. अगर हथिनी कुंड से पानी छोड़ा गया तो डूबने का खतरा बना हुआ था.
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इस बार पुस्ते की वजह से नहीं डूबे दिल्ली के गांव
नंबरदार ब्रह्मप्रकाश उस वक्त करीब 35 साल के थे. वो बताते हैं कि 1978 में आई बाढ़ से दिल्ली के अधिकांश इलाके डूब गए थे. तब बुराड़ी, मोहमदपुर, हिरणकी, फतेहपुर, सुंगरपुर, पल्ला, तिगीपुर, भख्तावरपुर, माजरा, हिरंकी और पल्ला गांवों में भी पानी भर गया था. साथ ही सारी खेती भी डूब गई थी. लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ. इसका मुख्य कारण है पुस्ता बांध. ये पुस्ता दिल्ली बुराड़ी से शुरू होकर हरियाणा की तरफ जाता है. इस पुस्ते के चलते ही इस बार इन गांवों में पानी नहीं भरा है, हालांकि इनके डूब क्षेत्र में स्थित खेत पानी से लबालब हैं.
हजारों वर्ग किलोमीटर खरीफ फसल हुई थी बर्बाद
1978 में बाहरी दिल्ली की 40 हजार वर्ग किलोमीटर (वर्ग किमी) से अधिक कृषि भूमि करीब दो मीटर तक पानी में डूब गई थी. बाढ़ ने खरीफ की फसल को पूरी तरह बर्बाद कर दिया था. वहीं आवसीय संपत्ती से लेकर बाजारों तक को काफी नुकसान हुआ था. वहीं सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 18 लोगों की जान गई थी और नुकसान का आंकलन 10 करोड़ था. इस बाढ़ के कारण लाखों लोग बेघर हुए थे.
हवाई मार्ग से पहुंचाई गई थी राहत
तब की इंदिरा गांधी सरकार ने दिल्ली सरकार को हर संभव मदद मुहैया कराने का आश्वासन दिया था. बाढ़ पीड़ितों के लिए शरणार्थी शिविरों की व्यवस्था की गई,. लेकिन शिविरों में पीने के पानी की कमी एक गंभीर समस्या बनी रही. इसके अलावा बाढ़ ग्रस्त गांवों में हवाई मार्ग से खाने-पीने की आपूर्ति की जा रही थी. लोगों तक राहत सामग्री पहुंचाने का एकमात्र रास्ता हवाई मार्ग था. पॉलिथीन की पैकिंग में सामान पैक करके जहाजों से ही फेंका जा रहा था. इसके लिए बकायदा वायुसेना की मदद ली गई.
इस साल टूटा 1978 का रिकॉर्ड
1978 में यमुना में 207.49 मीटर पानी होने के बाद बाढ़ आ गई थी. लोग दिल्ली में विस्थापित होने के लिए मजबूर हुए थे. अब 45 वर्ष का पुराना रिकॉर्ड तोड़कर यमुना का जलस्तर 208 मीटर का आंकड़ा पार कर चुका है. दिल्ली में अबतक साढ़े 16 हजार लोगों को रेस्क्यू करके सुरक्षित जगहों पर पहुंचाया गया है. हाथिनीकुंड बराज से लगातार पानी छोड़े जाने के कारण दिल्ली में यमुना का जलस्तर बढ़ रहा है, जिसके चलते दिल्ली पर भीषण बाढ़ का खतरा मंडरा रहा है.