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3 करोड़ में बिकी 16वीं सदी की पेंटिंग... खरीदने वालों ने इसमें क्या खासियत देखी? जानें पूरी कहानी

Himachal Pradesh: मंडी कलम की चार प्राचीन पेंटिंग्स ने मुंबई के नीलामी घर में इतिहास रच दिया. ये पेंटिंग्स सदियों पुरानी कला और संस्कृति को दर्शाती हैं. इनमें सबसे महंगी पेंटिंग 3 करोड़ रुपये में बिकी, जिसमें 16वीं सदी की राजसी महिलाओं को दर्शाया गया है. वहीं दूसरी पेंटिंग में मंडी शहर के गंधर्व जंगल वाले क्षेत्र को दर्शाया गया है, यह 85 लाख रुपये में खरीदी गई.

करोड़ों में बिकी मंडी कलम की पेंटिंग. (Screengrab) करोड़ों में बिकी मंडी कलम की पेंटिंग. (Screengrab)
aajtak.in
  • मंडी,
  • 03 जनवरी 2025,
  • अपडेटेड 10:52 AM IST

देश की सांस्कृतिक राजधानी छोटी काशी कही जाने वाली मंडी की सदियों पुरानी पेंटिग्स 4 करोड़ 98 लाख में नीलामी हुई हैं. यह नीलामी मुंबई के पुंडोल्स स्थित नीलामी घर में 15 नवंबर 2024 को हुई. मंडी कलम की पेंटिंग्स सदियों पुरानी हैं और मौजूदा समय में किसी संग्रहालय के अधीन थीं. संग्रहालय के माध्यम से इन पेंटिंग्स को नीलामी के लिए रखा गया. मंडी कलम की एक पेंटिंग 3 करोड़ में बिकी है, जो 16वीं सदी की है. इसमें राजसी महिलाओं को चित्रित किया गया है. दूसरी पेंटिंग 85 लाख में बिकी, जो कि 18वीं सदी की है और इसमें मंडी शहर के गंधर्व जंगल वाले क्षेत्र को चित्रित किया गया है.

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इसके अलावा तीसरी पेंटिंग 80 लाख में बिकी है, जिसमें मंडी में मनाई जाने वाली होली को चित्रित किया गया है. यह पेंटिंग भी 18वीं सदी की है. वहीं चौथी पेंटिंग 28 लाख में बिकी है. इसमें एक राजकुमार और महिला को पेड़ के पास खड़ा दिखाया गया है. यह पेंटिंग 17वीं सदी की है.

वहीं पांचवीं पेंटिग मंडी के तत्कालीन राजा सिद्धसेन की है, जो 5 लाख 50 हजार रुपये में बिकी है. यह पेंटिग 18वीं सदी की है. कहा जाता है कि राजा सिद्धसेन के समय में मंडी कलम की यह शैली खूब फली फूली. उनके समय में 40 कलाकार इस शैली पर पेंटिग किया करते थे.

मंडी की प्राचीन कला का सम्मान

पिछले करीब 9 वर्षों से मंडी कलम पर काम कर रहे मंडी शहर के रहने वाले राजेश कुमार कहते हैं कि यह मंडी की उस प्राचीन कला का सम्मान है, जो शायद आज के आधुनिक युग में खो सी गई है. राजेश ने बताया कि मंडी कलम की चित्रकारी प्राकृतिक रंगों, गिलहरी की पूंछ के बालों से बनी तूलिका से और हाथों से बने कागज पर की जाती है. यह एक छोटे प्रकार की पेंटिंग होती हैं, जिसमें एक छोटे से चित्र में पूरी कहानी कहने का प्रयास किया जाता है.

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'मंडी कलम को जीआई टैग मिलना जरूरी'

मंडी कलम और टांकरी लिपि के संरक्षण पर काम कर रहे मंडी के रहने वाले पारूल अरोड़ा बताते हैं कि आज कांगड़ा की प्राचीन कला को जीआई टैग मिल चुका है, जिससे यहां की पेंटिंग्स को विश्व स्तर पर एक अलग पहचान मिल रही है. हाल ही में कांगड़ा में संपन्न हुए जी-20 सम्मेलन में भी कांगड़ा कलम के चित्रों को ही उपहार स्वरूप दिया गया था.

मंडी कलम को भी इसी प्रकार से जीआई टैग मिलने की जरूरत है. इसके लिए सरकार, प्रशासन और विभागीय स्तर पर अधिक प्रयास किए जाने चाहिए. यह हम सभी का दायित्व बनता है कि जो मंडी कलम आज विश्व भर में अपनी एक अलग पहचान बना रही है, उसे अधिकारिक तौर पर वैश्विक स्तर पर पहचान मिले.

मंडी कलम प्राकृतिक रंगों की अदभुत कला है. राजशाही के दौर में कुछ कलाकार ऐसे थे, जो प्राकृतिक रंगों और गिलहरी की पूंछ के बालों से तैयार किए गए ब्रश से चित्रों को उकेरते थे. यह चित्र एक तरह से जीवंत प्रतीत होते थे. पहाड़ी चित्रकला के चित्र वेद, पुराणों, रामायण, महाभारत, काव्य, राजाओं-रानियों इत्यादि से संबंधित मिलते हैं. पहाड़ी चित्रकला के कलाकारों को ग्रंथों की अच्छी जानकारी होती थी. मंडी कलम के संरक्षण तथा संवर्धन की आवश्यकता है. कुछ कलाकार इस क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं.

रिपोर्ट: धरम वीर

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