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हरियाणा क्यों NDA के लिए बना है सियासी कुरुक्षेत्र, 5 प्वाइंट्स में समझें

हरियाणा में बीजेपी के लिए राजनीतिक चुनौतियां लगातार बढ़ती जा रही है. एक तरफ बीजेपी और जेजेपी के बीच सियासी टकराव जारी है तो दूसरी तरफ किसान से लेकर पहलवान तक नाराज हैं. कांग्रेस लोकलुभावने वादे करके बीजेपी के लिए और भी मुश्किलें खड़ी कर रही है. ऐसे में बीजेपी 2024 में कैसे पार पाएगी?

दुष्यंत चौटाला, जेपी नड्डा, अमित शाह, मनोहर लाल खट्टर, अनुराग ठाकुर दुष्यंत चौटाला, जेपी नड्डा, अमित शाह, मनोहर लाल खट्टर, अनुराग ठाकुर
कुबूल अहमद
  • नई दिल्ली ,
  • 07 जून 2023,
  • अपडेटेड 2:59 PM IST

हरियाणा में अगले साल लोकसभा और विधानसभा चुनाव होने हैं, जिसे लेकर राजनीतिक बिसात बिछाई जाने लगी है. सूबे में चुनावी तपिश जैसे-जैसे बढ़ती जा रही है, वैसे-वैसे बीजेपी के लिए सियासी चुनौतियां भी बढ़ती जा रही है. पहलवान से लेकर किसान तक आंदोलित हैं और खाप पंचायतों की नाराजगी भी बढ़ती जा रही है. बीजेपी और जेजेपी के रिश्ते भी बिगड़ने लगे हैं. इस तरह हरियाणा की सियासी जमीन बीजेपी के लिए 'कुरक्षेत्र' में तब्दील होती जा रही है.

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कुरुक्षेत्र में किसानों पर लाठीचार्ज

हरियाणा में सूरजमुखी की खरीद को लेकर किसान नाराज हैं. मंगलवार को कुरुक्षेत्र में दिल्ली-चंडीगढ़ नेशनल हाईवे जाम लगाने पर किसानों पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया. पहले वाटर कैनन से पानी की बौछारें छोड़ी गई, फिर बल प्रयोग कर हाईवे खाली करवा दिया गया. लाठीचार्ज में कई किसान घायल हो गए हैं तो वहीं करीब 40 से ज्यादा किसानों को पुलिस ने हिरासत में भी लिया. इस घटना के बाद किसानों की नाराजगी और भी ज्यादा बढ़ गई है. यह बीजेपी के लिए सिरदर्द बन सकती है, क्योंकि कांग्रेस इसे लेकर मुखर हो गई है.

कांग्रेस नेता और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने कुरुक्षेत्र में किसानों पर हुए लाठीचार्ज की घटना की निंदा करते हुए कहा कि क्या एमएसपी की मांग करना गुनाह है? 6400 रुपये एमएसपी की फसल 4 हजार से 5 हजार रुपये में किसान बेचने को मजबूर हैं. उन्होंने मांग की है कि गिरफ्तार किसानों को तुरंत रिहा किया जाए और एमएसपी पर सूरजमुखी की खरीद शुरू की जाए. वहीं, मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने कहा कि सूरजमुखी की खरीद के पुख्ता प्रबंध किए गए हैं. किसानों का किसी प्रकार की परेशानी नहीं आने दी जाएगी और सरकार किसानों के साथ मजबूती के साथ खड़ी है. 

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पांच प्वाइंट में समझें कि हरियाणा में बीजेपी किसी तरह की सियासी चक्रव्यूह में घिरती जा रही है? 

1. किसानों की बढ़ती नाराजगी
हरियाणा की सियासत में किसान अहम फैक्टर है, जो किसी भी दल का खेल बनाने और बिगाड़ने की ताकत रखते हैं. ऐसे में किसानों की नाराजगी बीजेपी के लिए आगामी चुनाव में महंगी पड़ सकती है. कृषि कानून को लेकर पहले से ही किसान नाराज थे और अब सुरजमुखी की फसल की एमएसपी पर खरीद न होने के लेकर सड़क पर उतर गए हैं. ऐसे में पुलिस के द्वारा लाठीचार्ज किए जाने से किसानों की नाराजगी और भी बढ़ सकती है. कांग्रेस खुद को किसान परस्त और बीजेपी को किसान विरोधी कठघरे में खड़े करने की कोशिश कर रही है. ऐसे में बीजेपी के लिए किसानों की नाराजगी आगामी चुनाव में उठाना पड़ सकती है, क्योंकि किसान लगातार खट्टर सरकार के खिलाफ गुस्से में है और सड़क पर उतरकर प्रदर्शन कर रहे हैं.  

2. पहलवान आंदोलन 
भारतीय कुश्ती महासंघ के प्रमुख और बीजेपी सांसद बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर पहलवान एक महीने से अधिक समय से प्रदर्शन कर रहे हैं. पहलवान उन्हें गिरफ्तार करने की मांग कर रहे हैं. जंतर-मंतर से भले ही पहलवानों को उठा दिया गया हो, लेकिन अभी भी अपनी मांग को जारी रखे हुए हैं. इनमें ज्यादातर पहलवान हरियाणा के हैं, जिनमें साक्षी फोगाट, विनाश फोगाट और बजरंग पुनिया जैसे पहलवान शामिल हैं. 

