
बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र के ठाणे जिले के उल्हासनगर शहर में एक अवैध ढांचे को गिराने का आदेश देते हुए कहा कि अवैध निर्माण बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि कानून का पालन न करने से अराजकता फैलेगी. साथ ही पीठ ने महाराष्ट्र सरकार से इस संबंध में कानून बनाने पर विचार करने की भी अपील की है.
दरअसल, न्यायमूर्ति ए एस गडकरी और न्यायमूर्ति कमल खता की पीठ ने उल्हासनगर निवासी नीतू मखीजा द्वारा नगर निगम और महागौरी बिल्डर्स एंड डेवलपर्स नामक बिल्डर के खिलाफ दायर याचिका की सुनवाई के दौरान आदेश पारित करते हुए यह बात कहीं हैं. इस याचिका में नीतू मखीजा ने उल्हासनगर नगर निगम को निर्देश देने की मांग की थी कि वह बिल्डर द्वारा उसके परिसर के पास एक संपत्ति पर किए गए अवैध और अनधिकृत निर्माण को तत्काल ध्वस्त करने की कार्रवाई करे.
मामले की सुनवाई करते हुए पीठ ने कहा, 'अवैध निर्माण में शामिल सभी लोगों को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए और देश में कानून-व्यवस्था, कानूनी विकास को बनाए रखने के लिए सख्त प्रतिरोध लागू किया जाना चाहिए. सरकार को कानून बनाने पर विचार करना चाहिए.'
संपत्ति में हो रहा है पानी का रिसाव: याचिकाकर्ता
याचिकाकर्ता ने दावा किया कि अवैध निर्माण के कारण उनकी संपत्ति में भारी मात्रा में पानी का रिसाव हो रहा है और यूएमसी को कई बार सूचित करने के बावजूद डेवलपर के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई है.
उन्होंने दावा किया कि बिल्डर ने इमारत के निर्माण के लिए कोई अनुमति नहीं ली थी और कथित तौर पर उसने निर्माण के लिए आस-पास की संपत्ति पर भी अतिक्रमण किया था.
याचिकाकर्ता ने कहा कि बिल्डर द्वारा दी गई धमकी और धमकी के कारण वह मानसिक आघात से गुजर रही है. 28 अगस्त 2024 को बिल्डर के खिलाफ शिकायत दर्ज करने और उसके बाद कार्रवाई करने के बावजूद, याचिकाकर्ता को पुलिस अधिकारियों से कोई सहायता नहीं मिली और ना ही कोई कार्रवाई की गई थी.
'पुलिस ने किया कार्रवाई से इनकार'
याचिकाकर्ता ने दावा किया कि बिल्डर राजनीतिक रूप से प्रभावशाली है और इसलिए अधिकारी यानी यूएमसी और पुलिस अवैध निर्माण के खिलाफ कार्रवाई करने से इनकार कर रहे हैं.
यूएमसी ने अदालत को बताया कि उसने साइट का निरीक्षण किया था, बिल्डर को नोटिस जारी किया था लेकिन उसने ध्यान नहीं दिया, फिर उन्होंने बिल्डर के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए पुलिस से सुरक्षा मांगी जो आखिरकार इस साल 15 जनवरी को दी गई और जब वे साइट पर पहुंचे, तो बिल्डर ने यूएमसी को बताया कि उसने 7 जनवरी को निर्माण को नियमित करने के लिए आवेदन किया था और इसलिए कोई कार्रवाई नहीं की गई. इस पर पीठ ने कहा कि यूएमसी के आचरण ने संदेह पैदा किया.
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद पीठ ने कहा कि "यह याचिका एक और मामला है, जिसमें मालिक का दृढ़ विश्वास है कि उसे संबंधित अधिकारियों से अपेक्षित अनुमति लिए बिना अपने ढांचे को ध्वस्त करने और फिर से निर्माण करने का अधिकार है." बिल्डर ये स्पष्ट करने के लिए कोई डॉक्यूमेंट नहीं दिखा सका कि उसने निर्माण की अनुमति के लिए यूएमसी से आवेदन किया था. उसके पास केवल नियमितीकरण के लिए अनुरोध था जो यूएमसी द्वारा नोटिस जारी किए जाने के बाद किया गया था.
पीठ ने कहा, 'हम ऐसे नागरिकों को संविधान के तहत अपने अधिकारों के प्रवर्तन की मांग करने की अनुमति नहीं दे सकते जो एक नागरिक के रूप में अपने कर्तव्यों का पालन करने से बचते हैं. हम इस कथन से बंधे हैं कि "अवैधता लाइलाज है", जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है.'
पीठ ने कहा, 'नागरिकों को पूरी तरह से अवैध निर्माण को नियमित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती जो संबंधित प्राधिकरण से आवश्यक अनुमति लिए बिना शुरू किया गया हो. इसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता.'
'UMC और पुलिस अधिकारी ने नहीं की कार्रवाई'
पीठ ने कहा, 'हमारा मानना है कि यूएमसी के साथ-साथ पुलिस अधिकारी भी समय पर कार्रवाई नहीं करने के लिए जिम्मेदार हैं, जिसके कारण अवैध निर्माण को बढ़ावा मिल रहा है.'
न्यायालय ने बिल्डर की इस दलील को स्वीकार करने से इनकार कर दिया कि "उसे केवल निर्माण का ठेका दिया गया था. यह उसे कानून के तहत अपराध करने से नहीं बचा सकता और वह कानून का पालन करने के लिए बाध्य है. कानून नागरिकों की भलाई के लिए है और सभी नागरिकों को स्वेच्छा से और अनिवार्य रूप से इसका पालन करना चाहिए अन्यथा केवल अराजकता ही होगी."
पीठ ने आशंका जताई कि अगर राज्य सरकार जल्द ही कानून नहीं बनाती है तो हमें डर है कि अगर ये कदम तुरंत नहीं उठाए गए तो राज्य में योजनाबद्ध विकास का पूरा उद्देश्य केवल एक दूर का सपना बनकर रह जाएगा. इसके अलावा, यह अराजकता की स्थिति होगी.
'नगर निगमों के विभागों में है संवाद की कमी'
पीठ ने पाया कि इस डिजिटल युग में नगर निगमों के विभिन्न विभागों के बीच संवाद की गंभीर कमी है और इसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता.
पीठ ने कहा, 'हमें यह बहुत आश्चर्यजनक लगता है कि पुलिस अधिकारी जो नगर प्रशासन की आंखें हैं, उन्होंने भी यूएमसी को निर्माण के बारे में नहीं बताया जबकि ये उनका कर्तव्य है. और कहा "उचित कार्रवाई करने में अत्यधिक देरी से हमें आम जनता की ये धारणा स्वीकार करनी पड़ती है कि संबंधित अधिकारी स्वयं ही इन अवैधताओं को संरक्षण दे रहे हैं, जिसके कारण वे ही सबसे बेहतर जानते हैं.'