
बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक जनहित याचिका (पीआईएल) को खारिज कर दिया है, जिसमें राज्य के पदाधिकारियों को किसी भी धर्म के धार्मिक अनुष्ठान में भाग लेने/उद्घाटन करने या भूमि पूजन या ऐसे अन्य अनुष्ठान करने के लिए आधिकारिक क्षमता में उपस्थित रहने से रोकने की मांग की गई थी. मुख्य न्यायाधीश डीके उपाध्याय और न्यायमूर्ति अमित बोरकर की पीठ ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि ऐसी याचिकाओं से कोई उद्देश्य पूरा नहीं होता, बल्कि इससे कीमती न्यायिक समय की बर्बादी होती है.
दरअसल, यह याचिका देश में न्यायिक सुधारों को आगे बढ़ाने वाले एक सार्वजनिक ट्रस्ट, फोरम फॉर फास्ट जस्टिस और इसके कार्यकर्ता भगवानजी रायनी द्वारा दायर की गई थी, जिन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में 150 से अधिक जनहित याचिकाएं दायर की हैं. उनके पास सिविल इंजीनियरिंग की डिग्री है और उन्होंने कहा है कि वे व्यक्तिगत रूप से पेश हो रहे हैं.
पीठ ने कहा कि जनहित याचिका के रूप में प्रस्तुत याचिका में सामान्यीकृत बयान दिए गए हैं और सर्वव्यापक राहत के लिए प्रार्थना की गई है, जिसमें कहा गया है कि याचिकाकर्ता भारतीय संविधान में निहित प्रावधानों के धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक चरित्र की घोर अवहेलना से व्यथित हैं. इसमें आगे कहा गया है कि दुनिया के बाकी देशों में ऐसे संस्थानों की कुल संख्या के मुकाबले भारत में अधिक धार्मिक तीर्थस्थल, मठ और आश्रम हैं और यहां पुजारी, पादरी, साधु, चाटुकार, संत, महंत, गोदीपति, उपदेशक, कथाकार, गुरु और जगद्गुरु आदि की संख्या भी सबसे अधिक है.
याचिका पर गौर करने के बाद पीठ ने कहा, "हमें यह जानकर खेद है कि यह ऐसी याचिकाओं की श्रृंखला में एक और याचिका है, जिसमें रायनी व्यक्तिगत रूप से पेश हो रहे हैं और बिल्कुल अस्पष्ट, सामान्यीकृत और सर्वव्यापक दावे कर रहे हैं."
याचिका में राष्ट्रपिता, राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के अलावा किसी भी देवता की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करने या किसी भी तरह की पूजा या ऐसे किसी भी अनुष्ठान के प्रदर्शन के लिए सार्वजनिक परिसर के इस्तेमाल पर रोक लगाने की भी मांग की गई थी.
2020 में दायर याचिका में राज्य द्वारा प्रबंधित मंदिर ट्रस्ट या बोर्ड को भंग करने और संबंधित धर्म के अनुयायियों द्वारा बनाए गए ट्रस्टों को अपने नियंत्रण में मंदिरों को सौंपने की भी मांग की गई थी.
रायनी ने मीडिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए आरोप लगाया था कि सरकारें और उनके मंत्री प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से राज्य मशीनरी का उपयोग करके धर्मों को बढ़ावा देने और खुद को धर्मनिष्ठ और ईश्वर-भक्त दिखाने के लिए वोट मांगने के लिए करोड़ों रुपये खर्च करते हैं. याचिकाकर्ता मंत्रियों और सरकारी अधिकारियों द्वारा अपने आधिकारिक काम को छोड़ने और चुनाव के लिए कई दिनों तक अपने कर्तव्यों से विरत रहने पर भी आपत्ति जताते हैं जिससे सरकारी खजाने पर बोझ पड़ता है.
पीठ ने कहा, "हमारी राय में जनहित याचिका में सामान्य दावे करने और न्यायालय से राज्य को जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में संशोधन करने की सलाह देने के अनुरोध के अलावा कोई कानूनी आधार नहीं बनता है... याचिका में सामान्य और लंबे-चौड़े कथन भरे पड़े हैं, जो याचिकाकर्ता के निजी विचार व्यक्त करने की प्रकृति के हैं, जो कानूनी रूप से निराधार हैं और इस मामले में हमारे हस्तक्षेप की आवश्यकता है."