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बृजभूषण सिंह की गिरफ्तारी न होने से मामला सियासी रंग भी ले रहा है. विपक्षी दल खुलकर कहने लगे हैं कि बीजेपी में होने के चलते ही बृजभूषण के खिलाफ कोई एक्शन नहीं हो रहा है. ऐसे में महिला पहलवानों के पक्ष में हरियाणा की खाप पंचायतें भी खुलकर खड़ी हो गई है. यह मामला अब जितने दिनों तक खिचेंगा, उतना ही बीजेपी और खट्टर सरकार के लिए हरियाणा की सियासत में मुश्किलें बढ़ाएगा. 

3. बीजेपी-जेजेपी के रिश्ते में कड़वाहट
हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर की नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार जेजेपी के समर्थन से चल रही है. 2019 के विधानसभा चुनाव के बाद दोनों पार्टियां साथ आई थी, लेकिन अब उनके बीच कड़वाहट पैदा होने लगी है. एक तरफ बीजेपी नेता अकेले दम पर चुनाव में जाने की बात कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ जेजेपी दुष्यंत चौटाला को अगले चुनाव में मुख्यमंत्री का चेहरा बता रही है. इसके अलावा उचाना विधानसभा सीट को लेकर बीजेपी और जेजेपी आमने-सामने आ गई है. दोनों ही दल चुनाव लड़ने की दावेदारी कर रहे हैं. इस तरह हरियाणा में एनडीए से जेजेपी अलग होने की राह पर खड़ी नजर आ रही है. 

चौधरी बीरेंद्र सिंह का परिवार और दुष्यंत चौटाला का परिवार तो वार-पलटवार कर ही रहा था, लेकिन इस मामले ने तूल तब पकड़ लिया, जब हरियाणा बीजेपी प्रभारी बिप्लव कुमार देब ने अगले विधानसभा चुनाव में उचाना कलां से बीजेपी की प्रेमलता को अगला विधायक बता दिया, जो बीरेंद्र सिंह की पत्नी हैं. मौजूदा समय में उचाना से दुष्यंत चौटाला विधायक हैं, जो हरियाणा सरकार में डिप्टी सीएम हैं. इसे लेकर हरियाणा में जेजेपी और बीजेपी के बीच जिस तरह से बयानबाजी हो रही है, उसके चलते साफ है कि 2024 का लोकसभा-विधानसभा का चुनाव दोनों साथ नहीं लड़ेंगे. ऐसा होता है कि तो बीजेपी और जेजेपी दोनों के लिए सियासी चुनौतियों का सामना करना होगा. 

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4. बीजेपी का बिगड़ता समीकरण 
हरियाणा में बीजेपी का सियासी समीकरण बिगड़ता जा रहा है. राज्य में करीब 28 फीसदी जाट समाज है, जो किसी भी राजनीतिक दल का खेल बनाने और बिगाड़ने की ताकत रखता है. हरियाणा के 10 जिलों की 30 से 35 विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जहां जाट मतदाता पूरी तरह से निर्णायक हैं. छह लोकसभा सीटों पर जाट वोटर्स हैं. हरियाणा में बीजेपी के पास ऐसा कोई जाट नेता नहीं है जो कांग्रेस के भूपेंद्र सिंह हुड्डा के सियासी कद का हो. कांग्रेस ने भूपेंद्र हुड्डा और उनके बेटे दीपेंद्र हुड्डा को पूरी खुली छूट दे रखी है, जिसके चलते जाट समुदाय का भरोसा कांग्रेस के साथ दिख रहा है. मुस्लिम मतदाता भी कांग्रेस के साथ खड़े नजर आ रहे हैं तो दलितों को साधने की कांग्रेस लगातार कवायद कर रही है. ये तीनों समुदाय कांग्रेस के पक्ष में एकजुट हुआ तो बीजेपी के लिए राजनीतिक चुनौती खड़ी हो जाएगी. 

5. कांग्रेस के छह लोकलुभावन वादे 
हरियाणा में अगले साल लोकसभा और उसके बाद विधानसभा चुनाव होने हैं, लेकिन कांग्रेस ने अभी से ही वादों की घोषणा करनी शुरू कर दी है. कांग्रेस ने राज्य में पुरानी पेंशन योजना बहाल करने के साथ-साथ सभी को घरेलू गैस 500 रुपये प्रति सिलेंडर देने का घोषणा की है. इसके अलावा हरियाणा में 300 यूनिट तक मुफ़्त बिजली, दो लाख ख़ाली पड़े सरकारी पद पर भर्ती, गरीब परिवारों को 100-100 गज मुफ़्त प्लॉट, बुढ़ापा पेंशन 6000 रुपये, किसानों को एमएसपी की गारंटी और खिलाड़ियों के लिए पदक लाओ, पद पाओ का वादा किया है. कांग्रेस इन्हीं लोकलुभावन वादों के दम पर हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक की चुनावी जंग जीत चुकी है और दोनों ही राज्यों में बीजेपी के हाथों से उसने सत्ता छीनी है. हरियाणा में इसी एजेंडे पर कांग्रेस आगे बढ़ रही है, जो बीजेपी के लिए सियासी चुनौती बन सकता है. 

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