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MP: उम्र का बंधन और दिव्यांगता भी नहीं रोक सकी जज्बा, पढ़िए ऐसे वैक्सीन वॉलंटियर्स की कहानी

कोरोना महामारी के खिलाफ इस युद्ध में आहुति देने के लिए कई ऐसे वैक्सीन वॉरियर्स भी सामने आ रहे हैं, जो शारीरिक रूप से सक्षम नहीं होने के बावजूद भागीदार बनना चाहते हैं.

भारत बायोटेक की वैक्सीन का चल रहा ट्रायल भारत बायोटेक की वैक्सीन का चल रहा ट्रायल
रवीश पाल सिंह
  • भोपाल,
  • 20 दिसंबर 2020,
  • अपडेटेड 9:26 AM IST
  • दिव्यांग भी पहुंचे वॉलंटियर्स बनने
  • अधिक उम्र भी नहीं बन रही बाधक
  • दृष्टिहीन दंपति बना वैक्सीन वॉलंटियर्स

मध्य प्रदेश में इन दिनों कोरोना वैक्सीन का ट्रायल चल रहा है. खास बात यह है कि कोरोना महामारी के खिलाफ इस युद्ध में आहुति देने के लिए कई ऐसे वैक्सीन वॉरियर्स भी सामने आ रहे हैं, जो शारीरिक रूप से सक्षम नहीं होने के बावजूद भागीदार बनना चाहते हैं. हम बात कर रहे हैं ऐसे कोरोना वैक्सीन वॉलंटियर्स की जो या तो दिव्यांग हैं या फिर बहुत ज्यादा उम्र दराज हैं.

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ऐसे वॉलंटियर्स का मानना है कि इस समय वैक्सीन वॉलंटियर बन कर भी देश सेवा की जा सकती है और वे मानवता के काम आ सकते हैं. 'आजतक' आपको ऐसे ही कुछ कोरोना वैक्सीन वॉलंटियर्स के बारे में बताएगा जो कई चुनौतियों से जूझने के बाद भी खुद पर कोरोना वैक्सीन का ट्रायल करवा रहे हैं.

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छगन (परिवर्तित नाम)

ट्राई साइकिल पर बैठे ये हैं 40 साल के छगन (बदला हुआ नाम). छगन यूं तो बेघर हैं और दूसरों की मदद पर निर्भर हैं. कभी कभी भीख भी मांग लेते हैं. लेकिन जब कोरोना वैक्सीन के ट्रायल के बारे में पता चला तो वो अपनी ट्राईसाइकल चलाकर खुद ही मेडिकल कॉलेज पहुंच गए और डॉक्टरों के सामने वैक्सीन वॉलंटियर बनने की इच्छा जताई.

उनकी हालत देख डॉक्टरों ने उन्हें पहले समझाया लेकिन छगन तो मन बना कर आए थे. लिहाजा उनके फैसले का मान रखते हुए उनका रजिस्ट्रेशन किया गया. इसके बाद उनकी काउंसलिंग हुई और मेडिकल चेकअप किया गया. जब वो ट्रायल के लिए फिट पाए गए तो उन्हें भारत बायोटेक की वैक्सीन 'COVAXIN' का पहला डोज दिया गया.

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वैक्सीन लगवाने के बाद छगन ने बताया कि 'यूं तो जिंदगी में अभी तक किसी के काम नहीं आ सका और हमेशा दूसरों की मदद के भरोसे रहा लेकिन जब पता चला कि वैक्सीन का ट्रायल हो रहा है और इनको वॉलंटियर की जरूरत है तो मैं यहां आ गया ताकि वैक्सीन ट्रायल में भागीदारी कर सकूं और मानवता के काम आ सकूं.'

रवि सिंह (बदला हुआ नाम)

ये हैं भोपाल से सटे सुखी सेवनिया में रहने वाले 90 साल के रवि सिंह (बदला हुआ नाम). 90 साल की उम्र में रवि सिंह ट्रायल के लिए वॉलंटियर बनने पहुंचे थे. रवि सिंह के मुताबिक गांव में उनके पास थोड़ी सी ज़मीन है जिससे गुजर बसर हो जाता है, लेकिन मन में देश के लिए कुछ करने की इच्छा थी इसलिए यहां आ गया. डॉक्टरों ने बातचीत के दौरान समझाया भी कि वैक्सीन लगाने के बाद भी क्या-क्या सावधानियां बरतनी है. वैक्सीन लगवाने के बाद अब ऐसा लग रहा है कि मैं भी किसी यज्ञ में आहुति देकर आया हूं. 

कमल

वॉलंटियर बनने की चाहत में 45 साल के कमल भी मेडिकल कॉलेज पहुंचे थे. बचपन में ही पोलियो की वजह से चलने में असमर्थ कमल अपनी ट्राईसाइकल से यहां पहुंचे लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था. मेडिकल असेसमेंट में कमल वैक्सीन वॉलंटियर बनने के लिए अनफिट पाए गए.

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कमल को मायूस देख डॉक्टरों ने उन्हें वैक्सीन वॉलंटियर्स के लिए जो स्टैंडर्ड तय किए गए हैं, उसके बारे में बताया और उन्हें हिम्मत बंधाई. डॉक्टर ने बाद में बताया कि कमल भावनात्मक तौर पर वॉलंटियर्स बनने के लिए बहुत ज्यादा उत्साहित थे क्योंकि वह खुद पोलियो का शिकार हो चुके हैं इसलिए वह चाहते थे कि कोरोना के खात्मे के लिए वॉलंटियर्स बन इस लड़ाई में अपना योगदान दे सकें लेकिन नियम उनके आड़े आ गए. 

दृष्टिहीन दंपत्ति भी बने वैक्सीन वॉलंटियर

भोपाल में चल रहे कोरोना वैक्सीन ट्रायल के दौरान 6 दिसंबर को ट्रेन में मूंगफली बेचकर गुजारा करने वाले दृष्टिहीन दंपति भी पहुंचे. इनको ट्रायल के बारे में इनके बच्चों से ही पता चला था जिसके बाद पति पत्नी दोनों ने तय किया कि वह ट्रायल में वॉलंटियर्स बनकर हिस्सा लेंगे. दृष्टिहीन दंपति अपने बच्चों के साथ भोपाल के पीपुल्स मेडिकल कॉलेज पहुंचे और वॉलंटियर बन खुद पर वैक्सीन का ट्रायल करवाया. वैक्सीन लगाने से पहले हुई सभी प्रकार की जांच में पति-पत्नी दोनों एकदम फिट पाए गए थे.

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