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गुजरात चुनाव...आदिवासी वौटबैंक और राजनीति, जानिए क्यों रद्द करना पड़ा तापी-नर्मदा लिंक प्रोजेक्ट

गुजरात चुनाव को देखते हुए राज्य की बीजेपी सरकार ने तापी-नर्मदा लिंक प्रोजेक्ट को रद्द कर दिया है. आदिवासी समुदाय के लगातार विरोध करने के बाद सरकार ने ये फैसला किया है.

सीएम भूपेंद्र पटेल सीएम भूपेंद्र पटेल
गोपी घांघर
  • अहमदाबाद,
  • 22 मई 2022,
  • अपडेटेड 7:23 AM IST
  • 27 सीटों पर असर रखते आदिवासी वोट
  • बीजेपी ने 150 प्लस सीटों का रखा लक्ष्य

इस साल के आखिर में गुजरात विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं. बीजेपी के लिए आदिवासी वोटबैंक काफी निर्णायक साबित होने वाला है क्योंकि पिछले चुनावों में इस वर्ग का पार्टी को ज्यादा समर्थन नहीं मिला. अब इसी वजह से गुजरात सरकार ने तापी-नर्मदा लिंक प्रोजेक्ट को भी रद्द कर दिया है. ये योजना केंद्र की थी लेकिन चुनाव को देखते हुए राज्य सरकार की तरफ से इसे रद्द करने का फैसला लिया गया.

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शनिवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेस कर मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने इस बात का ऐलान किया. उनकी नजरों में गुजरात सरकार हमेशा से आदिवासियों के साथ खड़ी है और इस परियोजना को लेकर भी विपक्ष द्वारा तरह-तरह की भ्रांतियां फैलाई जा रही थीं.

क्यों हो रहा था प्रोजेक्ट का विरोध?

इस प्रोजेक्ट की बात करें तो इसके जरिए सौराष्ट्र और कच्छ के पानी की कमी वाले क्षेत्रों में पानी भेजा जाना था. लेकिन आदिवासी समुदाय इस योजना का लंबे समय से विरोध कर रहा था. उनकी नजरों में इस एक योजना की वजह से कई आदिवासी विस्थापित हो जाएंगे. इसके अलावा ये भी दावा हुआ कि इस प्रोजेक्ट की वजह से 60 से ज्यादा गांव पानी में डूब जाएंगे. इन्हीं सब कारणों को लेकर आदिवासी समुदाय में रोष था और राज्य सरकार पर इस प्रोजेक्ट को वापस लेने का दवाब.

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अब चुनावी गणित के लिहाज से देखें तो गुजरात में आदिवासी वोटबैंक काफी मायने रखता है. माना जाता है कि 180 में से कम से कम 27 सीटों पर ये आदिवासी समुदाय ही जीत-हार तय कर जाता है. 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को अच्छा खासा आदिवासी वोट मिला था, ये अलग बात रही कि बाद में कई कांग्रेस विधायक पाला बदलकर बीजेपी में शामिल हो गए, कुछ तो अभी भूपेंद्र सरकार में मंत्री भी बनाए गए हैं.

आदिवासी समुदाय पर बीजेपी का फोकस

ऐसे में इस बार बीजेपी की तरफ से 150 प्लस का लक्ष्य निर्धारित किया गया है. पिछली बार भी ऐसा ही कुछ गोल था, लेकिन इस बार पार्टी अलग रणनीति पर काम कर रही है. इसी रणनीति में आदिवासी समुदाय को खासा तवज्जो मिल रही है. बीजेपी पीने का पानी, प्राथमिक शिक्षा और जल जंगल और ज़मीन जैसे मुद्दों को उठाकर आदिवासी समुदाय को अपने पक्ष में लाना चाहती है.

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