
जाटलैंड हरियाणा में बीजेपी ने एक बार फिर जीत का परचम लहरा दिया है. इस हैट्रिक से पार्टी का उत्साह बढ़ा हुआ है लेकिन यहां कांग्रेस से मिल रही कड़ी टक्कर के बावजूद बीजेपी ने हाथ से निकली हुई बाजी किस तरह पलट दी. इस पर गौर करना काफी रोचक है. आखिर वे कौन से फैक्टर्स थे, जिनकी वजह से बीजेपी हरियाणा की पॉलिटिकल जलेबी का स्वाद चखने में कामयाब रही.
बीजेपी एक बेहद सधी हुई स्ट्रैटेजी के साथ चुनाव में उतरी थी. पार्टी ने अपना वोट बेस मजबूत करने से लेकर वोकल फॉर लोकल और स्थानीय मुद्दों पर फोकस कर अपनी जीत पर मुहर लगाई है. हरियाणा चुनाव में बीजेपी का पूरा प्रचार भ्रष्टाचार मुक्त सरकार, रोजगार के अवसर और किसानों के लिए लाभप्रद योजनाओं के आसपास रहा. बीजेपी की पारदर्शी रोजगार से संबंधित नीतियों का फायदा भी बीजेपी को मिला है.
बीजेपी की जीत में RSS भी बड़ा फैक्टर!
बीजेपी ने सधी हुई रणनीति के साथ ग्रामीण क्षेत्रों पर फोकस किया. इसके लए बीजेपी ने आरएसएस की मदद ली. लोकसभा चुनाव के दौरान आरएसएस के कार्यकर्ता कथित तौर पर बीजेपी से खुश नहीं थे लेकिन आरएसएस ने हरियाणा चुनाव के दौरान ऐसे समय में सक्रिय भूमिका निभाई, जब बीजेपी को मदद की सबसे अधिक जरूरत थी. बीजेपी के लिए यहां आरएसएस ने जमीनी स्तर पर काम किया. ऐसे में कहा जा सकता है कि हरियाणा में बीजेपी की दमदार परफॉर्मेंस में आरएसएस की बड़ी भूमिका रही है.
हरियाणा की सत्ता में दस साल तक रहने के बावजूद बीजेपी का वोट शेयर कांग्रेस के 39.1 फीसदी की तुलना में 40 फीसदी है. लेकिन विपक्षी वोटों में टूट से बीजेपी को फायदा हुआ, खासकर असंध, पुंडरी, अंबाला कैंट और अन्य सीटों पर बीजेपी को फायदा हुआ है.
कांग्रेस का ओवरकॉन्फिडेंस बीजेपी के लिए बना संजीवनी
कांग्रेस का अतिआत्मविश्वास भी बीजेपी के लिए फायदेमंद हुआ. भूपेंद्र सिंह हुड्डा और कुमारी सैलजा जैसे नेताओं ने प्रचार करने की तुलना में मुख्यमंत्री पद के लिए दिल्ली में लॉबिंग करने में अधिक समय लगाया. राहुल गांधी ने हरियाणा में सिर्फ आठ जनसभाएं की जबकि प्रियंका गांधी यहां दो दिन ही रुकी थीं. इससे अंदाजा लगाया जा रहा है कि कांग्रेस को शुरुआत से ही लग रहा था कि उनकी पार्टी आसानी से हरियाणा जीत लेगी. इस वजह से पार्टी ने प्रचार को गंभीरता से नहीं लिया.
बीजेपी को विपक्षी खेमे की असंतुष्टतता विशेष रूप से कांग्रेस की अंदरूनी कलह का भी फायदा मिला. पार्टी की बड़ी दलित नेता कुमारी सैलजा को दरकिनार करने को भी पार्टी ने खूब भुनाया. राहुल गांधी की सक्रियता के बावजूद आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन नहीं हो पाने से भी बीजेपी को फायदा पहुंचा.
बीजेपी ने गैर जाटों पर बढ़ाया फोकस
कांग्रेस का पूरा फोकस जाट वोटर्स पर था, जिस वजह से अन्य समुदायों पर उनका ध्यान नहीं गया. लेकिन बीजेपी ने यह गलती नहीं की. इस बार के चुनाव में गैर जाट वोटों की बड़ी भूमिका है. इस बार के नतीजों में दलित वोट बंटे हुए थे. राज्य में दलितों की 22.5 फीसदी की आबादी में से सिर्फ 8.5 फीसदी के ही वोट बीजेपी, कांग्रेस और अन्य पार्टियों में बंटे नजर आए. दलितों में 14 फीसदी की आबादी वाले डिप्राइव्ड शेड्यूल कास्ट (डीएससी) ने बड़े पैमाने पर बीजेपी को वोट किया.
इस बार चुनावी मैदान में बीजेपी ने 14 जाट उम्मीदवारों को टिकट दिया था. पार्टी का फोकस ओबीसी, ब्राह्मण और पंजाबियों जैसे ऊंची जाति वाले उम्मीदवारों पर था. पार्टी की इस स्ट्रैटेजी से बीजेपी को मजबूती मिली. इसके अलावा चुनाव से कुछ दिन पहले राम रहीम को पैरोल दिए जाने का भी बीजेपी को लाभ मिला.
इसके अलावा सैनी फैक्टर भी बीजेपी के लिए फायदेमंद रहा. हरियाणा के मुख्यमंत्री पद पर मनोहर लाल खट्टर के बजाए नायब सिंह सैनी को बैठाने से भी पार्टी को लाभ हुआ. सैनी ओबीसी नेता हैं.