
श्रीनगर (Srinagar) की अंजुमन औकाफ जामा मस्जिद मैनेजिंग कमेटी ने जम्मू-कश्मीर प्रशासन पर हुर्रियत चीफ मीरवाइज उमर फारूक (Mirwaiz Umar Farooq) के आंदोलन को प्रतिबंधित करने का आरोप लगाया है. जामा मस्जिद ने एक बयान में दावा किया कि चार साल की नजरबंदी के बाद हुई रिहाई के बाद मीरवाइज को सिर्फ तीन शुक्रवार जामा मस्जिद जाने की छूट दी गई. उसके बाद वह हर शुक्रवार को नजरबंद कर दिए जाते हैं.
एजेंसी के मुताबिक मस्जिद कमेटी ने उमर फारूक को 'ऐतिहासिक जामा मस्जिद में उपदेश देने और शुक्रवार (जुमा) की नमाज अदा करने की अनुमति नहीं देने' के लिए प्रशासन की निंदा की है. कमेटी के द्वारा कहा गया है कि इस तरह की कार्रवाई से लोगों में अन्याय और अलगाव की भावना गहरी हो गई है. बता दें कि कमेटी ने यह भी आरोप लगाया कि प्रशासन अपनी कार्रवाई के लिए कोई उचित कारण नहीं बता रहा है.
कौन हैं मीरवाइज उमर फारूक?
उमर फारूक, कश्मीर के अलगाववादी संगठन हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष हैं. उनका जन्म 23 मार्च 1973 को हुआ था. मीरवाइज, कश्मीर में काफी दिनों से चला आ रहा इस्लामी धर्मगुरुओं का एक ओहदा है. श्रीनगर की जामा मस्जिद के प्रमुख मीरवाइज ही होते हैं. उमर फारूक के पिता मौलवी फारूक की हत्या होने के बाद 17 साल की उम्र में ही उन्हें मीरवाइज बनाया गया था. बता दें कि उमर फारूक को टाइम मैग्जीन के द्वारा एशियाई हीरोज की लिस्ट में भी शामिल किया जा चुका है.
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2019 में किया गया था हाउस अरेस्ट
उमर फारूक को अगस्त 2019 में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद हिरासत में ले लिया गया था. इसके बाद सितंबर 2023 में उन्हें रिहा किया गया. चार साल की नजरबंदी से रिहाई होने के बाद उमर फारूक ने अपने अलगाववादी गठबंधन के रुख को दोहराया था. इस दौरान उन्होंने कहा था कि जम्मू-कश्मीर के मुद्दे को बातचीत और शांतिपूर्ण तरीके से हल किया जाना चाहिए. कश्मीर के लोग समुदायों और राष्ट्रों के बीच शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व में यकीन रखते हैं.
इस दौरान उन्होंने कश्मीरी पंडितो का भी जिक्र किया था और कहा था कि हमने हमेशा अपने पंडित भाइयों को घाटी लौटने के लिए आमंत्रित किया है. हमने हमेशा इसे राजनीतिक मुद्दा बनाने से इनकार किया है. यह एक मानवीय मुद्दा है.
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'लोग समाधान और शांति चाहते हैं'
उमर फारूक ने कहा था कि जम्मू-कश्मीर के लोगों के हितों का प्रतिनिधित्व करने के अलावा हमारी कोई व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा नहीं है, लोग समाधान और शांति चाहते हैं. हम चाहते हैं कि मुद्दे का समाधान शांतिपूर्ण तरीके से हो, जिससे लोगों को आगे आने वाली कठिनाइयों से छुटकारा मिल सके. मुद्दों के समाधान के बाद शांति और समृद्धि का एक नया चरण शुरू हो सकता है.