
राजे-महाराजाओं के महल जितने भव्य लगते हैं, उनके भीतर रहस्य भी उससे कम नहीं हैं. अपने दौर में लगभग हर सुल्तान या राजा रहस्यों की पोटली समेटे रहा. जिसके पास जितनी ताकत, उसके रहस्य और खासकर सनक उतनी ही ज्यादा रही. गुजरात के महमूद शाह का नाम इस लिस्ट में काफी ऊपर है. महमूद बेगड़ा के नाम से मशहूर इस शासक के बारे में कहते हैं कि वो 30 किलो भोजन के बाद ऊपर से थोड़ी जहर भी खाता ताकि दुनिया का हर विष उसपर बेकार हो जाए.
किताबों में है सनकी सुल्तान की बात
गुजरात सल्तनत पर खूब तसल्ली से लिखी गई पर्शियन किताब मिरात-ए-सिकंदरी और मिरात-ए-अहमदी में राज्य के कई शासकों के साथ-साथ महमूद बेगड़ा का भी जिक्र है. बेगड़ा यानी जिसके पास दो-दो गढ़ हों. खुद को जमीन और समंदर दोनों का राजा मानने वाले महमूद ने साल 1458 के आसपास जूनागढ़ का राज्य संभाला. इससे पहले ये इलाका राजपूताना कब्जे में था.
खाने के जहर भी लेता था
कम उम्र में राज संभालते हुए भी महमूद को राजमहल के सारे दांव-पेंच मालूम थे. वो जानता था कि उससे पहले खानदान के कई सुल्तानों या संभावित सुल्तानों की मौत जहर से हुई है. तो बेगड़ा ने खुद ही अपने खाने के साथ थोड़ी खुराक जहर की लेनी शुरू कर दी. ऐसा हुआ भी होगा. किताबों के अलावा उस समय में गुजरात आने वाले व्यापारियों ने भी इसका जिक्र किया है.
इटली के व्यापारी बार्थेमा (लुकोविडो दी वर्थेमा) ने अपनी चिट्ठियों में बेगड़ा की भारी-भरकम डायट और जहर के बारे में लिखा है. इसके अनुसार महमूद की थूक में भी इतना जहर था कि अगर उसपर गलती से मक्खियां बैठ जाएं तो उनकी वहीं मौत हो जाती थी. या वह किसी पर थूक दे, तो उसकी मौत हो जाती.
आम था जहर लेना
ये चलन वैसे बेगड़ा के ही घराने में नहीं, बल्कि कई जगहों पर था. राजा अपने आपको इम्यून करने के लिए जहर की थोड़ी-थोड़ी खुराक लिया करते, ताकि एक समय के बाद उनपर किसी तरह के विष का असर न हो. उस समय में खाने में जहर देकर या जहरबुझे तीर से मारने के बहुतेरे किस्से हैं.
सुल्तान रोज जितना खाना खाता था उसका वजन लगभग 30 किलोग्राम होगा. इसमें बड़ा हिस्सा गोश्त और मिठाई का होता. ये भी कि खाने के बेहद शौकीन सुल्तान के आसपास हमेशा कोई न कोई व्यंजन रखा होता, यहां तक कि रात में भी ताकि नींद खुलने पर वो अपना पेट भर सके. हो सकता है कि इस बात का कुछ हिस्सा बढ़ा-चढ़ाकर भी लिखा गया हो लेकिन कहीं न कहीं कुछ सच्चाई होगी, इससे इनकार नहीं किया जा सकता.
पर्शियन लेखकों के अलावा इटली के इस सैलानी की चिट्ठियों को भी बाद में किताब की शक्ल दी गई. ट्रैवल्स ऑफ लुकोविडो दी वर्थेमा में भी जूनागढ़ के इस शासक के किस्से हैं.
सुल्तान का एक और शौक भी था, वो था रेशमी मूंछों का
अपनी भयंकर भूख की वजह वो अपनी मूंछों को बताता. इस राजा की मूंछें बारीक होने के बावजूद इतनी लंबी थीं कि कई बार वो मुकुट की जगह इसे ही सिर पर बांधकर दरबार पहुंच जाता. यहां तक कि उसकी दाढ़ी भी कुछ कम कमाल नहीं थी. वो भी हमेशा लंबी और नीचे से संवरी हुई रहती. दाढ़ी-मूंछ पसंद करने वाले इस सुल्तान के दरबारी भी वही थे, जिनके पास लंबी-लहराती मूंछें हों. हरेक दरबारी को लंबी मूंछ रखने का आदेश था, लेकिन सुल्तान से कम.
अपने मजहब को फैलाने की थी सनक
महमूद को अपने समय के सबसे ताकतवर सुल्तानों में गिना जाता है, जो उतना ही क्रूर भी था. लगभग 15 साल की उम्र में गद्दी संभालने के बाद इसने पावागढ़ पर भी कब्जा कर लिया और इसके बाद भी सीमाएं बढ़ाने की इसकी भूख खत्म नहीं हुई. ये लगातार आसपास आतंक मचाए रखता. किसी एक इलाके को जीतने के बाद ये उसे यूं ही नहीं छोड़ता था, बल्कि धर्म-परिवर्तन पर जोर देता था. यहां तक कि दूसरे धर्मस्थलों को खत्म कर देता ताकि धर्म की निशानी ही न बचे.
चांपानेर के राजा से बदसलूकी
मिरआत-ए-सिकंदरी में उल्लेख है कि चांपानेर में कई बार हारने पर बौखलाए महमूद ने पूरी तैयारी के साथ एक बार फिर हमला किया. लंबे युद्ध के बाद साल 1484 में वहां के राजा रावल को बंदी बना लिया गया. पांच महीनों की कैद के दौरान महमूद लगातार उनसे अपना धर्म कबूलने की बात करता रहा, और राजा लगातार इनकार करता रहा. आखिरकार चांपानेर के राजा को मार दिया गया. रानियां पहले ही जौहर कर चुकी थीं. बाकी था एक पुत्र, जिसके बारे में कहा जाता है कि महमूद ने उसे किसी कट्टर मुस्लिम के यहां रख छोड़ा. लेकिन पुत्र का आगे क्या हुआ, इस बारे में कहीं कोई जानकारी नहीं मिलती.
जीत के बाद महमूद ने चांपानेर में दूसरे धर्मस्थलों को तबाह कर दिया. यहां तक कि पावागढ़ पहाड़ी पर सिद्ध-शक्ति पीठ को भी नष्ट कर दिया गया. हालांकि लोगों की आस्था कम नहीं हो सकी. बता दें कि ये वही मंदिर है, बीते साल जून में जहां पूरे 5 सौ सालों बाद मां काली की ध्वजा फहराई गई.